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योगी सरकार के 4.5 साल का रिपोर्ट कार्ड और आंकड़ों के पीछे का सच

11 मार्च 2017. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. देश के सबसे बड़े सूबे में 15 साल बाद बीजेपी ने वापसी की थी. परिणाम आने के 8 दिन बाद यानी 19 मार्च 2017 को गोरखपुर से पांच बार के सांसद योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. योगी, मुख्यमंत्री के तौर पर साढ़े चार साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं. छह महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं. और चुनाव से पहले आया है रिपोर्ट कार्ड. ये रिपोर्ट कार्ड खुद योगी सरकार की ओर से जारी किया गया है. जानेंगे कि क्या है रिपोर्ट कार्ड के दावे, इस पर विपक्ष का क्या कहना है और क्या कहते हैं आंकड़े?

कानून व्यवस्था पर सरकार के दावे 

शुरुआत कानून व्यवस्था से. अपने रिपोर्ट कार्ड में योगी सरकार ने दावा किया है कि साढ़े चार साल के कार्यकाल में गुंडे माफिया ‘चूर’ हुए हैं और लोगों का भय दूर हुआ है. योगी सरकार ने रिपोर्ट कार्ड में कहा है,

# FCR के आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 की तुलना में साल 2020 में डकैती में 70.1 फीसदी, लूट में 69.3 फीसदी, हत्या में 29.1 फीसदी, बलवा में 33 फीसदी, रोड होल्ड अप में 100 फीसदी, अपहरण में 35.3 फीसदी, दहेज मृत्यु में 11.6 फीसदी और बलात्कार के मामलों में 52 फीसदी की कमी आई है.

# 11 हजार 864 इनामी अपराधियों की गिरफ्तारी हुई. 150 अपराधी एनकाउंटर में मारे गए और 3 हजार 427 अपराधी घायल हुए. गैंग्स्टर एक्ट में 44 हजार 759 की गिरफ्तारी हुई और 630 के खिलाफ रासुका की कार्रवाई हुई.

# माफियाओं द्वारा अवैध ढंग से अर्जित 1866 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त या ध्वस्त की गईं.

# सीएए के विरोध प्रदर्शन में सरकारी संपत्तियों को क्षति पहुंचाने वालों से वसूली की गई.

# बेहतर पुलिसिंग के लिए लखनऊ, नोएडा, कानपुर नगर एवं वाराणसी में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू की गई.

# जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक के लिए उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक को मंजूरी दी गई.

क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े? 

ये तो हो गए सरकार के दिए आंकड़े. अब एक और आंकड़े पर नजर मार लेते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़े. इनके मुताबिक साल 2016 में कुल 2 लाख 82 हजार 171 मामले उत्तर प्रदेश में IPC के अंतर्गत दर्ज किए गए. साल 2017 में इनकी संख्या बढ़कर 3 लाख 10 हजार 84 तक पहुंच गई. इसी तरह 2018 में 3 लाख 42 हजार 355 मामले, 2019 में 3 लाख 53 हजार 131 मामले और 2020 में 3 लाख 55 हजार 110 मामले IPC के अंतर्गत दर्ज किए गए. यानी कि अगर कुल आपराधिक मामलों की बात करें तो 2016 की तुलना में 2020 में 72 हजार 939 ज्यादा मामले दर्ज किए गए. ऐसा NCRB का डेटा कहता है.

हालांकि NCRB का डेटा ये भी बताता है कि 2016 के मुकाबले 2020 में बलात्कार, हत्या और चोरी जैसे अपराधों में कमी भी आई है. उसके आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 में 4889 हत्या के मामले दर्ज किए गए. जबकि 2020 में ये संख्या घटकर 3779 पर आ गई. इसी तरह साल 2016 में बलात्कार के कुल 4816 मामले दर्ज किए गए. जबकि 2020 में ये संख्या घटकर 2769 पर आ गई. चोरी के मामलों की बात करें तो 2016 में 56 हजार 550 मामले दर्ज किए गए थे. जबकि 2020 में ये संख्या 33 हजार 250 पर आ गई.

