#1. 'दीवार' ने अमिताभ बच्चन की 'एंग्री यंग मैन' वाली इमेज को नया आयाम दिया. फिल्म में अमिताभ का किरदार विजय, बंबई के पहले डॉन हाज़ी मस्तान की कहानी से प्रेरित था. जिस तरह से मस्तान ने कूली का काम करने से लेकर मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन तक का सफर तय किया था, फिल्म में विजय का किरदार भी कुछ उसी तरह से चलता है. फिल्म के एक सीन में दिखाया जाता है कि विजय अपने राइवल सामंत को मार देता है. दरअसल ये सीन भी रीयल लाइफ से ही लिया गया था, लेकिन उसमें थोड़ा बदलाव किया गया था.

मदन पुरी के साथ अमिताभ बच्चन.
असल में कहानी कुछ ऐसी थी कि मस्तान और गुजरात का मशहूर तस्कर सुकुर नारायण बखिया एक साथ काम करते थे. कुछ समय के बाद दोनों की ठन गई. इसके बाद मस्तान ने उससे बदला लेने का मन बना लिया. एक दिन मस्तान गुस्से में अकेले ही बखिया के घर में घुस गए. बखिया को मस्तान की गर्म मिजाजी का बहुत कायदे से इलहाम था. वो डर गया. लेकिन मस्तान ने अपने पूरे जीवन में कभी किसी पर गोली नहीं चलाई थी. उस दिन भी नहीं चलाई. जबकि फिल्म में विजय (मस्तान) को सामंत (बखिया) का मर्डर करते हुए दिखाया गया.

हाज़ी मस्तान को बंबई का पहला डॉन माना जाता है.
#2. इस फिल्म में अमिताभ का कूली वाला गेटअप बहुत पॉपुलर हो गया था. इसमें वो नीली रंग की शर्ट और खाकी रंग की पैंट पहने नज़र आते हैं. शर्ट कमर पर बंधी हुई और बाजू से लटकती मोटी रस्सी. बाद में अमिताभ ने बताया कि ये गेटअप दरअसल एक मजबूरी के चलते तैयार हुआ था. दर्जी ने शर्ट को इतना लंबा कर दिया था कि वो उनके घुटने छू रही थी. इसलिए उसे बांध दिया गया. अब लंबी है तो ढीली भी रही होगी इसलिए उसे मैनेज करने के चक्कर में कंधे पर रस्सी लटकानी पड़ी.

'दीवार' के अपने कूली वाले गेटअप में अमिताभ.
#3. 1973 में आई थी फिल्म 'ज़ंजीर', जिसे लिखा था सलीम-जावेद ने. बड़ी हिट थी. 'एंग्री यंग मैन' वाली इमेज बनी और अमिताभ का करियर रफ्तार पकड़ने लगा. साल 1975 आया और सलीम-जावेद की ज़िद पर यश चोपड़ ने 'दीवार' में अमिताभ को कास्ट कर लिया. साथ ही में एक और फिल्म बन रही थी जिसे रमेश सिप्पी डायरेक्ट कर रहे थे. 'शोले' जैसा कुछ नाम था. राइटर और शूटिंग डेट्स दोनों ही फिल्मों की सेम थीं.
इसका अमिताभ ने एक जुगाड़ निकाला. दिन में रमेश सिप्पी के साथ 'शोले' की शूटिंग करते और रात में यश चोपड़ा के साथ 'दीवार' की. लेकिन फिर भी कभी सेट पर लेट नहीं पहुंचे. जैसे ही 'शोले' की शूटिंग पूरी हुई, अमिताभ ने यश की दूसरी फिल्म 'कभी कभी' की शूटिंग शुरू कर दी. अब भी वो दो फिल्में साथ शूट कर रहे थे. जब यश ने उन्हें ऐसा करते देखा तब जाकर उन्हें दो फिल्में साथ में करने की दुश्वारियां समझ में आईं. वो हमेशा डरे रहते थे कि अमिताभ कहीं 'दीवार' वाला डायलॉग 'कभी कभी' में ना बोल दें, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ.

