SIR प्रक्रिया से जुड़े चुनाव आयोग के नए विवाद ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इस मुद्दे पर फैसले सहमति से नहीं होते. इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट ऋतिका चोपड़ा ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सहमति के बिना ही चुनाव आयोग में फैसले लिए जा रहे हैं. रिपोर्ट सामने आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को आलोचकों और विपक्षी दलों ने कटघरे में खड़ा कर दिया है.
टीएन शेषन से लेकर ज्ञानेश कुमार तक, कब-कब चुनाव आयोग में बुलंद हुई असहमति?
Gyanesh Kumar controversy: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से दो चुनाव आयुक्तों की असहमति की खबरों के बाद देश का सियासी पारा चढ़ गया है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब आयोग के अंदर इस तरह के मतभेद की खबरें आई हों. अविनाश राय की डिटेल रिपोर्ट.

विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त पर मनमर्जी से फैसले लेने का आरोप लगा रहा है, तो सत्ता पक्ष विपक्ष की बातों को गलत बता रहा है.
इस बीच चुनाव आयोग की ओर से भी सफाई जारी की गई. यही बताने की कोशिश हुई कि असहमति सामान्य चीज है और इसके बावजूद आयोग में फैसले सहमति से ही लिए जाते हैं. वैसे चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति की बातें पहली बार नहीं हो रही हैं. पूर्व CEC टीएन शेषन के कार्यकाल में भी ये सब हो चुका है.
भारत के सबसे चर्चित चुनाव आयुक्तों में टीएन शेषन का नाम सबसे पहले लिया जाता है. कहते हैं उनका ऑरा ऐसा था कि उनके नाम से ही नेतागण कांपते थे. टीएन शेषन खुद कहते थे, “मैं तो नाश्ते में नेता खाता हूं.” आयोग के सदस्यों के बीच की असहमति का एक किस्सा टीएन शेषन के जमाने का भी है.
टीएन शेषन बनाम राष्ट्रपति विवादकिस्सा है साल 1993 का. तब चुनाव आयोग में एक ही चुनाव आयुक्त हुआ करते थे. लेकिन टीएन शेषन के चुनाव आयुक्त रहने के दौरान साल 1993 में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने एक अध्यादेश के जरिए चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बना दिया. चुनाव आयोग में दो और सदस्यों की नियुक्ति हुई. तय किया गया कि चुनाव आयुक्तों को भी मुख्य चुनाव आयुक्त की तरह ही वेतन और भत्ते मिलेंगे. तब एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त बनाया गया. टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने रहे.
उन्होंने राष्ट्रपति के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. मामला पांच जजों की संवैधानिक पीठ तक पहुंचा. तब सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों जस्टिस ए. एम. अहमदी, जस्टिस जगदीश शरण वर्मा, जस्टिस एन. पी. सिंह, जस्टिस एस. पी. भरूचा और जस्टिस एम. के. मुखर्जी ने संविधान के अनुच्छेद 324(2) का हवाला देते हुए 5-0 से फैसला दिया. बेंच ने फैसला दिया कि राष्ट्रपति के पास अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त करने और आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने का संवैधानिक अधिकार है. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की शक्तियां समान हैं और आयोग का कोई भी फैसला या तो आम सहमति से होगा या फिर बहुमत से तय होगा.
लेकिन इस फैसले के बाद भी एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति ने टीएन शेषन पर कई आरोप लगाए थे. मसलन, शेषन उन दोनों को आयोग के काम में शामिल नहीं करते, मीटिंग में नहीं बुलाते, दस्तावेज नहीं दिखाते और ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उनके अलावा दो और चुनाव आयुक्त मौजूद ही न हों. तब इस मामले ने भी खूब तूल पकड़ा था.
चुनाव आयुक्त को हटाने राष्ट्रपति के पास पहुंचे CECचुनाव आयोग में असहमति का दूसरा बड़ा मामला साल 2009 का है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने ही साथी चुनाव आयुक्त को हटाने की सिफारिश कर दी थी. तब देश के प्रधानमंत्री थे डॉक्टर मनमोहन सिंह, प्रतिभा देवी सिंह पाटिल राष्ट्रपति थीं. उस दौर में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से एक और चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश कर दी थी. ये सिफारिश जनवरी 2009 में की गई थी.
कुछ ही महीने बाद लोकसभा के आम चुनाव होने थे और उस चुनाव से पहले ही एन गोपालस्वामी का कार्यकाल भी खत्म होने वाला था. तब मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एन गोपालस्वामी ने नवीन चावला पर एक राजनीतिक दल के साथ पक्षपात करने का आरोप लगाया था. उस वक्त तीसरे चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी थे. कुरैशी ने कहा था कि एन गोपालस्वामी ने ये फैसला अपनी मर्जी से किया था, दूसरे चुनाव आयुक्त की सलाह नहीं ली गई थी. नतीजा ये हुआ कि राष्ट्रपति ने एन गोपालस्वामी की बात नहीं मानी और उनके रिटायरमेंट के बाद नवीन चावला ही देश के मुख्य चुनाव आयुक्त भी बने.
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जब बहुमत पर भारी पड़ने लगी असहमतिहाल के सालों में चुनाव आयोग में असहमति की सबसे बड़ी आवाज पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा हैं. साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त थे सुनील अरोड़ा. दो और चुनाव आयुक्त थे, अशोक लवासा और सुशील चंद्रा. उस वक्त सत्ताधारी बीजेपी के दो सबसे बड़े नेताओं पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले सामने आए, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने बहुमत के आधार पर क्लीन चिट दे दी थी.
लेकिन अशोक लवासा का मत इससे अलग था. बहुमत के आधार पर अशोक लवासा की बात खारिज हुई तो उन्होंने खुद को आचार संहिता से जुड़े मामलों से ही अलग कर लिया. उस वक्त उन्होंने कहा था कि जब उनकी असहमति का कोई मतलब ही नहीं है, तो उन्हें ऐसी बैठकों में जाना ही क्यों है.
तब इस मामले ने भी खूब सियासी तूल पकड़ा था. और अब मौजूदा चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित असहमतियों से जुड़ी रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के काम-काज पर फिर से बहस छेड़ दी है.
हालांकि आयोग लिखित में बयान जारी कर असहमतियों को व्यवस्था का हिस्सा बता रहा है. लेकिन, विपक्ष का सवाल है कि जब असहमतियां हैं और बहुमत भी असहमतियों का है तो फिर आखिरी फैसला हुआ कैसे.
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