The Lallantop

ईरान ने अमेरिकी ड्रोन MQ-9 गिराने का दावा किया, भारत के MQ-9B से कैसे अलग है?

ईरान के IRGC ने होर्मुज के ऊपर अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है, हालांकि अमेरिका ने इसकी पुष्टि या खंडन नहीं किया है. भारत भी MQ-9B SeaGuardian इस्तेमाल करता है, लेकिन उसकी भूमिका, डिजाइन और क्षमता अमेरिकी रीपर से काफी अलग है.

Advertisement
post-main-image
ईरान ने अमेरिकी ड्रोन मार गिराने का दावा किया है. (फोटो- India Today)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • ईरान की इस्लामिक सेना ने 31 अगस्त को होर्मुज के ऊपर अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है, जिसका प्रयोग अमेरिका द्वारा लंबी दूरी की निगरानी और सटीक हमले के लिए किया जाता है।
  • MQ-9 रीपर ड्रोन को बनाया गया है विशेष रूप से दुश्मन की एयर डिफेंस कमजोर कर देने के बाद उसके इलाकों में निगरानी और हमला करने के लिए, और इसका ऑपरेशन बिना पायलट के होता है।
  • ईरान द्वारा ड्रोन मार गिराने के दावे के बाद अमेरिका को अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है, जबकि भारत द्वारा लिए गए MQ-9B गार्जियन ड्रोन से यह तकनीक और उपयोग में अलग है।

ईरान की इस्लामिक सेना ने अमेरिका का एक महंगा MQ-9 रीपर ड्रोन मार गिराने का दावा किया है. भारत के लिए ये टेंशन वाली बात इसलिए है क्योंकि इसी ड्रोन का एक मॉडर्न वर्जन वह भी इस्तेमाल करता है. हाल ही में भारत ने दो MQ-9B सी गार्जियन ड्रोन लीज पर लिए हैं. कई और ड्रोन्स का ऑर्डर भी दिया है. हालांकि, भारत वाला ड्रोन मार गिराए गए अमेरिकी ड्रोन से काफी अलग है. क्या अलग है, उस बारे में बात करेंगे, लेकिन पहले जान लेते हैं कि ईरान ने अमेरिका के जिस ड्रोन को तबाह करने का दावा किया है, वह क्या है. कितने का है. उसके पास क्या शक्तियां हैं?

Advertisement
कीमत कितनी है?

सबसे पहले तो इस ड्रोन MQ-9 रीपर की कीमत जान लीजिए. इंडिया टुडे से जुड़े शौनक सान्याल की रिपोर्ट के मुताबिक, यह करीब 5 करोड़ डॉलर यानी लगभग 450 करोड़ रुपये है. ये कितना महंगा है, इसका अंदाजा ऐसे लगाइए कि अमेरिका के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में से एक ‘F-35 लाइटनिंग’ की कीमत सवा 8 करोड़ से लेकर 10.9 करोड़ डॉलर तक है. रुपये में देखें तो लगभग 740 करोड़ से 980 करोड़ रुपये के आसपास. यानी ड्रोन इस लड़ाकू विमान से थोड़ा ही सस्ता है. 

हालांकि, MQ-9 रीपर की कीमत कई फाइटर जेट से भी ज्यादा है. जैसे पाकिस्तान के पास जो JF-17 लड़ाकू विमान है, उसकी कीमत करीब 2.5 करोड़ डॉलर यानी लगभग 237 करोड़ रुपये है. वहीं, इंडियन एयरफोर्स का ‘HAL तेजस Mk-1A’ करीब 4 से 4.5 करोड़ डॉलर यानी लगभग 380 से 428 करोड़ रुपये का पड़ता है.

Advertisement
लंबी दूरी तक निगरानी

MQ-9 रीपर एक एडवांस लेवल का ऐसा अमेरिकी ड्रोन है, जिसका इस्तेमाल लंबी दूरी तक निगरानी करने, खुफिया जानकारी जुटाने और टारगेट पर सटीक हमले के लिए भी किया जाता है. अमेरिका की एयरोस्पेस कंपनी जनरल एटॉमिक्स ने इसे बनाया है. यह ड्रोन पूरी तरह से पायलट विहीन होता है. डिफेंस की भाषा में कहें तो ये ड्रोन ‘Unmanned Aerial Vehicle’ (UAV) है, जिसे बिना किसी ड्राइवर के ऑपरेट किया जाता है. 

