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शुगर कंट्रोल में नहीं तो बारिश में पांव गीले करने से बचें, जान जाने का भी रिस्क है!

बारिश के मौसम में जिन मरीज़ों की शुगर कंट्रोल में नहीं है. जिनके पैरों में सुन्नपन हैं, उन्हें अक्सर पैरों में इंफेक्शन हो जाता है.

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बढ़ा शुगर लेवल पैरों की नसों पर बुरा असर डालता है (फोटो: AI)

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  • डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बारिश में पैरों की खास देखभाल का महत्व बताया गया है ताकि डायबिटिक फुट जैसी गंभीर संक्रमण से बचा जा सके, जो पैरों का इंफेक्शन है।
  • बारिश के मौसम में नमी और पसीना बढ़ने से पैरों में कीटाणु और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, जिससे डायबिटिक फुट की समस्या होने की संभावना अधिक होती है।
  • डायबिटिक फुट से बचाव के लिए पैरों को साफ़-सुथरा रखना, उचित जूते-मोजे पहनना और किसी भी लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना आवश्यक है।

झमाझम बारिश में नहाना. पैरों से छप-छप करना. कितना बढ़िया लगता है न! अब बरसात में भीगो न तो इस मौसम का क्या मज़ा? हां, उन लोगों की बात अलग है, जिन्हें बारिश में भीगना नहीं पसंद. पर कुछ लोगों के लिए ये मामला पसंद-नापसंद का नहीं, बल्कि मजबूरी का है. जैसे- डायबिटीज़ के मरीज़ों को बरसात में अपने पैरों का खास ध्यान रखना पड़ता है. वो चाहकर भी बारिश में अपने पैरों को ज़्यादा देर तक गीला नहीं रख सकते, क्योंकि ये उनमें गंभीर इंफेक्शन का कारण बन सकती है. इससे आगे चलकर ‘डायबिटिक फुट’ जैसी गंभीर दिक्कत हो सकती है.

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अब ये डायबिटिक फुट होता क्या है, यही जानेंगे आज. सबसे पहले तो डॉक्टर से समझेंगे कि डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए पैरों की खास देखभाल क्यों जरूरी है. फिर पता करेंगे कि बारिश में डायबिटिक फुट का ख़तरा क्यों बढ़ जाता है. इसके लक्षण क्या हैं. इसका इलाज कैसे होता है. और मॉनसून में डायबिटिक फुट से कैसे बचें. 

पैरों की खास देखभाल क्यों ज़रूरी?

ये हमें बताया डॉक्टर मनु शंकर ने. 

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डॉ. मनु शंकर, क्लीनिकल डायरेक्टर, मिनिमल इन्वेसिव, जनरल, लेज़र एंड रोबोटिक सर्जरी, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स, फरीदाबाद

डॉक्टर मनु शंकर के मुताबिक, बारिश के मौसम में जिन मरीज़ों की शुगर कंट्रोल में नहीं है. जिनके पैरों में सुन्नपन हैं, उन्हें अक्सर पैरों में इंफेक्शन हो जाता है. इससे उनकी जान को ख़तरा हो सकता है. कभी-कभी उनके पैर के कुछ हिस्से को काटना भी पड़ सकता है. इसलिए डायबिटीज़ के मरीज़ों को बारिश में अपने पैरों का ज़्यादा ध्यान रखना चाहिए. डायबिटीज़ के मरीज़ों में कई बार सुन्नपन हो जाता है. उनके पैरों की बनावट में बदलाव आ जाता है. पैरों में सख्तपन होने पर एड़ियों या पैर के तलवों में दरारें पड़ जाती हैं. इससे उनमें इंफेक्शन होने का रिस्क बढ़ जाता है. इस इंफेक्शन की वजह से दिक्कतें बढ़ जाती हैं.

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बारिश में डायबिटिक फुट का ख़तरा क्यों?

डॉक्टर मनु शंकर ने आगे बताया कि बारिश के मौसम में वातावरण में नमी होती है. पसीना भी ज़्यादा आता है. जूते-मोजे पहनने से पैर पूरी तरह ढक जाते हैं. फिर पैरों में पसीना आने के बाद उनसे बदबू आने लगती है. इससे पैरों में कीटाणु बढ़ने लगते हैं. अब अगर आपके पैरों में कोई ज़ख्म है. कोई कट लगा है या आप गंदे पानी में चले हैं. तब इससे पैरों में इंफेक्शन का रिस्क होता है. डायबिटीज़ के मरीज़ों में पैरों में इंफेक्शन को डायबिटिक फुट कहा जाता है.

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पैरों में सुन्नपन को इग्नोर नहीं करना चाहिए

किन लक्षणों को इग्नोर नहीं करें?

- अगर डायबिटीज़ 10 साल से ज़्यादा पुरानी है

- ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं है.

- पैरों में सुन्नपन है.

- पैरों में सख्तपन है, दरारें पड़ी हैं.

- पैरों की बनावट में बदलाव आ रहे हैं.

- पैरों में कहीं रेडनेस या सूजन है.

- पैरों से बदबू आती है.

- तब इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत डॉक्टर से मिलें.

डायबिटिक फुट से कैसे बचें?

बारिश के मौसम में बहुत कीचड़ हो जाता है, इसलिए बाहर निकलने से बचें. अगर आपके पैर गीले हो गए हैं तो जल्द से जल्द पैरों को साफ़ पानी से धोकर सुखा लें. किसी क्रीम से मालिश कर सकते हैं. पैरों में पावेल पैडेड शूज़ पहनें. मोजे भी अच्छे हों. जब भी पैरों में पसीना आए तो मोजे बदल लें. जिस तरह आप अपने चेहरे और हाथों का ख़्याल रखते हैं, वैसा ही ध्यान डायबिटीज़ के मरीज़ों को अपने पैरों का रखना चाहिए.

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डायबिटिक फुट का इलाज क्या है?

डायबिटिक फुट का पहला इलाज उसका बचाव करना है. पैरों की देखभाल करने से ज़्यादातर मरीज़ इंफेक्शन से बच सकते हैं. डायबिटिक फुट के इलाज में अलग-अलग डॉक्टर्स की ज़रूरत पड़ती है. जैसे सर्जन, प्लास्टिक सर्जन, न्यूरोलॉजिस्ट, फिज़ीशियन और फिज़ियोथेरेपिस्ट. अगर पैरों में इंफेक्शन या पस भरा है तो कई बार चीरा लगाना पड़ता है. अगर पैर का कोई भाग सड़ गया है तो उसे काटना पड़ सकता है. खून का बहाव कम होने पर प्लास्टिक सर्जन रिकंस्ट्रक्शन करके पैरों को बचाते हैं. फिज़ीशियन या एंडोक्रोनोलॉजिस्ट शुगर कंट्रोल रखने में मदद करते हैं. वहीं, न्यूरोलॉजिस्ट न्यूरोपैथी या सुन्नपन का पता लगाकर आगे इलाज करते हैं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.) 

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