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पेट्रोल-डीजल के दाम में फिर से उबाल क्यों आ रहा है?

कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने पेट्रोल-डीजल की कीमतों का जिक्र किया. कहा कि  दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें गिर रही है, फिर भी सरकार पेट्रोल-डीजल को महंगा किए जा रही है. सोनिया ने सरकार से कीमतें कम करने की मांग की है. अभी सरकार की ओर से प्रतिक्रिया का इंतजार है. बता दें कि तेल कंपनियों ने 7 जून को फिर से रोजाना के आधार पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों की समीक्षा शुरू की है. इससे पहले लॉकडाउन के दौरान करीब 82 दिन तक तेल कंपनियों ने कीमतें नहीं बदली थीं. 7 जून के बाद से लगातार रोजाना कीमत बढ़ी है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कीमतें बढ़ने की वजह क्या हैं?

यानी पिछले 11 दिन से लगातार कीमत बढ़ रही है. 17 जून को पेट्रोल 55 पैसे और डीजल 69 पैसे प्रति लीटर महंगा हो गया. इस तरह पिछले 11 दिन में पेट्रोल 6.02 रुपये और डीजल 6.49 रुपये प्रति लीटर चढ़ चुका है. इसके चलते देश में पेट्रोल-डीजल के दाम पिछले डेढ़ साल के उच्चतम स्तर पर चले गए हैं. इससे पहले नवंबर 2018 में पेट्रोल-डीजल इतना महंगा था.

देश के चार महानगरों में 17 जून को पेट्रोल-डीजल के भाव. (Source: Indian Oil)
देश के चार महानगरों में 17 जून को पेट्रोल-डीजल के भाव. (Source: Indian Oil)

पर ऐसा किस वजह से हो रहा है? ये रोजाना दाम घटाने-बढ़ाने की क्या कहानी है?

आगे जाने से पहले थोड़ा पीछे हो आते हैं

पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करने में सरकार की भूमिका ज्यादा रहती थी. फिर जून, 2010 में पेट्रोल और अक्टूबर, 2014 में डीजल की कीमतों को सरकार के कंट्रोल से हटा दिया. कीमतें कम या ज्यादा करने का जिम्मा तेल कंपनियों को दे दिया गया. वे बाजार में तेल के भाव के हिसाब से फैसला ले सकती थीं. यानी बाजार में भाव तेज हैं, तो कीमतें बढ़ जाएंगी. भाव कम हुए, तो कीमत कम हो जाएगी. शुरू में महीने में दो बार कीमतों पर फैसला होता था. महीने की पहली तारीख और महीने की 16 तारीख. लेकिन शिकायत रहती था कि लोगों को तेल सस्ता होने का फायदा नहीं मिलता.

मान लीजिए कि 1 तारीख को पेट्रोल-डीजल एक-एक रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ. लेकिन अगले 10 दिन अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल के दाम गिर गए. लेकिन 16 तारीख के पास फिर से कीमतें उछल गईं. अब ऐसे में क्या होता था कि पेट्रोल-डीजल की कीमत में या तो मामूली कमी होती थी या फिर वह महंगा ही कर दिया जाता था. साथ ही कीमतों में बदलाव भी बड़े स्तर पर होता था. जैसे दो रुपये लीटर सस्ता या महंगा. एक बार में दो-तीन रुपये बढ़ाने पर काफी हंगामा भी होता था.

भारत में एक पेट्रोल पंप की तस्वीर.
भारत में एक पेट्रोल पंप की तस्वीर.

साल 2017 से हुआ बदलाव

ऐसे में रोजाना के हिसाब से पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करने का फैसला किया गया. दुनिया में कई देशों में ऐसा होता है. इसके तहत रोजाना सुबह 6 बजे नई कीमतें जारी होती हैं. भारत ने साल 2017 में इस तरीके को अपना लिया. 1 मई, 2017 से देश के पांच शहरों उदयपुर, जमशेदपुर, पुदुचेरी, चंडीगढ़ और वाइजेग से इस तरीके की शुरुआत हुई. बाद में जून, 2017 में पूरे देश में इसे लागू कर दिया गया. कहा गया कि अब अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल सस्ता होने पर लोगों को ज्यादा फायदा मिलेगा.

शुरुआत में कई दिनों तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी भी हुई, तो लोगों को यह तरीका पसंद भी आ गया. तब से हर रोज पेट्रोल-डीजल के भाव बदलते रहते हैं. लेकिन इसमें एक चीज और छुपी है, जिस पर ध्यान कम जाता है. रोजाना भाव बदलने पर कीमतों में कुछ पैसे ही प्रति लीटर के हिसाब से घटते या बढ़ते हैं.

जैसे अभी 11 दिन में पेट्रोल 6.02 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ. लेकिन यह दाम थोड़ा-थोड़ा करके बढ़े, जिससे खरीदने वाले को महंगाई का झटका एकदम से नहीं पता चलता है. नीचे देखिए दिल्ली में पिछले 11 दिन में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कैसे बढ़ीं

दिल्ली में पिछले 11 दिन में पेट्रोल-डीजल की कीमत.
दिल्ली में पिछले 11 दिन में पेट्रोल-डीजल की कीमत.

