1 जून को लोकसभा चुनाव 2024 के आखिरी फेज के लिए वोटिंग होनी है. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की कई सीटों पर भी मतदान होने हैं. इनमें गाजीपुर, बलिया, घोसी, गोरखपुर, महाराजगंज और देवरिया शामिल हैं. वोटिंग से पहले पूर्वांचल की इन सीटों के सियासी समीकरणों पर बात कर लेते हैं. शुरुआत एक सियासी किस्से से.
लोकसभा चुनाव 2024: आखिरी चरण में सबकी नजर पूर्वांचल की इन छह सीटों पर
बलिया से चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर, गाजीपुर से मुख्तार के भाई अफजाल और घोसी से राजीव राय चुनावी मैदान में हैं जिन्हें कल्पनाथ राय की पत्नी ने अपना समर्थन दिया है. तो बलिया में मुकाबला दिलचस्प है.

1996 का लोकसभा चुनाव. घोसी लोकसभा सीट. उम्मीदवार थे दिग्गज कांग्रेसी नेता कल्पनाथ राय. वो 1989 से ही इस सीट से सांसद थे. लेकिन इस बार एक बदलाव था. वो कांग्रेस की जगह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में थे. हुआ ये था कि पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव से उनके रिश्ते ठीक नहीं थे. और बाद में चीनी घोटाला और देशद्रोह के आरोप में उनको जेल भेज दिया गया था. वे जेल से ही चुनाव लड़ रहे थे. इसके पहले एक और घटना हुई जिसने इस चुनाव का टेंपो सेट कर दिया.

जेल जाते ही कल्पनाथ राय राजनीतिक रूप से 'अनटचेबल' हो गए थे. उनकी पार्टी के नेताओं ने उनसे दूरी बना ली थी. लेकिन इसी बीच एक नेता उनसे मिलने तिहाड़ जेल पहुंच जाता है. मीडिया में उस नेता की खूब लानत मलामत होती है. लेकिन उस नेता ने इसकी कतई परवाह नहीं की. बल्कि उल्टा जवाब दिया कि कल्पनाथ उनके ‘घर का लड़का’ है. और इस समय उसे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है. इस नेता के इशारे को उनके समर्थकों ने समझा और घर का लड़का कल्पनाथ उस चुनाव में 15 हजार वोटों से जीता. ये नेता थे बलिया के बाबू साहेब यानी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर. पुराने लोग बताते हैं कि ये 15 हज़ार वोट तो चंद्रशेखर ने कल्पनाथ राय से अपनी मुलाकात में दे दिए थे. उस चुनाव में जिस नेता को कल्पनाथ राय ने हराया, उसका नाम था मुख्तार अंसारी.
इस कहानी के इन तीनों किरदारों का निधन हो चुका है. लेकिन इस बार पूर्वांचल की तीन सीटों बलिया, गाजीपुर और घोसी में इनसे जुड़े कई किरदार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी हैं. बलिया से चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर, गाजीपुर से मुख्तार के भाई अफजाल और घोसी से राजीव राय चुनावी मैदान में हैं जिन्हें कल्पनाथ राय की पत्नी ने अपना समर्थन दिया है. तो बलिया में मुकाबला दिलचस्प है.
बलियापहले बात करते हैं बलिया लोकसभा सीट की जहां से बीजेपी ने वर्तमान सांसद बीरेंद्र सिंह मस्त की जगह पूर्व प्रधानमंत्री नीरज शेखर के बेटे को टिकट दिया है. वहीं समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर से सनातन पांडे पर अपना भरोसा जताया है. सनातन पांडे पिछली बार 15000 वोटों के अंतर से चुनाव हारे थे. इनके अलावा बसपा से लल्लन सिंह भी चुनावी मैदान में हैं.
इस सीट से नीरज शेखर जीतते हैं तो बीजेपी की हैट्रिक होगी. वहीं अगर सनातन पांडे जीतने में कामयाब होते हैं तो ये 72 सालों में पहली बार होगा जब बलिया से कोई ब्राह्मण उम्मीदवार सांसद बनेगा.
इस सीट से चंद्रशेखर आठ बार सांसद रहे. 2007 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में नीरज शेखर पहली बार सांसद बने. और 2009 में इस सीट को बरकरार रखा. लेकिन 2014 में उनको हार मिली. इसके बाद सपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा. हालांकि, बाद में वो BJP में शामिल हुए और राज्यसभा पहुंचे.
बलिया में चंद्रशेखर की विरासत और ठीक-ठाक राजपूत वोटर्स की संख्या के बावजूद नीरज शेखर के लिए मुश्किलें कम नहीं हैं. सनातन पांडे को सपा की ओर से ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पेश किया जा रहा है.
