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आपका वोट है भी या नहीं? दिल्ली में 33 लाख नोटिस के बाद ये सवाल हर वोटर को क्यों पूछना चाहिए

Delhi SIR: दिल्ली में एसआईआर के दौरान करीब 33 लाख मतदाताओं को "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" और "नो मैपिंग" जैसी वजहों से नोटिस मिले हैं. जानिए नोटिस का मतलब क्या है, क्या इससे वोट कट जाता है, कौन से दस्तावेज काम आ सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने के तरीके पर क्या सवाल उठाए और मतदाता अपनी एंट्री कैसे जांच सकता है.

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आपका वोट है या नहीं, अभी कैसे जांचें (Courtesy:@India Today)

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  • दिल्ली में 30 जून 2026 से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमें मतदाता सूचियों की जांच के लिए 33.13 लाख मतदाताओं को नोटिस भेजे गए हैं।
  • इस पुनरीक्षण की वजह मतदाता रिकॉर्ड के बीच 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' और 'नो मैपिंग' जैसी असंगतियां हैं, जिनकी पहचान पिछले और वर्तमान सूचियों के आंकड़ों की तुलना में हुई है।
  • नोटिस मिलने के बाद मतदाता दस्तावेजों के माध्यम से अपनी जानकारी स्पष्ट कर सकते हैं, और अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी, जिसके लिए आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक चलेगी।

दिल्ली में अगर आप वोटर हैं, तो एक सवाल अभी पूछ लेना जरूरी है. आपका नाम मतदाता सूची में है या नहीं? सवाल इसलिए नहीं कि हर नोटिस पाने वाले का वोट कट गया है. बल्कि इसलिए कि दिल्ली में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (Special Intensive Revision) के दौरान लाखों मतदाताओं के रिकॉर्ड की दोबारा जांच हो रही है. करीब 33.13 लाख मतदाताओं को "नो मैपिंग" या "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" जैसी वजहों से नोटिस जारी किए गए हैं.

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33 लाख नोटिस आखिर क्यों?

दिल्ली में एसआईआर की प्रक्रिया 30 जून 2026 से शुरू हुई. बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ (BLO) ने घर-घर जाकर मतदाताओं से गणना फॉर्म भरवाए. इसके बाद 31 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित हुई. दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है. नोटिस और दावों-आपत्तियों के निपटारे का चरण 29 अक्टूबर तक चलेगा.

33.13 लाख नोटिस पाने वाले मतदाताओं में करीब 19.33 लाख मामले "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" और करीब 13.79 लाख मामले "नो मैपिंग" श्रेणी में बताए गए हैं. आसान भाषा में कहें तो पहले मामले में मौजूदा और पुराने रिकॉर्ड के बीच कुछ ऐसी जानकारी मिली जिसे निर्वाचन अधिकारियों ने असंगति माना. दूसरे मामले में मौजूदा मतदाता का रिकॉर्ड पिछली एसआईआर सूची से जोड़ा नहीं जा सका.

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"लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" का मतलब क्या है?

यहीं से पूरी कहानी थोड़ी पेचीदा हो जाती है. "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" सुनने में ऐसा लगता है जैसे मतदाता के बारे में कोई बड़ी गड़बड़ी पकड़ ली गई हो. लेकिन हर मामला ऐसा नहीं है.

मीडिया रिपोर्टों और अदालत में हुई सुनवाई के दौरान ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिनमें उम्र, माता-पिता की उम्र, नाम या पुराने रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी में अंतर को इस श्रेणी में रखा गया. मसलन, किसी मतदाता और उसके माता-पिता की उम्र के बीच असामान्य अंतर या पुराने रिकॉर्ड से जानकारी का मेल न होना भी जांच का आधार बन सकता है.

यानी नोटिस का अर्थ ये नहीं है कि निर्वाचन आयोग ने तय कर दिया कि संबंधित व्यक्ति वोट देने का हकदार नहीं है. ये मूल रूप से सत्यापन की प्रक्रिया का हिस्सा है.

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नोटिस आया तो क्या वोट कट गया?

नहीं. यही सबसे जरूरी बात है. नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता सूची से नाम हट जाने के बराबर नहीं है. निर्वाचन अधिकारियों की तरफ से कहा गया है कि संबंधित मतदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और जरूरी दस्तावेज देने का अवसर मिलेगा. चुनाव आयोग के आधिकारिक एसआईआर दस्तावेज में भी नोटिस के बाद दस्तावेज उपलब्ध कराने की प्रक्रिया बताई गई है.

22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में भी यही मुद्दा प्रमुखता से उठा. चुनाव आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि किसी मतदाता का नाम सुनवाई के बिना नहीं हटाया जाएगा. अदालत ने इस प्रक्रिया में अतिरिक्त मानवीय जांच और स्पष्टता की जरूरत पर सवाल उठाए.

फिर सुप्रीम कोर्ट ने "मैकेनिकल" क्यों कहा?

22 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोटिस जारी करने के तरीके पर सवाल उठाया. अदालत की टिप्पणी थी कि कुछ नोटिस लगभग "मैकेनिकल" तरीके से जारी होते दिखाई दे रहे हैं और ये भी जांचने की जरूरत है कि नोटिस भेजने से पहले अतिरिक्त फिल्टर लगाए जा सकते हैं या नहीं.