अब बात लॉकडाउन युग की

भारत में 25 मार्च से लॉकडाउन लगा था. लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों की रोजाना समीक्षा 15 मार्च से रुक गई थी. क्यों? केंद्र सरकार के एक फैसले की वजह से. कोरोना के चलते पूरी दुनिया संकट में थी. इस वजह से कच्चे तेल के दाम काफी गिर गए. ऐसे में सरकार ने एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी. सरकार ने मार्च में पेट्रोल-डीजल पर तीन रुपए प्रति लीटर के हिसाब से एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई.

एक्साइज ड्यूटी बढ़ने से नहीं मिला फायदा

एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने से जनता को सीधा नुकसान तो नहीं होता है. लेकिन तेल कंपनियों से कम कीमतों का जो फायदा होता, वह नहीं हो पाया. क्योंकि एक्साइज ड्यूटी बढ़ने से तेल कंपनियों का मुनाफा सरकार के पास चला गया. ऐसे में पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं हुआ. लगातार कच्चे तेल में चल रही उठा-पटक के चलते कंपनियों ने 15 मार्च को कुछ समय के लिए तेल की रोजाना समीक्षा भी बंद कर दी. उस समय दिल्ली में पेट्रोल 69.59 रुपये प्रति लीटर था, जबकि डीजल 62.29 रुपये था.

एक्साइज ड्यूटी का सीधा प्रभाव कस्टमर्स पर नहीं पड़ता है. (फोटो- PTI)
एक्साइज ड्यूटी का सीधा प्रभाव कस्टमर्स पर नहीं पड़ता है. (फोटो- PTI)

6 मई को एक बार फिर से सरकार ने एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी. उस समय स्पेशल एडिशनल ड्यूटी और एक्साइज मिलाकर पेट्रोल पर 10 रुपये और डीजल पर 13 रुपये प्रति लीटर बढ़े थे. इसके चलते भारत फ्यूल पर सबसे ज्यादा टैक्स लेने वाला देश बन गया. भारत में कुल 69 प्रतिशत टैक्स पेट्रोल-डीजल पर लिया जा रहा है. बता दें कि 2014 से अब तक पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 12 बार बढ़ाई गई है, वहीं दो बार घटाई गई है. एक लीटर पेट्रोल पर सरकार 32.98 रुपये एक्साइज ड्यूटी ले रही है, डीजल पर 31.83 रुपये.

अब कच्चे तेल की कीमतों से तुलना

भारत में तेल की कीमत कम होगी या नहीं, इस पर दो चीजें असर डालती है. एक अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत और दूसरी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत. अगर कच्चे तेल की कीमतें कम हुईं, लेकिन रुपया गिरा, तो भी तेल सस्ता नहीं होता है. कच्चे तेल का पैसा डॉलर में चुकाया जाता है. अगर रुपया कमजोर होगा, तो ज्यादा पैसा देना होगा. कभी-कभी इसका उलटा भी होता. यानी तेल महंगा और रुपया मजबूत, तो भी मार जनता पर ही पड़ती है.

16 जून को भारतीय बाजार में कच्चा तेल 40 डॉलर प्रति बैरल के पास था. अभी एक डॉलर की कीमत 76.22 रुपये है. यानी एक बैरल के हो गए 3048 रुपये. एक बैरल में 159 लीटर कच्चा तेल होता है. इस तरह एक लीटर कच्चे तेल का दाम करीब 19-20 रुपये है. लेकिन कच्चे तेल को रिफाइन करने की लागत, सरकारी टैक्स और पेट्रोल पंप पर तेल बेचने वाले डीलरों के कमीशन की वजह से तेल की कीमत उसकी शुरुआती कीमत से कहीं ज़्यादा हो जाती है. आम ग्राहकों को इसी बढ़ी कीमत पर तेल मिलता है.

लॉकडाउन के चलते पेट्रोल पंप की बिक्री में कमी देखने को मिली थी.
लॉकडाउन के चलते पेट्रोल पंप की बिक्री में कमी देखने को मिली थी.

अभी क्या चल रहा है

मार्च-अप्रैल में कोरोना के चलते कच्चे तेल की कीमतें गिरी थीं. लेकिन अब कई देश कोरोना से उबरते दिख रहे हैं. ऐसे में तेल कीमतें फिर से बढ़ रही है. कच्चा तेल अभी चार महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर है. साथ ही सरकारों ने लॉकडाउन के दौरान जो टैक्स बढ़ाया था, उसके चलते पेट्रोल-डीजल महंगा हो रहा है. इन दो कारणों से तेल कंपनियां कीमतें बढ़ा रही हैं और जनता की जेब ढीली हो रही है. अगर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारें वैट में कमी करें, तो जरूर कीमतें कम हो सकती हैं. लेकिन लॉकडाउन के चलते सरकार का खजाना खाली है, तो ऐसा होता दिख नहीं रहा.


Video: पेट्रोल-डीजल पर सबसे ज्यादा टैक्स भारत में लिया जा रहा है!

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