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बलिया लोकसभा सीट ब्राह्मण और दलित बहुल है. इसके अलावा ठाकुर मतदाता अहम भूमिका में रहे हैं. यहां अनुमानित ब्राह्मण मतदाता लगभग 15 प्रतिशत और ठाकुर मतदाता लगभग 13 फ़ीसदी हैं. जबकि दलित मतदाता 15 फ़ीसदी के आस-पास हैं. यादव मतदाता लगभग 12 फ़ीसदी, मुस्लिम मतदाता लगभग 8 फ़ीसदी और बनिया मतदाता लगभग 8 फ़ीसदी हैं. गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद और जहूराबाद सीट के बलिया में जुड़ने के चलते यहां भूमिहार वोटर्स की संख्या भी ठीकठाक है.
बलिया की चुनावी लड़ाई पर हमने बात की वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी से. उन्होंने दी लल्लनटॉप को बताया,
गाजीपुर“बलिया सीट भले ही राजपूतों की सीट मानी जाती है और चंद्रशेखर जी की सीट मानी जाती है. लेकिन परिसीमन के बाद गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट जुड़ने के बाद बलिया अभी भूमिहार बहुल सीट है. बलिया सीट पर नीरज शेखर की बहुत अच्छी स्थिति नहीं थी. और वहां बीजेपी के खिलाफ एक सेंटीमेंट था. लेकिन नारद राय के आने के बाद जो भूमिहार सेंटीमेंट था उसको टैप करने में BJP काफी हद तक सफल रही है. अब मुझे लगता है कि बलिया सीट पर जो भाजपा पिछड़ती नजर आ रही थी अब ठीकठाक बढ़त में है.”
वहीं गाजीपुर से बीजेपी ने इस बार मनोज सिन्हा के करीबी माने जाने वाले पारसनाथ राय को टिकट दिया है. जबकि सपा ने पिछली बार बसपा के टिकट से सांसद रहे अफजाल अंसारी को टिकट दिया है. बसपा के उमेश कुमार सिंह की कोशिश इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की होगी. पिछले चुनाव में सपा और बसपा का गठजोड़ था. जिसमें अफजाल अंसारी ने मनोज सिन्हा को लगभग 1 लाख 19 हजार वोटों से हराया था.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गाजीपुर लोकसभा में लगभग 3.5 लाख यादव और 2 लाख की मुस्लिम आबादी है. इसके अलावा यहां तीन लाख दलित वोटर हैं जिनकी हार जीत तय करने में निर्णायक भूमिका होती है. इसके अलावा यहां 1 लाख राजभर, 1 लाख कुशवाहा और दो लाख से थोड़े कम अपर कास्ट वोटर हैं.
इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े असद रहमान के मुताबिक,
“यादव और मुस्लिम वोटों का रुझान सपा की ओर है. वहीं अपर कास्ट वोटर बीजेपी को वोट कर सकते हैं. इस सीट पर ओबीसी और दलित वोटर्स का बड़ा हिस्सा जिस ओर जाएगा उनकी जीत की संभावना बढ़ जाएगी.”
मुख्तार की मौत से कथित तौर पर मिल रही सहानुभूति के फैक्टर के सवाल पर उन्होंने बताया कि यहां इसका उतना असर नहीं है. क्योंकि उनका प्रभाव मोहम्दाबाद और मऊ में ज्यादा है जबकि बलिया और घोसी लोकसभा में पड़ते हैं.
अफजाल अंसारी अपनी प्रत्येक सभा में मुख्तार अंसारी की मौत का जिक्र करते हैं और इसके लिए यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं. अफजाल की नजर जहां मुख्तार की मौत से उमड़े सहानुभूति वोट पर है, वहीं पारसनाथ राय अपनी सभाओं में मुख्तार को आतंक का पर्याय बताते हुए उन पर हमलावर रहते हैं.
इसे लेकर हर्षवर्धन त्रिपाठी ने हमें बताया,
घोसी“गाजीपुर एक समय भाजपा के लिए सबसे कमजोर सीट मानी जा रही थी. और लगभग तय माना जा रहा था कि BJP नहीं ही जीतेगी. लेकिन इसमें अमित शाह ने साम, दाम, दंड, भेद सब भिड़ाया है. पहले यहां जो ग्राम प्रधान, जिला पंचायत, ब्लॉक प्रमुख सब लोग जब तक मुख्तार था उसके दबाव में रहते थे. लेकिन मुख्तार के नहीं होने से ये सब अमित शाह के नेटवर्क में हैं. ये बड़ा चेंज है. जो वहां के लोग हैं वही देख पा रहे हैं. मुझे लगता है कि गाजीपुर एक सरप्राइज विन हो सकती है बीजेपी के लिए.”
वहीं घोसी से योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरविंद राजभर चुनावी मैदान में हैं. सपा ने इस बार यहां से राजीव राय को टिकट दिया है. वहीं बसपा से बालकृष्ण चौहान को टिकट मिला है. पिछली बार इस सीट से बसपा के अतुल राय सांसद चुने गए थे. उन्होंने बीजेपी के हरि नारायण राजभर को हराया था.
