भारत फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट (Rafale Fighter Jets) और खरीद रहा है, ये बात किसी से छिपी नहीं है. सिर्फ इतना ही नहीं, भारत और फ्रांस के बीच राफेल से मरीन संस्करण राफेल (Rafale-M) की खरीद पर भी बात चल रही है. मगर इसी बीच ग्लोबल डिफेंस मार्केट से इस हफ्ते एक ऐसी खबर आई जिसने दुनिया भर के मिलिट्री एक्सपर्ट्स को चौंका दिया है.
Rafale छोड़ ग्रिपेन की तरफ क्यों भाग रही है दुनिया? क्या भारत ने डील में जल्दबाजी कर दी?
Swedish कंपनी Saab के Gripen Fighter Jet को दुनिया भर से 300 से ज्यादा ऑर्डर्स मिले हैं. खरीदारों में यूक्रेन, ब्राजील और कोलंबिया जैसे वो देश भी शामिल हैं, जो पहले Dassault Rafale में दिलचस्पी दिखा रहे थे. ऐसे में सवाल उठता है कि दुनिया राफेल छोड़ ग्रिपेन की ओर क्यों जा रही है. और इसी से जुड़ा सवाल कि क्या भारत ने France से फाइटर जेट डील में जल्दबाजी कर दी?


दरअसल जिस राफेल को भारतीय वायुसेना इस वक्त सबसे भरोसेमंद और 'गेमचेंजर' मान रही है. वो इंटरनेशनल आर्म्स मार्केट में एक अजीब मगर गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है. स्वीडन की एविएशन कंपनी साब (Saab) ने दावा किया है कि उसके ग्रिपेन (Gripen E/F) फाइटर जेट को खरीदने के लिए दुनिया के कई देशों ने भारी दिलचस्पी दिखाई है और ऑर्डर्स का आंकड़ा 300 के पार जा रहा है.
बात सिर्फ ग्रिपेन की खरीद तक सीमित हो तो कोई बात नहीं. मगर येां सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि ग्रिपेन की तरफ भागने वाले देशों में वो नाम भी शामिल हैं जो पहले फ्रांस के राफेल को खरीदने की रेस में सबसे आगे थे. ऐसे में ताज्जुब नहीं कि भारत के डिफेंस कॉरिडोर्स में भी एक बड़ा सवाल तैरने लगा है. सवाल कि क्या भारत ने राफेल को चुनने में कोई जल्दबाजी कर दी? अगर नहीं तो फिर आखिर वो कौन सी वजहें हैं जो राफेल के मुकाबले ग्रिपेन को ग्लोबल मार्केट का नया स्टार बना रही हैं?
इस हफ्ते की सबसे बड़ी डिफेंस डील का सच
पिछले कुछ दिनों में भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ये खबर प्रमुखता से आई कि फ्रांस के राफेल की ऊंची कीमत और भारी रखरखाव खर्च से परेशान होकर कई देश अब स्वीडिश ग्रिपेन की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं. खुद स्वीडिश कंपनी साब ने भी अपनी वेबसाइट पर प्रेस रिलीज जारी करके इन खबरों की पुष्टि की है.
इसके अलावा देश और दुनिया के कई नामचीन डिफेंस पोर्टल्स ने भी इन खबरों पर मुहर लगाई. तमात स्रोतों से आ रही जानकारी पर भरोसा करें तो स्वीडन और यूक्रेन के बीच ग्रिपेन जेट्स की खरीद को लेकर बातचीत आखिरी दौर में पहुंच चुकी है.
वो देश जिन्होंने राफेल छोड़ ग्रिपेन का हाथ थामा
ग्लोबल मिलिट्री पोर्टल्स के मुताबिक पांच बड़े देश ऐसे हैं जिन्होंने या तो राफेल का विकल्प छोड़ दिया या फिर ग्रिपेन को अपनी पहली पसंद बना लिया है. बात अब इन देशों की चल ही पड़ी है तो लगे हाथों इनके नाम भी जान ही लेते हैं.
यूक्रेन: रूस के खिलाफ युद्ध लड़ रहे यूक्रेन को एक ऐसे फाइटर जेट की जरूरत थी जो कम खर्च में बेहतरीन परफॉर्मेंस दे और जिसे साधारण रनवे से भी उड़ाया जा सके. यूक्रेन अब 150 ग्रिपेन जेट्स के मेगा ऑर्डर की तरफ बढ़ रहा है. पहले इस रेस में राफेल सबसे आगे था.