फिल्म 'दीवार' (बाएं) और 'कभी-कभी' के एक सीन में अमिताभ बच्चन.
#4. 'दीवार' में एक सीन है, जहां अमिताभ का कैरेक्टर मंदिर में खड़े होकर भगवान को बुरा-भला कहता है. उस सीन का एक डायलॉग 'आज खुश तो बहुत होगे तुम' बहुत फेमस हुआ था. इस सीन को फिल्माने में बहुत दिक्कत आई थी. ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि अमिताभ को भगवान के खिलाफ बोलना था और वो ऐसा करने में कंफर्टेबल नहीं थे. सुबह से मनाते-मनाते दोपहर हो गई, फिर शाम और फिर रात. लेकिन वो नहीं माने. बहुत मनाने के बाद रात 11 बजे शूट शुरू हुआ. अमिताभ चाहते थे कि इस दौरान सिर्फ डायरेक्टर और कैमरामैन ही मौजूद रहें. 15 टेक के बाद जाकर अमिताभ का ये सीन पूरा हो पाया.

फिल्म 'दीवार' के उस आइकॉनिक मंदिर वाले सीन में अमिताभ बच्चन.
#5. सलीम-जावेद ने इस फिल्म के लिए कम्पलीट स्क्रिप्ट तैयार करके दी थी. मतलब इसके बाद उसमें कुछ जोड़-घटाव करने की गुंजाइश नहीं थी. उस दौर में ऐसी प्रैक्टिस थी कि स्क्रिप्ट पूरी हो जाने के बावजूद उसमें स्टार्स के मुताबिक बदलाव किए जाने का पूरा स्कोप रखा जाता था. 'दीवार' की इस 'बाउंड स्क्रिप्ट' में सिर्फ एक दिक्कत थी. इसके आखिरी सीन के लिए कोई डायलॉग नहीं लिखे गए थे. जब सीन शूट होने की बारी आई तो सब कंफ्यूज़ थे. ये वही सीन था, जब विजय अपने भाई रवि की गोली खाकर मां की गोद में पड़ा था. इस सीन के लिए अमिताभ को एक सहूलियत दी गई. यश चोपड़ा ने इस पूरे सीन को इंप्रोवाइज़ करने को बोला. मतलब ये कि अमिताभ को अपने हिसाब से डायलॉग बोलने थे. आखिरी सीन में जो हुआ वो सब सिर्फ और सिर्फ अमिताभ का किया धरा था.

फिल्म 'दीवार' के आखिरी सीन में मां निरूपा रॉय के साथ अमिताभ बच्चन.
#6. 'दीवार' को भारत में अलग-अलग भाषाओं में रीमेक किया गया. इसे तेलुगू में 'मगाड़ू' (1976), तमिल में 'दी' (1981) और मलयालम में 'नाडी मुथल नाडी वारे' के नाम से बनाया गया. इसके अलावा इससे प्रेरित होकर इंडिया से बाहर भी फिल्में बनाई गई हैं. हॉन्गकॉन्ग के द शॉ ब्रदर्स स्टूडियो ने इसे अपने यहां 'द ब्रदर्स' के नाम से बनाया. इस फिल्म से डायरेक्टर जॉन वु जो खुद भी हॉन्गकॉन्ग से ही हैं, बहुत इंप्रेस हुए और अपने अंदाज़ में इसे 'द बेटर टुमौरो' (1986) के नाम से फिर बनाया. इतना ही नहीं, इसे बॉलीवुड में भी 'आतिश: फील द फायर' (1994) के नाम से बनाया गया. ये 'कांटे', 'मुसाफिर', 'शूटआउट एट लोखंडवाला' और 'काबिल' जैसी फिल्में बना चुके मशहूर डायरेक्टर संजय गुप्ता की पहली फिल्म थी.
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