रिपोर्ट्स के अनुसार घोसी में SC समुदाय के करीब 5 लाख वोटर्स हैं. इसके बाद 3 लाख 50 हजार मुस्लिम, ढाई लाख यादव, दो लाख के करीब चौहान और राजभर. राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और निषाद वोटर्स की संख्या करीब एक-एक लाख बताई जाती है.
सवर्ण और राजभर वोटों के सहारे ओमप्रकाश राजभर अपने बेटे को सांसद बनाने का सपना देख रहे हैं. लेकिन राजीव राय के आने से सवर्ण वोटों में बंटवारा होता दिख रहा है. इसके अलावा महेंद्र राजभर ओपी राजभर का साथ छोड़कर सपा के साथ चले गए हैं. उनका राजभर समुदाय पर बड़ा प्रभाव माना जाता है.
इसके अलावा मुख्तार की मौत के आरोपों के एंगल ने भी यहां की राजनीति को गरमा दिया है. मऊ और घोसी विधानसभा क्षेत्र में मुख्तार अंसारी के परिवार का असर है. मऊ से बेटा अब्बास अंसारी सुभासपा के सिंबल पर विधायक है, लेकिन उनका परिवार अब सपा के साथ है. बसपा ने पूर्व सांसद बालकृष्ण चौहान को उम्मीदवार बनाकर पिछड़े वोटों में बंटवारे की राह खोल सुभासपा के लिए संकट और बढ़ा दिया है.
लंबे समय से पूर्वांचल कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अतुल शंकर ने इलाके की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर हमें बताया,
“घोसी में भाजपा के लिए खतरे की घंटी अति पिछड़े और दलित वोटर का समाजवादी पार्टी की ओर देखना है. लगातार दल-बदल और बीजेपी के बड़े नेताओं के प्रति बयानबाजी के चलते बीजेपी के कोर वोटर में भी उनके प्रति एक नाराजगी है.”
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गोरखपुर, देवरिया और महाराजगंज शामिलइसके अलावा पूर्वांचल की तीन सीटें और हैं जहां आखिरी चरण में चुनाव होने हैं. इनमें गोरखपुर, देवरिया और महाराजगंज शामिल हैं. यहां से यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं. गोरखपुर से बीजेपी के रवि किशन सांसद हैं. बीजेपी ने उन पर फिर से भरोसा जताया है. वहीं सपा ने यहां से काजल निषाद को टिकट दिया है. बताया जा रहा है कि गोरखपुर में सपा ने पीडीए समीकरण को साधने की कोशिश की है.
गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह बताते हैं,
“गोरखपुर में निषाद वोट डिसाइडिंग फैक्टर है. अगर निषाद मैक्सिमम सपा के पक्ष में गए तो 2018 की कहानी दोहराई जा सकती है. लेकिन अगर निषाद वोट बंटता है तो बीजेपी के लिए राह आसान हो जाएगी.”
वहीं महाराजगंज से बीजेपी ने पांच बार के सांसद पंकज चौधरी को टिकट दिया है, जबकि इंडिया गठबंधन में यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है. उन्होंने यहां से वीरेंद्र चौधरी को टिकट दिया है. दोनों कुर्मी समुदाय से आते हैं.
हिंदुस्तान गोरखपुर के संपादक अरविंद राय बताते हैं,
"महाराजगंज लोकसभा सीट पर भी सपा ने पीडीए फार्मूले का ध्यान रखते हुए टिकट दिया है. यहां यादव मुस्लिम पहले से सपा के साथ है, जबकि तीसरी जाति को साधने के लिए बीजेपी के पंकज चौधरी का मुकाबला करने के लिए उनके सजातीय वीरेंद्र चौधरी को टिकट दिया गया है. लेकिन इस सीट पर भी योगी आदित्यनाथ का अपना प्रभाव है, जो बीजेपी के लिए एक्स फैक्टर का काम कर रहा है."
देवरिया से बीजेपी ने इस बार शशांक मणि त्रिपाठी को मैदान में उतारा है, जबकि उनसे मुकाबला करने के लिए कांग्रेस ने अपने कद्दावर नेता अखिलेश प्रताप सिंह को टिकट दिया है. पिछले दो लोकसभा चुनाव से यह सीट बीजेपी के खाते में रही है. अरविंद राय के मुताबिक,
"देवरिया में कांग्रेस के अखिलेश प्रताप सिंह चुनाव में पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वहां बीजेपी मजबूत स्थिति में है. पिछले कुछ समय में अखिलेश प्रताप सिंह ने क्षेत्र में अपना प्रभाव मजबूत किया है, लेकिन अभी वह बीजेपी को हराने की स्थिति में नहीं पहुंचे हैं."
ये वो तमाम कीवर्ड्स थे जिनके इर्द-गिर्द पूर्वांचल की इन छह सीटों की राजनीति घूम रही है. कल होने वाली वोटिंग के बाद 4 जून को तय होगा कि इन सीटों पर बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग कामयाब होगी या सपा का पीडीए फार्मूला जीत की गारंटी बनेगा.
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