27 घंटे तक हवा में रहने की क्षमता

MQ-9 रीपर मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकता है. अमेरिका की एयरफोर्स इस ड्रोन का खासतौर पर इस्तेमाल करती है. खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक हमले के लिए यह अमेरिकी सेना का बहुत जरूरी औजार है. इसे बनाने वाली कंपनी ‘जनरल एटॉमिक्स’ बताती है कि MQ-9 रीपर करीब 27 घंटे तक लगातार हवा में रह सकता है. इसकी अधिकतम रफ्तार 240 नॉट यानी करीब 444 किलोमीटर प्रति घंटा होती है. 50 हजार फीट तक की ऊंचाई पर यह उड़ सकता है और इसकी पेलोड क्षमता करीब 1,746 किलोग्राम है, जिसमें 1,361 किलो तक का बाहरी हथियार लोड किया जा सकता है. 

ताकतवर सेंसर और कम्युनिकेशन

इसका सेंसर और कम्युनिकेशन सिस्टम इतना ताकतवर है कि लंबे समय तक किसी इलाके पर नजर रख सकता है. इसमें AGM-114 हेलफायर मिसाइल, GBU-12 लेजर गाइडेड बम और GBU-38 JDAM जैसे हथियार लोड किए जा सकते हैं. किसी भी टारगेट को ट्रैक करने के बाद अगर जरूरी हुआ तो ये उस पर सटीक हमला करने की भी क्षमता रखते हैं.

Advertisement
सबसे बड़ी कमी क्या?

इसकी एक बड़ी कमी है कि ये मिसाइलों या लड़ाकू विमानों से अपने आपको बचा नहीं सकता. इसे ऐसे डिजाइन भी नहीं किया गया है कि यह एयर डिफेंस की पहुंच से दूर रहकर काम करे. ये खासतौर पर ऐसे ही इलाकों में भेजे जाते हैं, जहां दुश्मन की एयर डिफेंस को मार-मारकर कमजोर कर दिया गया हो. अमेरिका बार-बार ये दावा करता ही है कि उसने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को तबाह कर दिया है. हालांकि, अगर ईरान का इस ड्रोन को मार गिराने का दावा सही है तो अमेरिका को अपनी इस ‘खुशफहमी’ पर फिर से सोचने की जरूरत है.

ऐसा इसलिए भी कि अगस्त 2026 की शुरुआत में वॉशिंगटन पोस्ट में एक रिपोर्ट छपी थी, जिसके मुताबिक फरवरी 2026 में ईरान से जंग शुरू होने के बाद से अमेरिकी सेना कम से कम 45 MQ-9 ड्रोन खो चुकी है. यह अमेरिका के पूरे रीपर बेड़े का करीब 25 फीसदी हिस्सा है.

ये भी पढ़ेंः जेल से निकली Maduro की पहली तस्वीरें, बोले- ‘वेनेजुएला फिर से उठ खड़ा होगा’

भारत वाले से अलग कैसे?

इस ड्रोन को मार गिराने के दावे के बीच भारत के भी कान खड़े हो गए हैं. हालांकि, यह अमेरिकी ड्रोन भारत वाले MQ-9B सी गार्जियन से काफी अलग होता है. अमेरिका वाले रीपर ड्रोन को जमीन और सागर दोनों जगहों पर टारगेट को ट्रैक करने और उन पर हमला करने के लिए बनाया गया है. लेकिन सी गार्जियन को सिर्फ समुद्री इलाके में निगरानी करने और दुश्मन की टोह लेने के लिए डिजाइन किया गया है. 

जनरल एटॉमिक्स के मुताबिक, सी गार्जियन का विंगस्पैन यानी दोनों पंखों के बीच की दूरी रीपर से ज्यादा है. इसका अधिकतम टेक-ऑफ वजन करीब 5,670 किलोग्राम है. रीपर के 27 घंटे के मुकाबले ये ड्रोन करीब 30 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है.

बता दें कि ईरान की सरकारी मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक, IRGC ने दावा किया कि सोमवार, 31 अगस्त को होर्मुज के ऊपर MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया. इसके बाद ये ड्रोन फारस की खाड़ी में जा गिरा. हालांकि, अमेरिका ने न तो इस दावे की पुष्टि की है. न खंडन ही किया है.

वीडियो: आईएएस दिव्या मित्तल ने इस्तीफे के बाद पॉलिटिक्स में जाने पर क्या बता दिया?

Advertisement