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आपकी गाड़ी का माइलेज कैसे पता चलेगा? E20 विवाद के बीच सबसे अहम सवाल का जवाब

आपकी गाड़ी एक लीटर तेल में कितने किलोमीटर (how to check car mileage) चलती है, ये पता करने का सबसे माकूल तरीका पांचवीं क्लास की गणित से आता है. खाली टंकी को पूरा भरो और मीटर रीडिंग नोट करो. इसके बाद अगली बार टैंक भरने तक सामान्य रूप से गाड़ी चलाओ, और फिर तय की गई दूरी को भरे गए फ्यूल की मात्रा (लीटर) से भाग दे दो.

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कार माइलेज चेक करने वाली मशीन

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  • केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि वाहन का माइलेज स्वयं नहीं बल्कि ऑथराइज्ड डीलर के पास मौजूद विशेष मशीन से ही मापा जा सकता है, जो घर पर उपलब्ध नहीं होती।
  • माइलेज में अंतर के कारणों में वाहन की लोडिंग, ट्रैफिक, मौसम, ड्राइविंग स्टाइल और तकनीकी प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिससे वास्तविक माइलेज और लैब टेस्ट के बीच अंतर रहता है।
  • सर्विस सेंटर पर KPL और OBD स्कैनर जैसी मशीनों से माइलेज के बारे में जानकारी मिलती है, लेकिन ये वास्तविक ड्राइविंग कंडीशंस में माइलेज को पूरी तरह सही साबित नहीं करती हैं।

E20 या Ethanol Blended Petrol (EBP) पर विवाद जारी है. इस बीच केंद्रीय रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवे मंत्री नितिन गडकरी ने माइलेज को लेकर जो कहा उसकी खबर आपको लग ही गई होगी (Nitin Gadkari mileage comment) अगर नहीं तो कम ‘माइलेज’ में बता देते हैं, फिर अपनी स्टोरी का गियर लगा लेंगे.

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नितिन गडकरी ने बताया कि आप खुद से गाड़ी का माइलेज चेक नहीं कर सकते. ऑथराइज्ड डीलर के पास जाइए. उन्होंने कहा, "एवरेज (माइलेज) आप और मैं अपनी गाड़ी कार में खुद से चेक नहीं कर सकते. एक मशीन होती है. वो मशीन किसी के घर पर नहीं होती." 

इसके बाद अपन इस मशीन की तलाश में निकले तो कई बातें पता चलीं. मसलन,

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# गाड़ी का माइलेज हम कैसे निकालते हैं?

# मॉडर्न गाड़ियों में माइलेज कैसे दिखता है?

# कार कंपनियां कैसे माइलेज बताती हैं?

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# सर्विस सेंटर के पास कौन सी मशीन होती है?

गाड़ी का माइलेज कैसे निकालते हैं 

आपकी गाड़ी एक लीटर तेल में कितने किलोमीटर चलती है, ये पता करने का सबसे माकूल तरीका पांचवीं क्लास के गणित से आता है. खाली टंकी को पूरा भरो और मीटर रीडिंग नोट करो. इसके बाद अगली बार टैंक भरने तक सामान्य रूप से गाड़ी चलाओ, और फिर तय की गई दूरी को भरे गए फ्यूल की मात्रा (लीटर) से भाग दे दो. 

जैसे 10 लीटर तेल भरवाने के बाद आपने 100 किलोमीटर गाड़ी चलाई. इसके बाद टंकी में तेल बचा 5 लीटर. मतलब खर्च हुए 5 लीटर में गाड़ी दौड़ी 100 किलोमीटर चली. माने 1 लीटर में 20 किलोमीटर तो 20 का माइलेज आया. अगर 4 लीटर आता तो 25 का माइलेज और अगर 6 आता तो गाड़ी ने 16.6 का माइलेज दिया.

सामान्य तरीके से गाड़ी चलाने से मतलब 60-80 की स्पीड, कम ब्रेकिंग और नॉर्मल एसी चलाने से है. इसमें कुछ भी कम-बेशी हुआ तो माइलेज ऊपर नीचे होगा. 

