OBC आरक्षण से जुड़ा एक ऐसा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, जिसका असर सीधे सिविल सर्विस परीक्षा 2025 के उम्मीदवारों पर पड़ सकता है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसी OBC उम्मीदवार के माता-पिता कितना कमाते हैं. असली सवाल ये है कि क्रीमी लेयर तय करते समय माता-पिता की नौकरी, पद और सामाजिक स्थिति को कितना महत्व दिया जाए.
OBC Creamy Layer पर सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई, 958 कैंडिडेट्स की नौकरी पर क्या होगा असर?
OBC Creamy Layer: ओबीसी क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2026 के फैसले पर केंद्र ने स्पष्टीकरण मांगा है. जानिए माता-पिता की आय, नौकरी के पद और सामाजिक स्थिति से जुड़े नियमों का सिविल सर्विस परीक्षा 2025 के 958 उम्मीदवारों पर क्या असर पड़ सकता है.

लॉ बीट की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मार्च 2026 के उस फैसले को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें अदालत ने कहा था कि OBC कैंडिडेट को क्रीमी लेयर में रखने का फैसला सिर्फ माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने साफ किया था कि माता-पिता के पद और उनकी सेवा की कैटेगरी भी देखनी होगी.
CSE 2025 पर क्यों पड़ा मामला?
मार्च 2026 में आया फैसला 11 मार्च को सुनाया गया था. लेकिन केंद्र का तर्क है कि तब तक सिविल सेवा परीक्षा 2025 (Civil Services Examination 2025) का फाइनल रिजल्ट घोषित हो चुका था और सर्विस अलॉटमेंट की प्रक्रिया अंतिम चरण में थी. सरकार का कहना है कि अगर मार्च के फैसले को पिछली तारीख से CSE 2025 पर लागू किया गया, तो एक ही परीक्षा चक्र के उम्मीदवारों के साथ अलग-अलग तरह का व्यवहार हो सकता है.
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक DoPT ने सुप्रीम कोर्ट से 958 ऐसे उम्मीदवारों के सर्विस अलॉटमेंट को पहले लागू क्रीमी लेयर मानदंड के आधार पर आगे बढ़ाने की अनुमति मांगी है, जिन्हें UPSC ने CSE 2025 के लिए सिफारिश की थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पेशल बेंच के गठन का रास्ता साफ किया है.
मार्च के फैसले में कोर्ट ने क्या कहा था?
‘लाइव लॉ’ के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने कहा था कि क्रीमी लेयर का मकसद OBC के उन सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके वर्गों को आरक्षण से बाहर रखना है, ताकि वास्तविक रूप से पिछड़े लोगों को इसका फायदा मिल सके. लेकिन इसका मतलब ये नहीं हो सकता कि समान स्थिति वाले लोगों के बीच सिर्फ नौकरी के सेक्टर के आधार पर कृत्रिम अंतर पैदा कर दिया जाए.
मामले में 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और 2004 की DoPT का स्पष्टीकरण अहम हैं. 1993 के नियमों में माता-पिता की नौकरी के पद और सामाजिक स्थिति को महत्वपूर्ण माना गया था. बाद में 2004 की क्लियरिफिकेशन के तहत कुछ मामलों में PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता की सैलरी को अलग से आय परीक्षण में शामिल किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में कहा कि सिर्फ सैलरी को आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है.
अब आगे क्या होगा?
अब सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना है कि मार्च का फैसला CSE 2025 जैसी पहले से काफी हद तक पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया पर लागू होगा या नहीं. अगर कोर्ट केंद्र की दलील स्वीकार करता है तो 958 उम्मीदवारों की सर्विस अलॉटमेंट प्रक्रिया पुराने मानदंड के आधार पर आगे बढ़ सकती है. अगर मार्च का फैसला लागू होता है तो उन उम्मीदवारों की OBC क्रीमी लेयर स्थिति दोबारा जांचे जाने का रास्ता खुल सकता है.
मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसका असर सिर्फ एक परीक्षा के उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाले समय में OBC क्रीमी लेयर तय करने के तरीके और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है.
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