चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने BCI यानी बार काउंसिल ऑफ इंडिया को फटकार लगाई है. मामला NALSAR विवाद से जुड़ा है. हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी, NALSAR के करीब 450 छात्रों ने 2026 के कॉन्वोकेशन इवेंट में CJI जस्टिस सूर्यकांत को चीफ गेस्ट बनाए जाने का विरोध किया था. छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को पत्र लिखकर CJI का न्योता वापस लेने की मांग की थी.
'मेरे और छात्रों के बीच की बात, आप क्यों टांग अड़ा रहे', बार काउंसिल को CJI ने ठीक से सुनाया
CJI slams Bar Council of India NALSAR: चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने NALSAR से जुड़े विवाद को लेकर BCI को फटकार लगाई है. CJI ने कहा कि यह बच्चों और उनके बीच का डायलॉग है. इसमें BCI का बेवजह दखल देना बिल्कुल बेतुका और अनावश्यक है.

इस पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने नाराजगी जताई थी और छात्रों पर ऐक्शन लेने के लिए स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया था. लेकिन सीजेआई ने उनके इस कदम पर उनकी क्लास लगा दी है. बार काउंसिलों को फटकारते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों को अपनी बात कहने की आजादी होनी चाहिए. ये उनके और छात्रों के बीच का मसला है और BCI को इसमें टांग अड़ाने की कोई जरूरत नहीं है.
क्यों नाराज थे छात्र?दरअसल, छात्रों की नाराजगी पिछले महीने CJI की एक टिप्पणी पर थी. यह टिप्पणी दिल्ली में NEET प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान की गई थी. वकीलों ने इस घटना से जुड़ा वीडियो सीजेआई को सबूत के तौर पर दिखाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने ये कहते हुए देखने से मना कर दिया कि उनके पास वीडियो देखने के लिए समय नहीं है. उनका समय न बर्बाद किया जाए. छात्रों को ये बात बुरी लगी, जिसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी से मांग की कि सीजेआई को दीक्षांत सामरोह में न बुलाया जाए.
छात्रों की NALSAR से इसी मांग के बीच पूरे मामले में BCI यानी बार काउंसिल की एंट्री होती है. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने 13 अगस्त को सभी स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के किसी भी ग्रेजुएट को अगले आदेश तक वकील के तौर पर एनरोल न किया जाए.
CJI ने फटकार लगाते हुए कहा?बार काउंसिल का कदम तो था सीजेआई के समर्थन में लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश को ये बात पसंद नहीं आई. बीसीआई के इस निर्देश पर CJI सूर्यकांत ने उसे फटकार लगा दी. CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,
छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का पूरा अधिकार है. छात्रों ने मुझे पत्र लिखा था. यह उनके और मेरे बीच का डायलॉग है. इसमें BCI का बेवजह दखल देना बिल्कुल बेतुका और अनावश्यक है.
CJI ने कहा,
छात्रों को अपनी बात कहने की आजादी होनी चाहिए. BCI को इसमें टांग अड़ाने की कोई जरूरत नहीं है. हम छात्रों के साथ खड़े हैं.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने BCI को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया. नोटिस में कहा कि छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ संदेश दिया है कि एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में मतभेद और डायलॉग लोकतंत्र का हिस्सा हैं. इसे अनुशासनहीनता मानकर करियर बर्बाद करने की धमकी नहीं दी जा सकती.
अब सवाल है क्या BCI के पास किसी लॉ स्टूडेंट या लॉ ग्रेजुएट का वकील के तौर पर नॉमिनेशन रोकने का अधिकार है? ये जानेंगे लेकिन उससे पहले जान लेते हैं कि BCI क्या है?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI कोई प्राइवेट इंस्टीट्यूट नहीं, बल्कि एडवोकेट्स एक्ट,1961 के तहत गठित स्टैच्यूटरी बॉडी है. इस कानून की धारा 7 बीसीआई को कानून की शिक्षा को बढ़ावा देने और उसके स्टैंडर्ड निर्धारित करने जैसी जिम्मेदारियां देता है. BCI यह भी तय करता है कि किन यूनिवर्सिटी और लॉ कॉलेजों की लॉ की डिग्री लॉयर बनने के लिए मान्य होंगी. इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ता है, क्योंकि अगर किसी इंस्टीट्यूट की लॉ एजुकेशन BCI के फ्रेमवर्क के मुताबिक मान्य नहीं है, तो उस संस्था से पढ़कर निकले स्टूडेंट के लिए वकील के तौर पर नॉमिनेशन कराने में दिक्कत हो सकती है.
