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सेंसर बोर्ड की नई गाइडलाइंस सलमान और दिलजीत दोसांझ की मुश्किलें और बढ़ा देंगी!

सलमान की 'मातृभूमि' को अपना टाइटल बदलना पड़ा. दिलजीत की 'सतलुज' सालों से सेंसर बोर्ड में अटकी हुई है.

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हाल ही में सेंसर बोर्ड ने 18 मेंबर्स की नई कमिटी बनाई है.

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  • सेंसर बोर्ड ने फिल्म सर्टिफिकेशन प्रक्रिया को सख्त करते हुए प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं, जिनमें पांच जरूरी नियम शामिल हैं जिन्हें सभी मेकर्स को पालन करना होगा।
  • फिल्म सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में बदलाव का कारण पिछले वर्षों में फिल्मों के नामों में बदलाव, अधूरी फिल्म जमा करना और समय पर आवेदन न करना जैसे मुद्दे रहे हैं, जिनसे प्रक्रिया प्रभावित होती रही है।
  • नई गाइडलाइंस के लागू होने से सभी फिल्मों के लिए सर्टिफिकेशन प्रक्रिया कड़ी होगी और फिल्म मेकर्स को रिलीज़ डेट से पहले आवेदन करना अनिवार्य होगा, जिससे आवेदन में देरी या खारिज होने के मामले कम होंगे।

Central Board Of Film Certification (CBFC) यानी सेंसर बोर्ड ने प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के लिए नई गाइडलाइंस जारी कर दी हैं. अब फिल्म सर्टिफिकेशन का प्रोसेस पहले की तुलना में काफी सख्त हो गया है. नई एड्वाइजरी में पांच जरूरी नियम बताए हैं. ये नियम उन सभी मेकर्स और प्रोडक्शन हाउस पर लागू होंगे, जो सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 और सिनेमैटोग्राफ रूल्स, 2024 के तहत अपनी मूवीज़ को सर्टिफ़ाई करवाना चाहते हैं. ये गाइडलाइंस क्या हैं, समझाते हैं.

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1) फिल्म का पूरा और फाइनल वर्जन जमा करना जरूरी
अब सर्टिफिकेशन के लिए फिल्म का पूरी तरह तैयार और फाइनल वर्जन ही जमा करना होगा. इसमें टाइटल, क्रेडिट्स, सबटाइटल, डिस्क्लेमर, सेंसर सर्टिफिकेट स्लेट, बैकग्राउंड म्यूजिक और साउंड मिक्स जैसी सभी चीजें शामिल होनी चाहिए. थिएटर में दिखाई जाने वाली फिल्म में क्लोज्ड कैप्शन और जरूरत पड़ने पर ऑडियो डिस्क्रिप्शन जैसी सुविधाएं भी होनी चाहिए. सिनेमाघरों में सिर्फ वही वर्जन दिखाया जा सकेगा, जिसे CBFC ने सर्टिफाई किया है.

2) फिल्म का टाइटल फाइनल मानकर नहीं चल सकते
एप्लिकेशन में मेकर्स की ओर से बताया गया फिल्म टाइटल फाइनल नहीं माना जाएगा. सिर्फ रजिस्ट्रेशन होने भर से टाइटल को मंजूरी नहीं मिल जाती. जांच के दौरान एग्जामिनिंग या रिवाइजिंग कमिटी टाइटल में बदलाव करवा सकती है. इसलिए मेकर्स को सर्टिफिकेट मिलने से पहले फिल्म का नाम फाइनल बताकर प्रचार नहीं करना चाहिए.

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3) अधूरी फिल्म जमा नहीं कर सकते
अधूरी फिल्म, टेम्पररी ग्राफिक्स-म्यूजिक और आधे-अधूरे साउंड इफेक्ट्स वाला एप्लिकेशन जमा नहीं होगा. जरूरी एक्सेसिबिलिटी फीचर्स या डॉक्यूमेंट्स की कमी होने पर आवेदन में देरी हो सकती है. यही नहीं, उसे वापस करने के अलावा खारिज भी किया जा सकता है. एप्लिकेशन पूरा होने की तारीख से ही मूवी को सर्टिफिकेशन प्रोसेस की लाइन में लगाया जाएगा.

4) रिलीज़ डेट अनाउंस कर देने से सर्टिफिकेट जल्दी नहीं मिल जाएगा
फिल्म या उसके ट्रेलर की रिलीज़ डेट पहले से ही अनाउंस कर देने से सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेशन अपने प्रोसेस को तेज नहीं करेगा. हर फिल्म की जांच तय नियमों के मुताबिक ही होगी. कमिटी को मूवी चेक करने, उसमें बदलाव बताने और दोबारा जांच करने के लिए प्रॉपर टाइम दिया जाएगा. मेकर्स अपनी तय की हुई रिलीज़ डेट के बेसिस पर सेंसर बोर्ड पर जल्दी सर्टिफिकेट देने का प्रेशर नहीं बना सकते.

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5) सर्टिफिकेशन के लिए पहले से आवेदन करना होगा
फिल्म मेकर्स को रिलीज़ डेट से काफी पहले ही सेंसर सर्टिफिकेशन के लिए अप्लाई करना होगा. आवेदन करते समय फिल्म की जांच, कमिटी की रिपोर्ट और उनकी तरफ़ से बताए गए बदलाव को अप्लाई करने के लिए पर्याप्त दिया जाएगा.

पिछले एक साल में कई फिल्मों के नाम बदले गए हैं. सलमान की 'बैटल ऑफ गलवान' को 'मातृभूमि' किया गया. वहीं मनोज बाजपेयी की 'घूसखोर पंडत' को 'गजब रात' कर दिया गया. थलपति विजय की 'जन नायगन' और 'मातृभूमि' तो महीनों तक पोस्टपोन हुई. समय-समय पर ऐसे कई अन्य मामले सामने आते रहे हैं. उन सबको ध्यान रखते हुए ही सेंसर बोर्ड ने नई गाइडलाइन्स जारी की हैं. आने वाले दिनों में इनका असर हर फिल्म पर पड़ेगा. बोर्ड के इस फैसले की 'सतलुज' के डायरेक्टर हनी त्रेहान ने खूब आलोचना की है. उन्होंने इसे कायराना और तानाशाही भरा फैसला बताया. वैसे, उनकी दिलजीत दोसांझ स्टारर मूवी आज तक सेंसर बोर्ड से पास नहीं हुई. हालांकि बीच में मेकर्स ने इसे Z5 पर अपलोड जरूर कर दिया था, मगर वहां से भी उन्हें इसे हटाना पड़ गया.

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