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गौमूत्र से होगा चिकनगुनिया का इलाज? IIT रुड़की के रिसर्च में मिला नया फॉर्मूला

IIT Roorkee की ये रिसर्च ACS Agricultural Science & Technology नाम के जर्नल में छपी है. इसे आईआईटी रुड़की के बायोसाइंसेज़ और बायोइंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की प्रोफेसर शैली तोमर और उनकी टीम ने लीड किया है. साथ में देशभर के प्रमुख आयुर्वेद और बायोमेडिकल इंस्टीट्यूशंस के रिसर्चर्स भी शामिल थे.

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गौमूत्र को शुद्ध करके एक्सपेरिमेंट किया गया है (फोटो: AI)

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  • आईआईटी रुड़की की शोध टीम ने पाया कि गौमूत्र अर्क में कुछ तत्व चिकनगुनिया वायरस की गतिविधि को अधिकतम 99.85% तक कम कर सकते हैं।
  • चिकनगुनिया का कोई निश्चित इलाज नहीं है, इसलिए रिसर्चर्स ने वायरल बीमारी के इलाज के लिए गौमूत्र अर्क के एंटीवायरल गुणों का परीक्षण किया।
  • अभी इस शोध के परिणाम लैब स्तर पर हैं, इसलिए चिकित्सा क्षेत्र में सुरक्षित और प्रभावी उपयोग के लिए आगे क्लीनिकल ट्रायल और रिसर्च आवश्यक होगी।

क्या अब गौमूत्र से चिकनगुनिया का इलाज होगा? इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी यानी IIT Roorkee के रिसर्चर्स ने एक रिसर्च की है. इसमें गौमूत्र अर्क में ऐसे तत्व मिले हैं. जो चिकनगुनिया वायरस के खिलाफ असर दिखाते हैं. ये तत्व चिकनगुनिया वायरस की एक्टिविटी रोकने या कम करने में मदद कर सकते हैं.

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ये रिसर्च ACS Agricultural Science & Technology नाम के जर्नल में छपी है. इसे आईआईटी रुड़की के बायोसाइंसेज़ और बायोइंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की प्रोफेसर शैली तोमर और उनकी टीम ने लीड किया है. साथ में देशभर के प्रमुख आयुर्वेद और बायोमेडिकल इंस्टीट्यूशंस के रिसर्चर्स भी शामिल थे.

रिसर्च से क्या-क्या पता चला, समझाते हैं. सारे एक्सपेरिमेंट गौमूत्र अर्क पर किए गए. ये गाय का नॉर्मल यूरिन नहीं होता. गौमूत्र अर्क बनाने के लिए पहले देसी गायों का ताज़ा यूरिन इकट्ठा किया जाता है. फिर इसे एक बंद बर्तन या प्लांट में डालकर उबाला जाता है. इसके उबलने पर भाप बनती है. इस भाप को ठंडा करके तरल यानी लिक्विड में बदल लिया जाता है. ये लिक्विड ही गौमूत्र अर्क कहलाता है. ये शुद्ध होता है क्योंकि पूरी प्रक्रिया में गाय के यूरिन में मिलने वाले कई तत्व या अशुद्धियां हट जाती हैं.

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अब लैब टेस्ट में देखा गया कि इस गौमूत्र अर्क ने चिकनगुनिया वायरस को 90% से ज़्यादा कम कर दिया. जब गौमूत्र अर्क को कलौंजी से मिलने वाले थायमोक्विनोन और काली मिर्च से मिलने वाले पिपरीन तत्व के साथ मिलाया गया. तो वायरस की मात्रा में 99.85% तक की कमी देखी गई.

आगे और टेस्टिंग में पता चला कि बेन्ज़ोइक एसिड, हिप्यूरिक एसिड और ओलिक एसिड ऐसे ज़रूरी तत्व हैं. जो इस एंटीवायरल एक्टिविटी में योगदान दे सकते हैं. ये सारे तत्व उन प्रोटीन्स के कामकाज को धीमा कर देते हैं. जिनकी मदद से वायरस शरीर में अपनी संख्या बढ़ाता है. रिसर्चर्स का मानना है कि भविष्य में इन तत्वों के इस्तेमाल से नई एंटीवायरल दवाएं बनाई जा सकती हैं.