अदालत की चिंता का एक बड़ा हिस्सा ये था कि अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" लिखा हुआ नोटिस मिले, लेकिन ये साफ न हो कि आखिर किस जानकारी में क्या अंतर है, तो वो जवाब देगा कैसे?

सुप्रीम कोर्ट ने बीएलओ को प्रभावित मतदाताओं की मदद करने और उन्हें ये समझाने की जरूरत भी बताई कि रिकॉर्ड में किस चीज को स्पष्ट करना है. अदालत ने निर्वाचन आयोग से आम सवालों के जवाब वाला एफएक्यू (Frequently Asked Questions) तैयार करने का सुझाव भी दिया.

नोटिस आए तो कौन से दस्तावेज काम आ सकते हैं?

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की एसआईआर एफएक्यू में नोटिस मिलने की स्थिति में 12 तरह के सहायक दस्तावेजों की सूची दी गई है. इनमें सरकारी कर्मचारी या पेंशनर का पहचान पत्र, 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में सरकारी या स्थानीय निकाय, बैंक, डाकघर, एलआईसी या सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था द्वारा जारी दस्तावेज, जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, मान्यता प्राप्त बोर्ड या विश्वविद्यालय का मैट्रिक या शैक्षणिक प्रमाणपत्र, स्थायी निवास प्रमाणपत्र, वन अधिकार प्रमाणपत्र, एससी, एसटी या ओबीसी प्रमाणपत्र, जहां लागू हो वहां एनआरसी, परिवार रजिस्टर और सरकारी जमीन या मकान आवंटन प्रमाणपत्र शामिल हैं. आधार के संबंध में निर्वाचन आयोग के अलग निर्देश लागू होंगे.

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मतदाता पोर्टल पर दस्तावेजों से जुड़ी सूचना (Courtesy:@ECI)

एक जरूरी बात और. एसआईआर के गणना फॉर्म के साथ शुरुआत में कोई दस्तावेज देना जरूरी नहीं था. दस्तावेज की जरूरत नोटिस मिलने के बाद की प्रक्रिया में पड़ सकती है. आधार नंबर भी गणना फॉर्म में अनिवार्य नहीं है.

सबसे पहले क्या करें?

अगर नोटिस मिला है तो उसे नजरअंदाज न करें. अपने नोटिस में दी गई वजह को ध्यान से पढ़ें. अपना नाम मौजूदा ड्राफ्ट मतदाता सूची में खोजें. पुराने रिकॉर्ड से अपना या परिवार के किसी संबंधित सदस्य का नाम जुड़ता है तो उसकी जानकारी भी निकालें.

दिल्ली में पिछली एसआईआर 2002 में हुई थी. मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर 2002 की मतदाता सूची उपलब्ध है. निर्वाचन आयोग के मतदाता पोर्टल पर भी पिछले एसआईआर रिकॉर्ड में नाम खोजने की सुविधा दी गई है.

जरूरत पड़ने पर अपने बीएलओ से संपर्क करें. निर्वाचन आयोग का मतदाता हेल्पलाइन नंबर 1950 भी उपलब्ध है. ऑनलाइन सेवाओं के लिए आधिकारिक मतदाता पोर्टल पर एसआईआर से जुड़ी सुविधाएं मौजूद हैं.

सबसे ज्यादा परेशानी किसे हो सकती है?

इस सवाल का जवाब सिर्फ किसी एक समुदाय या समूह के नाम से देना ठीक नहीं होगा. व्यावहारिक तौर पर उन लोगों के लिए सत्यापन मुश्किल हो सकता है जिनके पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, जिनका परिवार कई जगहों पर रहा है, जिनके नाम या उम्र अलग-अलग दस्तावेजों में अलग लिखे हैं, या जो लंबे समय से दिल्ली में रहने के बावजूद 2002 की दिल्ली मतदाता सूची में अपना या परिवार का रिकॉर्ड नहीं खोज पा रहे हैं.

मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक एफएक्यू खुद मानती है कि 2002 के बाद दूसरे राज्यों से दिल्ली आकर बसे लोगों का नाम दिल्ली की 2002 की सूची में नहीं मिलेगा. ऐसे मतदाताओं के लिए संबंधित पुराने राज्य की पिछली एसआईआर सूची से खुद या रिश्तेदार का रिकॉर्ड जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है.

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इसलिए असली सबक 33 लाख नोटिस का आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रक्रिया को समझना है. नोटिस को वोट कटने का अंतिम फैसला मानना गलत होगा. लेकिन नोटिस को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है.

सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि अभी अपना नाम ड्राफ्ट सूची में जांचें, नोटिस मिला है तो वजह समझें, पुराने रिकॉर्ड और जरूरी दस्तावेज तैयार रखें और तय समय के भीतर अपनी बात निर्वाचन अधिकारी के सामने रखें. क्योंकि वोट डालने के दिन लाइन में खड़े होकर ये पता चलना कि नाम सूची में नहीं है, उस समय सुधार की गुंजाइश बहुत कम छोड़ सकता है.

वीडियो: रेखा गुप्ता, एस जयशंकर समेत दिल्ली SIR में 33 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड पर सवाल

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