यानी BCI की शक्ति केवल वकीलों की संस्था तक सीमित नहीं है. वह कानून की पढ़ाई के स्टैंडर्ड और प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन के एक हिस्से को कंट्रोल करता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि BCI के पास असीम शक्ति है.
क्या है BCI का इतिहास?26 जनवरी 1950 में देश का संविधान लागू होने के बाद ये मांग हुई कि देश में एक बार काउंसिल होनी चाहिए. इसके करीब 6 महीने बाद मई 1950 में एस. वरदाचारियार की अध्यक्षता में मद्रास यानी अब के चेन्नई में वकीलों का एक सम्मेलन हुआ. जिसमें पूरे देश के लिए एक बार काउंसिल बनाने का प्रस्ताव आया. उसी साल यानी अक्टूबर 1950 में मद्रास बार काउंसिल ने इस प्रस्ताव को मान लिया.
फिर अप्रैल 1951 में सांसद सैयद मोहम्मद अहमद काजमी ने भारतीय बार काउंसिल अधिनियम में संशोधन का बिल पेश किया. नेहरू सरकार ने इस बिल पर व्यापक समीक्षा के लिए समिति बनाने का फैसला किया. जिसके बाद अगस्त 1951 में ऑल इंडिया बार कमिटी का गठन हुआ. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस.आर. दास को इसका अध्यक्ष बनाया गया.
30 मार्च 1953 को कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की. इसमें हर राज्य के लिए एक राज्य बार काउंसिल और नेशनल लेवल पर एक अखिल भारतीय बार काउंसिल बनाने का प्रस्ताव था. जिसमें कहा गया था कि ये काउंसिल कानूनी पेशे और कानूनी पढ़ाई के स्टैंडर्ड की निगरानी करने वाली संस्था के तौर पर काम करेगी.
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जब ये सब हो रहा था, तभी लॉ कमिशन ऑफ इंडिया को न्यायिक प्रशासन में सुधारों पर एक रिपोर्ट तैयार करने का को कहा गया. सारी रिपोर्ट और सारी रिसर्च के आधार पर संसद में एडवोकेट्स बिल पेश किया गया. जिससे एडवोकेट्स एक्ट, 1961 बना. इसी एक्ट की धारा 4 के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन हुआ. BCI के पहले अध्यक्ष एमसी सेतलवाद थे. और उपाध्यक्ष थे सी.के. दफ्तरी. आगे चलकर 1963 में सी.के. दफ्तरी अध्यक्ष बन गए.
BCI के पास क्या शक्तियां हैं?अब अगर BCI की शक्तियों की बात करें तो बार काउंसिल नए वकीलों को लाइसेंस जारी करती है. इस लाइसेंस के बिना कोई भी अदालत में वकालत नहीं कर सकता है. इसमें वकीलों के लिए नियम भी बनाए गए हैं. ये नियम वकीलों को बताते हैं कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए, अपने मुवक्किलों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए और अदालतों का सम्मान कैसे करना चाहिए. यदि कोई वकील अपने मुवक्किल को धोखा देता है या नियमों का उल्लंघन करता है तो बार काउंसिल उसे सजा दे सकती हैं.
अब जिस बार काउंसिल के पास इतनी पावर है, उसका चुनाव कैसे होता है, ये जानते हैं. कोई भी वकील बार एसोसिएशन चुनाव लड़ सकता है, बशर्ते उसके पास वोटिंग राइट हो. प्रेसिडेंट और सचिव पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम अनुभव की भी शर्त होती है. प्रेसिडेंट पद के लिए कम से कम 10 साल का एक्सपीरियंस जरूरी है, जबकि सचिव पद के लिए कम से कम 7 साल का एक्सपीरियंस होना चाहिए.
वीडियो: NALSAR विश्वविद्यालय के छात्रों पर CJI सूर्यकांत का बयान












