आपने बाईपास सर्जरी का नाम सुना है? ये दिल की एक अहम सर्जरी है. ये तब की जाती है, जब दिल तक खून पहुंचाने वाली कोरोनरी आर्टरीज़ यानी दिल की धमनियों में ब्लॉकेज हो जाता है, और खून का बहना बंद हो जाता है. बाईपास सर्जरी में शरीर के दूसरे हिस्से से एक स्वस्थ नस लेकर ब्लॉकेज के आगे खून पहुंचाने के लिए नया रास्ता बनाया जाता है.
धड़कता रहता है दिल, फिर भी हो जाती है बाईपास सर्जरी, पता है कैसे?
आमतौर पर बाईपास सर्जरी के दौरान दिल की धड़कन को कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है. जिससे सर्जन को दिल की धमनियों पर सर्जरी करने के लिए एक स्थिर जगह मिल सके.

अगर बाईपास सर्जरी की ज़रूरत हो और इसे न कराया जाए तो हार्ट अटैक, हार्ट फेलियर और जान जाने का ख़तरा बढ़ सकता है. आमतौर पर बाईपास सर्जरी के दौरान दिल की धड़कन को कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है. जिससे सर्जन को दिल की धमनियों पर सर्जरी करने के लिए एक स्थिर जगह मिल सके लेकिन आजकल बिना धड़कन रोके भी बाईपास सर्जरी की जा रही है. इसे ऑफ-पंप बाईपास सर्जरी कहा जाता है.
पर ये कैसे होती है? आज इसी के बारे में हम आपको बताएंगे. डॉक्टर से समझेंगे कि पहले हार्ट बाईपास सर्जरी दिल की धड़कन को रोककर क्यों की जाती थी और अब बिना धड़कन रोके ये सर्जरी कैसे होती है? क्या ये सामान्य बाईपास सर्जरी से ज़्यादा सेफ़ है? इसके क्या-क्या फायदे हैं और किन मरीज़ों में बिना दिल की धड़कन रोके ये सर्जरी नहीं की जाती?
पहले दिल रोककर क्यों की जाती थी हार्ट बाईपास सर्जरी?
हमें ये बताया डॉक्टर स्वप्नील कर्णे ने.

डॉक्टर स्वप्नील बताते हैं कि जब दिल को खून पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट आ जाती है. तब हार्ट बाईपास सर्जरी करनी पड़ती है. बाईपास सर्जरी के लिए पहले टेक्नोलॉजी बहुत एडवांस नहीं थी. इसलिए इस सर्जरी के दौरान दिल को बंद करना पड़ता था. इसके लिए हार्ट-लंग मशीन का इस्तेमाल किया जाता है. डॉक्टर मरीज़ का डीऑक्सीजिनेटेड यानी कम ऑक्सीज़न वाला खून शरीर से बाहर निकालते हैं. फिर ये खून प्लास्टिक की ट्यूब के ज़रिए मशीन में जाता है. मशीन इस खून में ऑक्सीज़न मिलाती है. इसके बाद ऑक्सीज़न वाला खून वापस शरीर में डाला जाता है. इस दौरान दिल से पूरा भार हटा दिया जाता है. इससे दिल शांत हो जाता है और बाईपास सर्जरी करना आसान हो जाता है.
डॉक्टर स्वप्नील कर्णे के मुताबिक, बाईपास सर्जरी के वक्त नसों का साइज़ आमतौर पर 1 से 2 मिलीमीटर होता है. इन्हें जोड़ने के लिए बहुत बारीक धागों का इस्तेमाल किया जाता है, जो बाल जितने पतले होते हैं. नसों को जोड़ने के लिए दिल का रुकना बहुत ज़रूरी है.
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बिना दिल रोके बाईपास सर्जरी कैसे की जाती है?
डॉक्टर ने आगे बताया कि टेक्नोलॉजी एडवांस होने के बाद एक नई मशीन इस्तेमाल की जाती है. जिस जगह बाईपास करना होता है, उस जगह मशीन लगा दी जाती है. ये करीब एक इंच के हिस्से की मूवमेंट पूरी तरह रोक देती है, जबकि दिल का बाकी हिस्सा धड़कता रहता है. इस तरह बिना दिल रोके बाईपास सर्जरी की जा सकती है.
बिना दिल रोके बाईपास सर्जरी से किन मरीज़ों को फ़ायदा?
डॉ. कर्णे के मुताबिक, जब हार्ट-लंग मशीन लगाकर दिल को बंद किया जाता है. तब इस प्रक्रिया में दिल आर्टिफिशियल सरफेस से गुज़रता है. जब खून मशीन के संपर्क में आता है, तब खून के प्लेटलेट्स को नुकसान पहुंच सकता है. इससे खून बहने की संभावना रहती है. इसका असर किडनी और दिमाग पर पड़ सकता है. जिससे अस्पताल या ICU में ज़्यादा वक्त तक रहना पड़ता है. ब्लीडिंग ज़्यादा होने पर खून चढ़ाने की ज़रूरत पड़ सकती है. लेकिन बिना दिल रोके बाईपास करने पर इन समस्याओं का ख़तरा कम होता है. सुबह सर्जरी हुई तो शाम तक मरीज़ को वेंटिलेटर पर रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती. फिर एक-दो दिन ICU में रहने के बाद मरीज़ हफ्ते भर में घर जा सकता है.

किन मरीज़ों में बिना दिल रोके बाईपास सर्जरी नहीं की जाती?
- जिन मरीज़ों का दिल कमज़ोर है
- जिनकी खून की नलियां बहुत ख़राब हैं
- जिनमें बाईपास के साथ वॉल्व बदलना ज़रूरी है
- जिनमें दिल से जुड़ी कुछ कॉम्प्लिकेशंस हो जाती हैं
- उनमें बिना हार्ट-लंग मशीन के बाईपास सर्जरी करना मुश्किल होता है
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ये सर्जरी कितनी सेफ है?
इस सर्जरी को सामान्य बाईपास सर्जरी से ज़्यादा सुरक्षित माना जाता है. इसमें रिकवरी जल्दी होती है. ब्लड लॉस कम होता है. इंफेक्शन का रिस्क कम होता है. किडनी सामान्य तरीके से काम करती है. मरीज़ को पैरालिसिस या ब्रेन स्ट्रोक का ख़तरा कम रहता है. इसलिए इसे सामान्य बाईपास सर्जरी से ज़्यादा सुरक्षित है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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