जब उठे पुलिस की साख पर सवाल

आंकड़ों से इतर बीते साढ़े चार सालों के दौरान कई ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं हुईं जिन्होंने सरकार के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाए. चाहे वो उन्नाव का मामला हो या फिर हाथरस का. कानपुर का बिकरू कांड हो या महोबा कांड. इन सब मामलों में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे, सरकार पर सवाल उठे. विपक्ष ने कहा कि यूपी में जंगलराज है. इस तरह के कुछ प्रमुख घटनाओं पर नजर डालते हैं.

# योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के तीन महीने बाद ही जून 2017 में उन्नाव में एक रेप का मामला आया. आरोप लगा बीजेपी के ही विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर. सरकार पर विधायक को बचाने के आरोप लगे. रेप पीड़िता के पिता की पुलिस थाने में मौत हो गई. रेप पीड़िता जब सुनवाई के लिए कोर्ट जा रही थी, तब उसकी कार ट्रक से टकरा गई. इसमें भी दो लोगों की मौत हो गई थी. आरोप लगे कि पीड़िता को चुप कराने के लिए उसे मारने की कोशिश की गई. सरकार की बहुत फ़जीहत होने के बाद मामले को सीबीआई को ट्रांसफर किया गया. बीजेपी का विधायक दोषी पाया गया और उसे उम्रकैद की सजा हुई.

# हाथरस में दलित लड़की से रेप और हत्या के मामले में भी योगी सरकार खूब घिरी. पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे. कई दिन तक परिवार के पास मीडिया को जाने नहीं दिया गया. परिजनों के बिना शव को जला दिया गया. एक बार फिर सरकार पर मामले को दबाने के आरोप लगे.

# महिलाओं के खिलाफ अपराधों के अलावा पुलिस पर भी कई बार बेखौफ होकर अपराधियों ने हमले किए. दिसंबर 2018 में बुलंदशहर के चिंगरावटी गांव में हिंसा हुई. कथित तौर पर गोकशी की घटना के बाद कुछ स्थानीय लोगों ने चिंगरावटी पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया था. इस हिंसा में स्याना थाने के पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह मारे गए.

फिर कानपुर के बिकरू गांव में पुलिस पर बहुत बड़ा हमला हुआ. विकास दुबे नाम के गैंग्स्टर को पकड़ने गई टीम पर हमला हो गया. इसमें 8 पुलिसवाले मारे गए. कुछ पुलिस वालों पर गैंगस्टर से मिलीभगत के आरोप लगे. घटना के कुछ दिन बाद विकास दुबे का एनकाउंटर कर दिया गया.

पुलिस के रंगदारी वसूलने का भी मामला आया. महोबा का मामला था. यहां व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी की हत्या कर दी गई. अपनी मौत से पहले वीडियो बनाकर व्यापारी ने एसपी मणिलाल पाटीदार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था. हत्या के बाद एसपी को सस्पेंड कर दिया गया. हत्या का केस दर्ज किया गया.

उत्तर प्रदेश पुलिस के एनकाउंटर्स पर भी खूब विवाद होता रहा. विपक्षी दलों ने भी इस पर सरकार को खूब घेरा. AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने जहां एनकाउंटर में मुस्लिमों को मारने का आरोप लगाया तो सपा और कांग्रेस ने ब्राह्मणों को. इसी तरह के आरोप अवैध इमारतों के खिलाफ चलाए गए अभियान में भी लगे. कहीं नक्शे में गड़बड़ी के नाम पर तो कहीं अवैध ज़मीन पर बने होने के कारण मकानों-दुकानों को ढहाया गया. और जिनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई हुई उनमें कुछ बड़े नाम भी हैं. जैसे- मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद सरीखे बाहुबली नेता. सुंदर भाटी, अनिल दुजाना, बदन सिंह बद्दो गैंगस्टर.

