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वो फिल्मकार, जिन्हें डायरेक्टर बनाने के लिए राजकुमार को फिल्म से निकाल दिया गया था

यश चोपड़ा माने वो डायरेक्टर, जिसने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को अमिताभ बच्चन जैसा सितारा गिफ्ट किया. साल 1975 में बनी फिल्म ‘दीवार’ के डायरेक्टर यश चोपड़ा ही थे. इसी फिल्म से दुनिया को अपने पास मां होने का मर्म भी समझ में आया. दो दशक बाद यश ने अपनी ही ‘दीवार’ गिराते हुए लोगों के मन में शाहरुख़ खान का ‘डर’ बैठा दिया. फिर सबको लगने लगा कि ‘दिल तो पागल है’, लेकिन तभी उन्होंने ‘वीर-जारा’ से कहलवाया कि तब तक प्यार करो ‘जब तक है जान’.

यश ने साल 1959 में अपनी पहली फ़िल्म ‘धूल का फूल’ डायरेक्ट की थी, लेकिन साल 2012 तक बतौर डायरेक्टर उनके खाते में महज़ 22 फ़िल्में ही दर्ज थीं. 2012 में रिलीज़ हुई शाहरुख़ खान की ‘जब तक है जान’ यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म थी, जो उनके देहांत के कुछ दिन बाद रिलीज़ हुई. मशहूर फिल्ममेकर बी.आर. चोपड़ा और सिनेमैटोग्राफर धरम चोपड़ा के छोटे भाई यश चोपड़ा का जन्म 27 सितम्बर, 1932 को पंजाब में हुआ था. दादी-नानी से तो बहुत किस्सा सुना होगा, आज हमसे सुन लीजिए..

यश चोपड़ा ने एक से बढ़कर एक फ़िल्में और सितारे भारतीय सिनेमा को दिया.
यश चोपड़ा ने एक से बढ़कर एक फ़िल्में और सितारे भारतीय सिनेमा को दिए.

#1. इन्हें डायरेक्टर बनाने के लिए राजकुमार को फिल्म से निकाल दिया गया

यश आठ भाई-बहन थे, जिनमें से दो भाई- धरम और बीआर चोपड़ा फिल्म इंडस्ट्री में काम करते थे और खासे सफल भी थे. घरवालों का मन था कि यश इंजीनियरिंग करें, इसलिए उन्हें बड़े भाई बलदेव यानी बीआर चोपड़ा के पास बंबई भेजा गया. बंबई पहुंचते ही यश ने तय कर लिया कि कुछ भी करना है, लेकिन इंजीनियरिंग नहीं. भाई साहब को जब ये बात पता चली, तो पूछा कि इंजीनियरिंग नहीं करोगे, तो करोगे क्या? जवाब आया, ‘डायरेक्टर बनूंगा आपकी तरह’. अब क्या करते बड़के भइया. छोटे भाई की बात मान गए. आई.एस. जौहर के पास असिस्टेंट बनाकर भेजे गए, क्योंकि भाई के पास रहकर काम नहीं सीख सकते थे. यहां के काम से यश संतुष्ट नहीं थे, तो वापस बीआर चोपड़ा के पास आ गए और काम करने लगे. काम करते जब कुछ दिन हो गए, तो बड़े भाई ने कहा कि अब तुम एक फिल्म बनाओ, मतलब डायरेक्ट करो.

अपने बड़े भाई और मशहूर फ़िल्मकार बलदेव राज चोपड़ा (बीआर चोपड़ा) के साथ यश चोपड़ा.
अपने बड़े भाई और मशहूर फ़िल्मकार बलदेव राज चोपड़ा (बीआर चोपड़ा) (दाहिने) के साथ यश चोपड़ा.

फिल्म पर काम शुरू हुआ. स्क्रिप्ट तैयार होने के बाद एक्टर्स के पास घूमनी चालू हुई. अपनी खास तरह की डायलॉग डिलीवरी के लिए फेमस राज कुमार फिल्म करने को तैयार हो गए. सेट वगैरह लग रहे थे, तभी राज कुमार स्टूडियो घूमने आए और जांच-पड़ताल करने लगे. राज कुमार को यश पर भरोसा नहीं था, क्योंकि वो उनकी पहली फिल्म थी. उन्होंने बीआर चोपड़ा से पूछा कि वो सेट पर रहेंगे न? जिस पर बलदेव ने कहा कि नहीं, वो अपनी फिल्म की शूटिंग करेंगे. इसके बाद राज तो चले गए, लेकिन यश को गिल्ट होने लगा. उन्होंने बड़े भाई बलदेव से कहा कि ये फिल्म वही डायरेक्ट कर लें. कारण पूछने पर पता चला कि वो राज कुमार की बात से दुखी थे. इससे बलदेव बड़े सेंटी हो गए. उन्होंने अपनाएक आदमी राज कुमार के घर सिर्फ ये बताने भेजा कि उन्हें इस फिल्म से निकाल दिया गया है.