ऑटोमोटिव एक्सपर्ट्स आम तौर पर 'फुल-टैंक' तरीके को असल दुनिया में सबसे सटीक टेस्ट मानते हैं. अगर आपको एकदम सटीक माइलेज चाहिए तो फुल टैंक में गाड़ी तब तक चलाइए जब तक वो खाली नहीं हो जाए. एकदम सही पता चल जाएगा. 

माइलेज के साथ एक बात हमेशा ध्यान रहे कि ये कई बातों पर डिपेंड करता है. जैसे गाड़ी भयंकर गर्मी में चल रही या ठंड में. गाड़ी में चार लोग बैठे और सामान भी भरा है. ट्रैफिक से लेकर ब्रेकिंग तक. इसलिए माइलेज को हमेशा प्लस-माइनस में लेकर चलना चाहिए. फुल टंकी में माइलेज 18-20-22 मिल सकता है. लेकिन ये तरीका काफी सटीक होता है.

ये भी पढ़ें: 86 लाख की EV सिंगल चार्ज में 313 km ही चली, कोर्ट ने फिर भी कहा कंपनी की गलती नहीं

मॉडर्न गाड़ियों में माइलेज कैसे दिखता है?

मॉडर्न कारें इंजन में डाले गए तेल, तय की गई दूरी और इंजन कंट्रोल यूनिट (ECU) से मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल करके फ्यूल इकॉनमी का हिसाब लगाती हैं. डैशबोर्ड पर दिखने वाली रीडिंग ठीक-ठाक अनुमान देती है. अक्सर इसमें मामूली अंतर होता है. अगर आपकी गाड़ी 18 का माइलेज दिखा रही तो असल मामला 16 या 20 का होगा.

car e20 nitin gadkari
डैशबोर्ड 
कार कंपनियां कैसे माइलेज बताती हैं

भारत में चलने वाली गाड़ियों के माइलेज के बारे में कंपनियां जो दावा करती हैं वो बाकायदा एक टेस्ट प्रोसेस से होकर आता है. गाड़ी बाजार में आने से पहले Automotive Research Association of India (ARAI) और International Centre for Automotive Technology (ICAT) जैसे संस्थान अपनी लैब में माइलेज टेस्ट करते हैं.

लैब में गाड़ी को Chassis Dynamometer नाम के यंत्र पर लगातार चलाया जाता है. ये एक मैकेनिकल डिवाइस है जो गाड़ी को ऐसे चलाता है मानो वो रोड पर चल रही हो. इस प्रोसेस को Modified Indian Driving Cycle कहा जाता है. इस प्रोसेस में गाड़ी को Idling, Acceleration, Steady Speed, Deacceleration जैसे मानकों पर परखा जाता है. माने गाड़ी कभी कम स्पीड में चलाई तो कभी फुल स्पीड में. कभी जोर से एक्सीलेटर जोर से दबा दिया तो कभी धर के ब्रेक लगा दिया. इसके बाद तेल का हिसाब लगाकर माइलेज निकाला जाता है. तभी तो कंपनी का सेल्समैन हमेशा कहता है कि कंपनी इतना दावा करती है और असल में इतने के बीच में मिलेगा.

ARAI Certified Mileage VS Real-World Mileage

माइलेज या रेंज का दावा 'आदर्श परिस्थिति' नाम के शब्द के पीछे छिपा होता है. सारा खेल IDC (Indian Driving Cycle) और Real-time Range का है. कंपनी ने एकदम खाली रोड पर सिंगल आदमी बिठाकर, 60 की स्पीड में बिना ब्रेक लगाए गाड़ी चलाई तो माइलेज मिला 20 किलोमीटर प्रति लीटर का. मगर आपने गाड़ी में चार लोग बिठाए, 100 के नीचे भगाई नहीं, AC भी फुल पर चलाया तो फिर 16-18 से ज्यादा की उम्मीद मत रखना. सिटी में हर 10 मीटर पर ब्रेक लगाया तो फिर माइलेज चेक ही मत करो. जैसा हमने पहले भी कहा. गर्मी-सर्दी, बरसात का असर भी माइलेज पर थोड़ा पड़ता है. इसलिए कंपनी जितना माइलेज बोले, उसका 20 फीसदी तो शोरूम से निकलने से पहले ही घटा देना.