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ये इसलिए अहम है, क्योंकि चिकनगुनिया का फिलहाल कोई खास इलाज नहीं है. बस लक्षणों को कम करने के लिए दवाएं दी जाती हैं. चिकनगुनिया क्या है, पता ही है आपको. एक वायरल बीमारी, जिसके मामले हर साल मॉनसून में बढ़ते ही हैं. ये चिकनगुनिया वायरस की वजह से होती है. ये वायरस इंसानों में एडीज़ मच्छर के काटने से फैलता है. चिकनगुनिया होने पर अचानक तेज़ बुखार आता है. सिरदर्द, शरीर और जोड़ों में दर्द होता है. थकान, कमज़ोरी रहती है. स्किन पर हल्के चकत्ते भी पड़ सकते हैं. और बुखार ठीक हो जाने के बाद भी शरीर और जोड़ों में लंबे समय तक दर्द बना रहता है. अभी तक चिकनगुनिया ठीक करने के लिए डॉक्टर सपोर्टिव केयर देते हैं. बीमारी आमतौर पर कुछ हफ्तों में अपने आप ठीक हो जाती है. पर इसका कोई तय इलाज नहीं है.

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चिकनगुनिया वायरस इंसानों में एडीज़ मच्छर के काटने से फैलता है

रिसर्च पर बात करते हुए स्टडी की कॉरेस्पॉन्डिंग ऑथर, प्रोफेसर शैली तोमर ने कहा- हमारी रिसर्च ने न सिर्फ ये पता लगाया कि गौमूत्र अर्क में कौन-से तत्व वायरस के खिलाफ असर दिखा सकते हैं, बल्कि ये भी दिखाया कि कई प्राकृतिक तत्वों को मिलाकर बनाया गया फॉर्मूला और ज़्यादा प्रभावी हो सकता है. ये नतीजे चिकनगुनिया और इससे मिलते-जुलते वायरल इंफेक्शंस के खिलाफ भविष्य में नई एंटीवायरल दवाएं या उपचार विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं. हालांकि, इंसानों में ये कितने सुरक्षित और प्रभावी हैं, ये जानने के लिए आगे और प्री-क्लिनिकल व दूसरी स्टडीज़ किया जाना ज़रूरी होगा.

आईआईटी रुड़की ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा- ये रिसर्च दिखाती है कि आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान और मॉडर्न बायोटेक्नोलॉजी को मिलाकर वायरल बीमारियों के खिलाफ नए उपचार विकसित किए जा सकते हैं.

इस रिसर्च पर मॉडर्न मेडिसिन के डॉक्टर क्या सोचते हैं, ये जानने के लिए हमने बात की शारदा हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर श्रेय श्रीवास्तव से.

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डॉ. श्रेय श्रीवास्तव, सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, शारदा हॉस्पिटल

डॉक्टर श्रेय कहते हैं कि ये रिसर्च अभी बहुत शुरुआती स्टेज में है. इसके जो नतीजे आए हैं, वो लैब टेस्ट में मिले हैं. जानवरों और इंसानों पर इसका क्लीनिकल ट्रायल अभी नहीं हुआ है. इसलिए इस पर अभी और ज़्यादा रिसर्च व टेस्टिंग की ज़रूरत है. एक चीज़ और, अगर किसी को चिकनगुनिया है, तो वो सीधे गाय का यूरिन पीकर खुद से इलाज करने की कोशिश न करे. ये तरीका नुकसान पहुंचा सकता है. क्योंकि रिसर्च में खास तरीके से तैयार किए गए गौमूत्र अर्क की स्टडी की गई है. अगर चिकनगुनिया के लक्षण हैं, तो डॉक्टर को दिखाना और उनके कहे अनुसार इलाज बहुत ज़रूरी है.

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