इसके बाद राजेंद्र कुमार को फिल्म में लिया गया और फिल्म सुपरहिट रही. ये वही राजेंद्र कुमार थे, जिन्हें उनकी हिट फिल्मों के कारण ‘जुबली कुमार’ बुलाया जाता था.

यश चोपड़ा की पहली फिल्म से राज कुमार बाहर कर राजेंद्र कुमार को साइन कर लिया गया.
यश चोपड़ा की पहली फिल्म से राज कुमार को बाहर कर राजेंद्र कुमार को साइन कर लिया गया.

#2. दूसरी फिल्म ऐसी बनाई कि रिलीज़ के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे

‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ में जैसे सरदार खान कट्टा बनाने वाले से पूछता है न कि ‘का बवासीर बना दिए हो’. एक फिल्म के बाद बीआर चोपड़ा ने भी यश से यही पूछा होगा. यश चोपड़ा की पहली फिल्म बड़ी हिट रही थी. इसी ओवर एक्साइटमेंट में लड़के ने दूसरी फिल्म बना डाली. फिल्म थी शशि कपूर और अशोक कुमार स्टारर ‘धर्मपुत्र’ (1961).

ये फिल्म रिलीज़ हुई और देश में जगह-जगह इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे. बताया जाता है कि ये पहली फिल्म थी, जिसमें आज़ादी और बंटवारे के वक़्त हुए दंगे और मार-काट को दिखाया गया था, जिससे लोग नाखुश थे. जिन लोगों ने वो दुख असल जिंदगी में झेला है, वही चीज़ उन्हें परदे पर भी दिखाई जा रही थी, तो हर्ट होना लाज़िमी था. ये फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर तो पिट गई, लेकिन इसे उस साल बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला. इस फिल्म के बाद यश चोपड़ा ने कभी कोई पॉलिटिकल फिल्म नहीं बनाई.

इस फिल्म के खिलाफ बहुत हंगामा हुआ था जिसके कारण ये हिट नहीं हो सकी लेकिन फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला मिला था.
इस फिल्म के खिलाफ बहुत हंगामा हुआ था, जिसके कारण ये हिट नहीं हो सकी, लेकिन फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला था.

#3. फिल्म रिलीज़ होने से पहले ही अख़बारों में रिव्यू छपने लगे

यश चोपड़ा ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि कैसे उनकी फिल्म ‘वक़्त’ को लेकर नेगेटिविटी फैलाई गई थी. 1965 में आई फिल्म ‘वक़्त’ हिंदी फिल्मों की पहली मल्टी-स्टारर फिल्म मानी जाती है. मल्टी-स्टारर मतलब होता है, एक ही फिल्म में एक से ज़्यादा पॉपुलर एक्टर्स का होना. इस फिल्म में बलराज साहनी, शशि कपूर, राज कुमार, सुनील दत्त, साधना और शर्मिला टैगोर ने साथ काम किया था. फिल्म रिलीज़ होने ही वाली थी कि बॉर्डर पर भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया.

फिल्म 'वक़्त' का फैनमेड पोस्टर. इस फिल्म का गाना 'ऐ मेरी जोहराजबी' बहुत पॉपुलर हुआ था.
फिल्म ‘वक़्त’ का फैनमेड पोस्टर. इस फिल्म का गाना ‘ऐ मेरी जोहराजबी’ बहुत पॉपुलर हुआ था.

ऐसे समय में फिल्म रिलीज़ करना पहले तो बहुत ही इनसेंसिटिव होता और कमर्शियल एंगल से भी नुकसानदेह होता, इसलिए फिल्म को आगे बढ़ा दिया गया. अगले दिन अखबार आया और यश चोपड़ा को वॉर के साथ अपनी फिल्म का रिव्यू भी पढ़ने को मिला. रिव्यू क्या, फिल्म के बारे में गलत चीज़ें लिखी गई थीं. यश चोपड़ा रिव्यू पढ़ने के बाद परेशान से ज़्यादा हैरान थे. उन्हें लग रहा था कि जब फिल्म रिलीज़ ही नहीं हुई, किसी ने देखी ही नहीं, तो रिव्यू कहां से आ गया. बाद में पता चला कि जो लोग इनकी पिछली फिल्म से नाराज़ थे, उन्होंने ही ये सब कांड किया था. वॉर के बाद फिल्म रिलीज़ हुई और टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई.