सर्विस सेंटर के पास कौन सी मशीन होती है

सर्विस सेंटर के पास माइलेज निकालने वाली कोई बढ़िया मशीन नहीं होती है. जब हमने ऑटो एक्सपर्ट गौरव यादव से बात की तो पता चला कि आजकल तो देसी वाला तरीका भी काम नहीं आता. क्योंकि टंकी से तेल सीधे इंजन की तरफ नहीं जाता है, जैसे पुरानी गाड़ियों में होता था. माने अब एक पंप लगा होता है जो टंकी से तेल को इंजन में भेजता है. इसलिए बोतल में तेल भरकर और फिर पाइप को टंकी में डालकर भी माइलेज नहीं निकाल सकते. 

और खोज खबर ली तो पता चला कि KPL (Kilometers Per Liter) नाम से एक देसी टाइप मशीन होती है. Fसमें 1 से 5 लीटर का एक फ्यूल टैंक और पंप होता है. सर्विस सेंटर पर कार की फ्यूल लाइन में इसे जोड़कर गाड़ी को चलाकर देखा जाता है. ऐसी कई मशीनों में डिस्प्ले के साथ एक प्रिंटर भी लगा होता है जो माइलेज बताता है. 

मगर यहां भी बात 'आदर्श परिस्थिति' और सड़क वाली है. सर्विस सेंटर पर 20 और सड़क पर 16. इसलिए सर्विस सेंटर पर जब भी आप माइलेज ड्रॉप वाली बात करते हैं तो टायर प्रेशर, रेगुलर सर्विस जैसी बातों का झुनझुना दिया जाता है.

वैसे आजकल सर्विस सेंटर पर OBD स्कैनर नाम से एक टूल होता है जिसे गाड़ी में लगाकर उसकी सेहत चेक की जाती है. गाड़ी के स्टीयरिंग के नीचे OBD पोर्ट में लगाकर ECU डेटा निकाला जाता है. ये डायग्नोस्टिक टूल फ़्यूल इकॉनमी दिखाने से कहीं ज़्यादा काम करता है. यह ECU से डिटेल्ड डेटा पढ़ता है और चेक करता है कि फ़्यूल इंजेक्टर, ऑक्सीजन सेंसर और एयरफ़्लो सेंसर जैसे पार्ट्स ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं. यह इंजन की खराबी का पता भी लगा सकता है और ECU (इंजन कंट्रोल यूनिट) कैलिब्रेशन को वेरिफ़ाई कर सकता है, जिससे फ़्यूल की खपत पर असर पड़ सकता है. अब मंत्री जी KPL या OBD में से किसकी बात कर रहे थे, ये वही बता सकते हैं. 

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OBD 

हालांकि, ये मशीन भी ड्राइविंग की रियल वर्ल्ड कंडीशन में असल माइलेज को सीधे तौर पर नहीं माप सकती है. फ़्यूल इकॉनमी पर ट्रैफ़िक, शहर या हाईवे पर ड्राइविंग, एयर-कंडीशनिंग का इस्तेमाल, टायर का प्रेशर, ड्राइविंग का तरीका और गाड़ी का लोड भी असर डालते हैं. इसलिए आपकी गाड़ी एक लीटर में कितना देती है वो आपको ही पता करना होगा. फुल टैंक कीजिए और निकल जाइए. जो E20 से फ्यूल इकॉनमी कम होने जैसा लग रहा तो एक बार E20 में और एक बार XP100 में चला लीजिए. ‘तेल का तेल और एथेनॉल का एथेनॉल’ हो जाएगा.

वीडियो: टल सकता है पेट्रोल में 25% Ethanol मिलाने का फैसला, E20 पेट्रोल ने बवाल काम कर दिया?

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