जब उम्र ढलती है, तो सबसे पहला असर चेहरे पर दिखाई देता है. गाल पिचकने लगते हैं, होंठ पतले हो जाते हैं, झुर्रियां उभरने लगती हैं, आंखों के नीचे गहरे गड्ढे और काले घेरे नजर आने लगते हैं. कुछ लोग इसे उम्र का तकाज़ा मानकर स्वीकार कर लेते हैं, तो कुछ चेहरे को जवां बनाए रखने के लिए सहारा लेते हैं कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट्स का. इनमें फिलर्स भी शामिल हैं. फिलर्स की मदद से चेहरा भरा-भरा दिखता है. झुर्रियां गायब हो जाती हैं. जॉलाइन शार्प दिखती है. और होंठों को भी बेहतर आकार मिलता है.
इंस्टैंट ग्लो देने वाले फ्लैश फिलर्स कितने काम के? डॉक्टर से एक-एक बात जानिए
फिलर्स का असर आमतौर पर 6 महीने से लेकर 2 साल तक रह सकता है. ऐसे में लोगों को डर रहता है कि अगर नतीजे पसंद नहीं आए, तो उन्हें लंबे समय तक उसी के साथ रहना पड़ेगा.


अब कई लोग फिलर्स तो कराना चाहते हैं, लेकिन हिचकिचाते भी हैं. इसकी एक वजह है इनका असर. आमतौर पर फिलर्स का असर 6 महीने से लेकर 2 साल तक रह सकता है. ऐसे में लोगों को डर रहता है कि अगर नतीजे पसंद नहीं आए, तो उन्हें लंबे समय तक उसी के साथ रहना पड़ेगा. लेकिन क्या हो अगर फिलर्स को ट्रायल पीरियड की तरह आजमाया जा सके? यानी ऐसे फिलर्स हों, जो जल्दी असर दिखाएं और कुछ ही दिनों में खत्म भी हो जाएं. और ऐसा पॉसिबल है भी. आजकल फ्लैश फिलर्स का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है.
आज हम इन्हीं फ्लैश फिलर्स के बारे में बात करेंगे. डॉक्टर से जानेंगे कि फ्लैश फिलर्स क्या हैं. ये कैसे काम करते हैं. इन्हें फ्लैश क्यों कहा जाता है. चेहरे के किन हिस्सों पर इनका इस्तेमाल होता है. इनका असर कितने वक्त तक रहता है और इनके संभावित साइड इफेक्ट्स क्या हो सकते हैं.
फ्लैश फिलर्स क्या हैं?
हमें बताया डॉक्टर मनीष जांगड़ा ने.

फिलर्स का इस्तेमाल चेहरे को बेहतर आकार और उभार देने के लिए किया जाता है. चेहरे की बनावट में थोड़े-बहुत बदलाव करने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है. फ्लैश फिलर्स मुख्य रूप से हाइल्यूरॉनिक एसिड से बने होते हैं. इनमें मौजूद हाइल्यूरॉनिक एसिड के कण आपस में बहुत कम जुड़े होते हैं. जबकि लंबे समय तक असर करने वाले फिलर्स में ये कण आपस में मज़बूती से जुड़े होते हैं. इसी वजह से लॉन्ग-टर्म फिलर्स ज़्यादा समय तक टिके रहते हैं और चेहरे को अधिक सपोर्ट देते हैं. फ्लैश फिलर्स को बहुत पतली सुई की मदद से लगभग 15 मिनट में लगाया जाता है. ये एक आसान और कम समय लेने वाली कॉस्मेटिक प्रक्रिया है.
इन्हें 'फ्लैश' क्यों कहा जाता है?
- इसे लगाने में बहुत कम समय लगता है
- इसका असर काफी जल्दी दिखाई देने लगता है
- आमतौर पर 5 से 7 दिनों के भीतर इसका असर धीरे-धीरे कम हो जाता है
ये भी पढ़ें: पीरियड्स, प्रेग्नेंसी, मेनोपॉज और हॉर्मोन की उथल-पुथल के बीच महिलाओं को लेने चाहिए ये सप्लीमेंट
चेहरे के किन हिस्सों पर इनका इस्तेमाल होता है?
फ्लैश फिलर्स को गालों, माथे, मुंह के आसपास और होठों पर इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर आपको किसी इवेंट या प्रोग्राम में जाना हो और तुरंत बेहतर लुक चाहिए. तब फ्लैश फिलर्स इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
फ्लैश फिलर्स के संभावित साइड इफेक्ट्स क्या हैं?
चाहे शॉर्ट-टर्म फिलर्स (फ्लैश फिलर्स) हों या लॉन्ग-टर्म फिलर्स, इनके कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. अगर फिलर लगाने वाले डॉक्टर के पास पर्याप्त अनुभव नहीं है, तो साइड इफेक्ट्स का रिस्क बढ़ सकता है. अगर डॉक्टर अनुभवी और प्रशिक्षित है, तब भी कई बार साइड इफेक्ट्स दिख सकते हैं. फिलर वाली जगह लाल पड़ सकती है, वहां सूजन हो सकती है. उस जगह पर नीला भी पड़ सकता है.
कभी-कभार वैस्कुलर ऑक्लूज़न हो सकता है. इसमें फिलर गलती से खून की नली में पहुंच सकता है. जिससे आसपास के अंगों को नुकसान हो सकता है. आंखों या गालों के आसपास फिलर लगाते समय खास सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि फिलर आंख की खून की नलियों तक पहुंच सकता है. जिससे नज़र को नुकसान होने का ख़तरा हो सकता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
वीडियो: सेहत: 30 की उम्र के बाद ये 3 सप्लीमेंट्स ज़रूरी!

