#4. एक फिल्म से दूसरी फिल्म के ब्रेक में ‘इत्तेफ़ाक’ बन गई

1969 में यश चोपड़ा धर्मेंद्र और सायरा बानो के साथ ‘आदमी और इंसान’ नाम की फिल्म बना रहे थे. फिल्म बनकर तैयार हो गई, लेकिन इसका फाइनल प्रिंट देखने के बाद यश को लगा कि 10-15 दिन की शूटिंग और करनी पड़ेगी. मतलब फिल्म में कुछ जोड़-घटाव बाकी रह गया था. दिक्कत ये हुई कि फिल्म की लीड एक्ट्रेस सायरा तो अपने इलाज के लिए लंदन चली गई थीं और तीन-चार महीने से पहले उनके आने के कोई आसार नहीं थे.

फिल्म 'इत्तेफ़ाक' के एक सीन में राजेश खन्ना और नंदा. ये फिल्म सायरा बानू के इलाज के लिए लंदन जाने के पीरियड में बनी थी.
फिल्म ‘इत्तेफ़ाक’ के एक सीन में राजेश खन्ना और नंदा. ये फिल्म सायरा बानो के इलाज के लिए लंदन जाने के कारण बनी थी.

अब यश चोपड़ा खाली बैठे थे. इसी खाली समय में वो एक गुजराती नाटक ‘धुमस’ देखने गए. वो नाटक उन्हें इतना पसंद आया कि उस पर फिल्म बनाने की सोचने लगे. अगले ही दिन अपनी राइटिंग टीम को ले जाकर वो नाटक दिखा लाए और कहा कि इसी पर बेस्ड स्क्रिप्ट लिखिए. स्क्रिप्ट तैयार हो गई और फिल्म के लिए अपने थोड़े बुरे दौर से गुज़र रहे सुपरस्टार राजेश खन्ना और बिलकुल मासूम दिखने वाली नंदा को साइन किया गया. ये फिल्म सिर्फ 20 दिनों में बनकर तैयार हो गई. ये पहली भारतीय फिल्म थी, जो बिना इंटरवल और गाने के रिलीज़ हुई थी. इस फिल्म में राजेश खन्ना की एक्टिंग बहुत सराही गई और उसी लहर में फिल्म भी हिट हो गई.

#5. स्विट्ज़रलैंड में यश चोपड़ा की मूर्ति लगी है

यश चोपड़ा और स्विट्ज़रलैंड का खास कनेक्शन था. उन्होंने वहां पर ‘फासले’, ‘विजय’, ‘चांदनी’, ‘डर’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘मोहब्बतें’ और ‘वीर-ज़ारा’ जैसी फ़िल्में शूट की हैं. पहली बार यश 1984 में स्विट्ज़रलैंड गए थे, फिल्म ‘फासले’ की शूटिंग के लिए, जिसके बाद उन्हें ये जगह और यहां पर शूटिंग के मुफीद नियम-कानून भा गए. इसके बाद से उन्होंने तक़रीबन अपनी हर फिल्म का कोई न कोई हिस्सा यहां जरूर फिल्माया है.

उनकी फिल्मों को देखकर कई लोग स्विट्ज़रलैंड घूमने चले गए, जिससे वहां टूरिज्म बढ़ने लगा. यहां पर उनका इतना भौकाल है कि उनके नाम पर कई जगहों, सड़कों और होटल सुइट्स के नाम रखे गए हैं. यश चोपड़ा के देहांत के बाद मई, 2016 में इंटरलेकेन इलाके में उनकी 250 किलो की कांसे (ब्रॉन्ज़) की मूर्ति लगाई गई है.

स्विट्ज़रलैंड में यश चोपड़ा की मूर्ति के अनावरण के मौके पर उनकी पत्नी पामेला और बहु रानी मुख़र्जी.
स्विट्ज़रलैंड में यश चोपड़ा की मूर्ति के अनावरण के मौके पर उनकी पत्नी पामेला और बहु रानी मुख़र्जी.

यश चोपड़ा को स्विट्ज़रलैंड सरकार ने अक्टूबर, 2010 में ‘एम्बेसडर ऑफ़ इंटरलेकेन’ टाइटल से नवाज़ा. स्विट्ज़रलैंड के ही यूंगफ्राउ (Jungfrau) रेलवे में उनके नाम पर एक ट्रेन भी चलती है, जिसके ऊपर उनका सिग्नेचर और नाम लिखा बोर्ड है. इसी स्टेशन पर फिल्म ‘डर’ और ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की शूटिंग हुई थी. यश चोपड़ा की कई फिल्मों में नज़र आई लॉनेन लेक को भी उनके ही नाम पर ‘चोपड़ा लेक’ कहा जाता है. इतना ही नहीं उनके नाम पर यूंगफ्राउ इलाके में ही Victoria Jungfrau Grand Hotel & Spa में एक सुइट का नाम रखा गया है.


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