ब्राजील: ब्राजील ने एक दशक पहले राफेल को रिजेक्ट करके ग्रिपेन को चुना था. डिफेंस पोर्टल इंडेक्स में छपी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ब्राजील अपने बेड़े में 20 और नए ग्रिपेन जेट शामिल करने जा रहा है.
कोलंबिया: कोलंबिया लंबे समय तक राफेल खरीदने की सोच रहा था लेकिन बजट और मेंटेनेंस के गणित को देखते हुए उसने स्वीडिश ग्रिपेन E/F को फाइनल कर दिया है.
कनाडा और फिलीपिंस: ये दोनों देश भी अपने मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम के तहत ग्रिपेन को तरजीह दे रहे हैं क्योंकि साब इन्हें अपनी तकनीक ट्रांसफर करने और लोकल PRODUCTION की पूरी छूट दे रहा है.
राफेल बनाम ग्रिपेन: कौन किस मामले में है बेस्ट?
इन दोनों फाइटर जेट्स के बीच का मुकाबला सिर्फ तकनीक का नहीं बल्कि पैसे और जरूरत का भी है. नीचे हमने एक इंफोग्राफिक्स दिया है. जिसकी मदद से आप समझ सकते हैं कि राफेल और ग्रिपेन में बुनियादी फर्क क्या है?

हवा से जमीन और आसमान की जंग: कौन है असली किंग?
किसी भी फाइटर जेट की काबिलियत कागज पर चाहे जितनी भी बता दी जाए. मगर असलियत तो जंग के वक्त आसमान में ही सामने आती है. ऐसे में हवाई जंग में राफेल और ग्रिपेन में से किसका पलड़ा भारी पड़ेगा, ये जानना भी दिलचस्प है.
1. एयर टू एयर फाइट (आसमान की जंग): ग्रिपेन एक बेहद फुर्तीला और हल्का जेट है. इसकी टॉप स्पीड राफेल से थोड़ी ज्यादा है. सबसे बड़ी बात ये है कि ग्रिपेन दुनिया की सबसे घातक विजुअल रेंज मिसाइल 'मेट्योर' (Meteor) को दागने वाला पहला जेट था. हालांकि राफेल भी अब मेट्योर मिसाइल से लैस है. लेकिन ग्रिपेन का छोटा आकार उसे रडार की नजरों से बचने में मदद करता है.
2. हवा से ग्राउंड अटैक (जमीन पर हमला): यहां राफेल बाजी मार ले जाता है. राफेल एक ट्विन-इंजन जेट है जिसका मतलब है कि वो ग्रिपेन के मुकाबले लगभग दोगुना वजन के हथियार उठा सकता है. राफेल अपने साथ 'स्कैल्प' (SCALP) क्रूज मिसाइल और हैमर गाइडेड बम ले जा सकता है जो पलक झपकते ही दुश्मन के बंकरों को तबाह कर देते हैं. ग्रिपेन जमीन पर हमला कर सकता है लेकिन उसकी पेलोड क्षमता सीमित है.
3. दुश्मन को चकमा देना (इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर): राफेल का 'स्पेक्ट्रा' (SPECTRA) इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाता है. ये दुश्मन के रडार को जाम करने और मिसाइलों को डाइवर्ट करने में माहिर है. दूसरी तरफ ग्रिपेन का नया EW सिस्टम भी कमाल का है लेकिन राफेल को युद्ध का लंबा अनुभव (Combat Proven) हासिल है जो ग्रिपेन के पास नहीं है.
हथियारों की ताकत: कौन कितना है घातक?
अब जब दोनों फाइटर जेट्स की इतनी बातें हो ही गईं है तो भला उन हथियारों को क्यों छोड़ दें, जो राफेल और ग्रिपेन में लगते हैं. आइये एक नजर उन पर भी मार ही लेते हैं.
राफेल के हथियार: मेट्योर (आसमान से आसमान), स्कैल्प (लॉन्ग रेंज क्रूज मिसाइल), मीका (MICA) और न्यूक्लियर मिसाइल ले जाने की क्षमता.