हालांकि इस तरह की कार्रवाई पर भी सवाल उठते रहे हैं. कहा गया कि योगी सरकार सिर्फ उन बाहुबलियों या अपराधियों पर ही कार्रवाई कर रही है जो विपक्षी पार्टियों से जुड़े रहे है. अखिलेश यादव ने कहा कि इस तर चिह्नित कर कार्रवाई करना सही नहीं है. इस तरीके से तो अगर अगली बार दूसरी पार्टी की सरकार आएगी तो इस सरकार से जुड़े लोगों की संपत्ति तोड़ी जाएगी. अखिलेश ने बीजेपी को अपना चुनाव चिह्न बुलडोजर रख लेने की बात भी कही. जवाब में उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने सपा को अपना चुनाव चिह्न AK-47 रखने की सलाह दे डाली.

‘एक्सप्रेस-वे प्रदेश’

लॉ एंड ऑर्डर के बाद अब बात सड़कों की. यूपी में मायावती के कार्यकाल में बना यमुना एक्सप्रेस-वे हो या अखिलेश यादव कार्यकाल में बना लखनऊ आगरा एक्सप्रेस-वे. सबने इसे अपनी उपलब्धियों की लिस्ट में टॉप पर रखा. अब योगी सरकार का दावा है कि उसके 4.5 साल के कार्यकाल में 1322 किलोमीटर लंबे ऐसे 5 एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं. रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक-

# 341 किमी लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का निर्माण पूरा हो रहा है.

# 297 किमी लंबा बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे का निर्माण कार्य प्रगति पर है.

# 594 किमी लंबे गंगा एक्सप्रेस-वे के लिए भूमि अधिग्रहण हो गया है.

# 91 किमी लंबे गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे का कार्य प्रगति पर है.

एक्सप्रेस-वे के अलावा योगी सरकार अपने 4.5 साल के कार्यकाल में 15 हजार 286 किमी नई सड़कों और 925 छोटे-बड़े पुलों के निर्माण का दावा भी करती है. साथ ही आगरा और कानपुर समेत 10 महानगरों में मेट्रो रेल परियोजना शुरू करने का दावा भी करती है.

सरकार के इन दावों पर विपक्ष का दावा भी आता है. समाजवादी पार्टी लगातार ये आरोप लगाती रही है कि योगी आदित्यनाथ उनके कार्यकाल में शुरू किए गए परियोजनाओं का फीता काटकर श्रेय ले रहे हैं.

4.5 लाख को रोजगार का दावा

सड़क के बाद अब बात रोजगार की. 2017 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के भर्ती आयोगों में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा था. और इसमें कोई दो राय नहीं कि युवाओं के गुस्से ने अखिलेश यादव की विदाई और बीजेपी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यही वजह है कि योगी सरकार अपने कार्यकाल में हुई भर्तियों को पारदर्शी और समयबद्ध बताने में कोई कसर नहीं छोड़ती. लेकिन पिछले 4.5 साल में कई भर्तियों में धांधली और लेटलतीफी की खबरें इन दावों पर सवाल खड़ा करती हैं. कुछ उदाहरण से इन्हें देखते हैं.

# 2019 में UPPSC की LT ग्रेड परीक्षा का पेपर लीक हो गया था. इस मामले में यूपी लोक सेवा आयोग की परीक्षा नियंत्रक रहीं अजू कटियार को गिरफ्तार किया गया था.

# मार्च 2021 में UPSSSC ने ग्रामीण विकास अधिकारी, ग्राम पंचायत अधिकारी की भर्ती के लिए आयोजित हुई परीक्षा को रद्द कर दिया. क्योंकि SIT जांच में पता चला था कि परीक्षा के बाद OMR शीट में गड़बड़ी की गई थी. धांधली करने वाले लोग आयोग के स्कैनिंग रूम से कॉपी निकाल कर बाहर ले गए और उसमें ऑन्सर भरकर वापस रख गए थे. इस मामले में 11 लोग गिरफ्तार किए गए थे.

