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बवासीर और एनल फिशर में क्या फर्क है? लक्षण और इलाज जान लीजिए

कई लोगों को बार-बार एनल फिशर होता है. कुछ मामलों में तो सर्जरी भी करनी पड़ती है. इसी एनल फिशर के बारे में आज हम सबकुछ जानेंगे. डॉक्टर से समझेंगे कि एनल फिशर क्या है. ये क्यों होता है. इसके लक्षण क्या हैं. ये भी जानेंगे कि एनल फिशर और पाइल्स में क्या फर्क है.

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एनल फिशर यानी गुदा गुदा की स्किन में कट या दरार आ जाना

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  • डॉक्टर मृगांक शेखर शर्मा ने बताया कि एनल फिशर गुदा की अंदरूनी त्वचा में कट या दरार है जो आमतौर पर सख्त मल निकलने से होता है।
  • कठिन और सख्त स्टूल पास करने की वजह से गुदा की त्वचा में चोट लगने से एनल फिशर की समस्या उत्पन्न होती है, जिससे पास करते समय तेज दर्द होता है।
  • एनल फिशर का इलाज आमतौर पर दवाइयों से होता है और गंभीर मामलों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है, साथ ही सावधानियां बरतने से पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।

आपको है रोज़ सुबह पेट साफ करने की आदत. जिस दिन पेट ठीक से साफ न हो, आपको बेचैनी होने लगती है. ऐसे ही एक दिन काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी स्टूल पास नहीं हुआ, तो आपने ज़ोर लगाना शुरू कर दिया. आखिरकार बहुत सख्त स्टूल पास हुआ. अगले दिन स्टूल तो नॉर्मल था. लेकिन उसे पास करते समय तेज़ दर्द हुआ.

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आपने सोचा- ‘चलो, आज दर्द हुआ है. शायद कल न हो.’ पर दर्द कम होने के बजाय बढ़ता गया. पूरे हफ्ते आपको स्टूल पास करने के दौरान भयंकर दर्द होता रहा. ये दर्द पूरा दिन बना रहता. इसकी वजह से बैठना मुश्किल हो गया. चलने में भी दिक्कत होने लगी. आखिरकार जब दर्द सहना मुश्किल हो गया, तो आप डॉक्टर के पास पहुंचे. इस डर से कि कहीं पाइल्स यानी बवासीर न हो जाए. वहां जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि आपको एनल फिशर है. ये एनस यानी गुदा की अंदरूनी सेंसेटिव स्किन में होने वाला घाव है.

कई लोगों को बार-बार एनल फिशर होता है. कुछ मामलों में तो सर्जरी भी करनी पड़ती है. इसी एनल फिशर के बारे में आज हम सबकुछ जानेंगे. डॉक्टर से समझेंगे कि एनल फिशर क्या है. ये क्यों होता है. इसके लक्षण क्या हैं. ये भी जानेंगे कि एनल फिशर और पाइल्स में क्या फर्क है. साथ ही समझेंगे कि एनल फिशर का इलाज क्या है. इसे ठीक होने में कितना समय लगता है. कब सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है. और कौन-सी सावधानियां बरतकर इसे दोबारा होने से रोका जा सकता है. 

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एनल फिशर क्या है?

ये हमें बताया डॉक्टर मृगांक शेखर शर्मा ने. 

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डॉ. मृगांक शेखर शर्मा, डायरेक्टर, जनरल एंड मिनिमली इनवेसिव सर्जरी, सी.के.बिड़ला हॉस्पिटल, गुरुग्राम

एनल फिशर यानी गुदा (एनस) की स्किन में कट या दरार आ जाना. ये अक्सर तब होता है, जब बहुत सख्त स्टूल पास होता है. ऐसा आमतौर पर कब्ज़ की वजह से होता है. एनल फिशर का सबसे बड़ा लक्षण है- स्टूल पास करते समय तेज़ दर्द होना. कुछ मरीज़ों में स्टूल के साथ थोड़ा खून भी आ सकता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान स्टूल पास करते समय तेज़ दर्द होना है.

एनल फिशर और पाइल्स में फर्क

पाइल्स एकदम अलग बीमारी है. इसे हेमोरोइड्स भी कहते हैं. पाइल्स का सबसे आम लक्षण स्टूल पास करने के दौरान खून आना है. कुछ मरीज़ों में मस्से भी बाहर निकल सकते हैं. 

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वहीं, एनल फिशर में गुदा की स्किन में कट या दरार पड़ जाती है. ज़्यादातर मामलों में एनल फिशर की वजह सख्त मल यानी कब्ज़ होती है. लेकिन कभी-कभी बहुत ज़्यादा दस्त होने से भी एनल फिशर हो सकता है.

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एनल फिशर और पाइल्स के लक्षण

एनल फिशर का सबसे ज़रूरी और आम लक्षण स्टूल पास करते समय तेज़ दर्द होना है. कुछ लोगों में ये दर्द इतना ज़्यादा होता है कि वो न तो ठीक से बैठ पाते हैं, न ही खड़े हो पाते हैं. 

वहीं, पाइल्स का सबसे आम लक्षण स्टूल पास करते समय खून आना है. इसमें आमतौर पर दर्द नहीं होता. पाइल्स का दूसरा लक्षण गुदा के बाहर मस्से निकलना है.

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पाइल्स का सबसे आम लक्षण स्टूल पास करते समय खून आना है

एनल फिशर का इलाज क्या है और सर्जरी की ज़रूरत कब पड़ती है?

ज़्यादातर मामलों में एनल फिशर का इलाज दवाइयों से ही हो जाता है. इसमें दर्द कम करने और स्टूल सॉफ्ट करने की दवाएं दी जाती हैं. कुछ दवाएं गुदा के आसपास की मांसपेशियों को रिलैक्स करती हैं, जिससे फिशर को भरने में मदद मिलती है. एनल फिशर के लिए सर्जरी तभी की जाती है, जब मरीज़ को बहुत तेज़ दर्द हो. उसे दवाइयों से आराम न मिले या फिशर लंबे समय से बना हुआ हो. हालांकि ज़्यादातर मरीज़ बिना सर्जरी के, सिर्फ दवाइयों से ठीक हो जाते हैं.

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एनल फिशर ठीक होने में कितना समय लगता है और क्या सावधानियां बरतें?

इलाज शुरू करने के दो हफ्ते के भीतर मरीज़ को काफी आराम मिलता है. ज़्यादातर मरीज़ों में एक हफ्ते के भीतर सुधार दिखने लगता है. फिर दो हफ्ते के अंदर लक्षण काफी हद तक ठीक हो जाते हैं. लेकिन अगर बार-बार कब्ज़ रहे और सख्त स्टूल पास हो, तो एनल फिशर दोबारा हो सकता है. इसलिए अपने खाने में फाइबर ज़्यादा लें. पानी खूब पिएं. फल और हरी सब्ज़ियां ज़्यादा खाएं.

साथ ही, टॉयलेट में बहुत देर तक न बैठें और स्टूल पास करने के लिए ज़्यादा ज़ोर न लगाएं. रोज़ थोड़ी एक्सरसाइज़ करना और वज़न कंट्रोल में रखना भी मदद करेगा. 

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.) 

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