ग्रिपेन के हथियार: मेट्योर मिसाइल, आईरिस-टी (IRIS-T), और अमेरिकी जीबू (GBU) गाइडेड बम. ग्रिपेन की खूबी ये है कि इस पर अमेरिका, यूरोप और इजरायल तीनों के हथियार बिना किसी बड़े बदलाव के फिट किए जा सकते हैं.
क्या भारत ने राफेल खरीदकर जल्दबाजी की?
अब आते हैं सबसे जरूरी सवाल पर कि क्या भारत को राफेल खरीदने का फैसला बदलने की जरूरत थी? भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड अफसरों और रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो भारत का फैसला 100 फीसदी सही था और इसमें कोई हड़बड़ी नहीं थी. इसकी तीन बड़ी वजहें हैं:
पहला- दो मोर्चों पर युद्ध का खतरा (Two-Front War): भारत के पड़ोस में चीन और पाकिस्तान जैसे दो परमाणु संपन्न दुश्मन हैं. चीन के पास J-20 जैसे भारी और स्टील्थ फाइटर जेट्स हैं. चीन का मुकाबला करने के लिए भारत को एक ऐसे भारी और लंबी दूरी तक मार करने वाले जेट की जरूरत थी जो भारी मात्रा में हथियार ले जा सके.
डिफेंस एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत के संदर्भ में यहीं पर बाजी राफेल के पास चली जाती है. ‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा कहते हैं,
ग्रिपेन एक बेहतरीन डिफेंसिव जेट है. वो स्वीडन या फिर उन देशों के आसमान की हिफाजत करने के लिए अच्छा है, जो उसे खरीद रहे हैं. लेकिन भारत के लिए राफेल ज्यादा काम का है. क्योंकि राफेल एक ऑफेंसिव जेट है जो दुश्मन के इलाके में घुसकर तबाही मचा सकता है.
दूसरा- न्यूक्लियर डिटेरेंस (परमाणु हमला क्षमता): भारत की रणनीतिक नीति के तहत राफेल हमारी न्यूक्लियर डिलीवरी का एक मुख्य हिस्सा है. रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि फ्रांस का राफेल भारत की परमाणु जरूरतों को काफी हदतक पूरा करता है. वायुसेना के रिटायर्ड विंग कमांडर श्रीनिवास सिंह कहते हैं,
ग्रिपेन परमाणु हथियार ले जाने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है. जबकि राफेल, फ्रांस की परमाणु त्रिशूल का हिस्सा रहा है. भारत को अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए इस ताकत की सख्त जरूरत थी.
तीसरा- मेंटेनेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत पहले ही राफेल के लिए अंबाला और हासिमारा में भारी निवेश करके बेस और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर चुका है. भारतीय नौसेना भी अपने नए एयरक्राफ्ट करियर के लिए राफेल-एम (Rafale-M) को चुन चुकी है. ऐसे में अचानक ग्रिपेन की तरफ जाना रणनीतिक रूप से घाटे का सौदा होता.
रही बात भारत के राफेल खरीदने से जुड़े नफा-नुकसान की तो उस पर कुछ समय पहले हमने एक लेख लिखा था- “राफेल घाटे का सौदा, अरबों देकर भी फ्रांस के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा, सरकार क्या मानती है?” शीर्षक से, दिलचस्पी हो तो पढ़िएगा, मजा आएगा.
कौन सा फाइटर जेट चैम्पियन?
दुनिया के छोटे या कम रक्षा बजट वाले देशों के लिए ग्रिपेन बेशक एक 'पैसा वसूल' और शानदार फाइटर जेट साबित हो रहा है क्योंकि इसका ऑपरेटिंग खर्च राफेल के मुकाबले एक चौथाई है. यही वजह है कि ब्राजील, यूक्रेन और कोलंबिया जैसे देश इसकी तरफ भाग रहे हैं. लेकिन भारत की जरूरतें अलग हैं. भारत को सिर्फ आसमान की रखवाली नहीं करनी है बल्कि हिंद महासागर से लेकर लद्दाख की पहाड़ियों तक चीन को कड़ा संदेश देना है. इस काम के लिए राफेल से बेहतर कोई दूसरा विकल्प फिलहाल वैश्विक बाजार में मौजूद नहीं है.
वीडियो: भारतीय एयरफ़ोर्स की ये महिला ऑफिसर उड़ाएंगी रफाल जेट