# 69 हजार शिक्षक भर्ती में भी खूब धांधली के आरोप लगे. आरक्षण, कट-ऑफ और सवालों के उत्तर को लेकर मामला हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो दूसरी तरफ धांधली और पेपर आउट होने की शिकायतें भी आईं. कई गिरफ्तारियां भी हुईं. फिलहाल सरकार का दावा है कि भर्ती पूरी कर ली गई है. हालांकि आरक्षण नियमों में धांधली का आरोप लगाते हुए हजारों की संख्या में अभ्यर्थी अभी भी लखनऊ में प्रदर्शन कर रहे हैं.

इसके अलावा प्राथमिक स्कूलों के लिए शिक्षकों की भर्ती की मांग, 2016 की दरोगा भर्ती के अभ्यर्तियों की नियुक्ति, 41520 सिपाहियों की भर्ती में खाली सीटों को भरने की मांग को लेकर अभ्यर्थी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं.

योगी सरकार अपने रिपोर्ट कार्ड में ये दावा करती है कि पिछले साढ़े चार सालों में 4.5 लाख युवाओं को रोजगार दिया गया. इस आंकड़े पर भी खूब सवाल उठे. विपक्ष और सरकार के बीच कई बार नोकझोक भी हुई. विपक्ष आरोप लगाती है कि सरकार लोगों को भ्रमित कर रही है. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी पिछली सरकारों पर नौकरियों में पक्षपात और भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाती है.

रोजगार के मोर्चे पर सरकार की उपलब्धियों की बात करें तो सबसे ऊपर है अभ्युदय योजना. एक ऐसी योजना जिसके जरिए उत्तर प्रदेश सरकार सिविल सर्विसेज और दूसरी भर्तियों की ऑनलाइन और ऑफलाइन क्लासेज के जरिए निशुल्क तैयारी करवाती है. अभ्युदय के अंतर्गत NEET, JEE से लेकर UPSC और UPPSC के अभ्यर्थियों की क्लास लगती है. अभ्युदय योजना के लिए टेस्ट होता है और टेस्ट पास करने वालों को क्लासेज के लिए चुना जाता है.

‘कोरोना मैनेजमेंट की विदेशों में सराहना’

कानून व्यवस्था, सड़क और रोजगार के बाद अब बात कोरोना मैनेजमेंट की. कोरोना की पहली लहर जब आई तो योगी सरकार के कामकाज की काफी तारीफ हुई. चाहे वो बस भेजकर छात्रों और मजदूरों को वापस लाने की बात हो या फिर संक्रमण रोकने के लिए किए गए उपायों की.

लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश ने जो हालात देखे वो शायद ही कभी कोई भूल पाए. इस साल अप्रैल-मई के महीने में हमने लोगों को अपने परिजनों को बचाने के लिए भटकते देखा. अस्पताल से लेकर श्मशान तक लगी लंबी-लंबी लाइनों को देखा. हमने ऑक्सीजन को लेकर मचे हाहाकार को देखा. हमने दिन रात एक साथ जलती दर्जनों चिताओं को देखा. लाशों को गंगा में भी बहते देखा और सैकड़ों की संख्या में किनारे पर दफन भी.

हालांकि इन सब के बावजूद योगी सरकार दावा करती है कि उसने कोरोना को बाकी राज्यों के मुकाबले बेहतर तरीके से मैनेज किया है. और इसके लिए उसकी तारीफ विदेशों में भी होती है. रिपोर्ट कार्ड में इस बात को भी शामिल किया गया है कि राज्य अब तक 9 करोड़ वैक्सीन की डोज लगाकर देश में पहले स्थान पर है.


योगी सरकार का रिपोर्ट कार्ड: साढ़े चार साल में कितना बदला उत्तर प्रदेश

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