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कौन हैं राजीव बजाज, जिनकी राहुल गांधी से हुई बातचीत में रोचक बातें सामने आई हैं

कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कुछ समय से इकॉनमी से जुड़े एक्सपर्ट से बात कर रहे हैं. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए. नोबेल विनर इकॉनमिस्ट अभिजीत बनर्जी, पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन के बाद 4 जून को उन्होंने बजाज ऑटो के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव बजाज से बात की. इस दौरान राजीव बजाज ने कहा कि लॉकडाउन फेल रहा है. उन्होंने इसे ‘ड्रैकोनियन लॉकडाउन’ बताया. उन्होंने कहा कि हमें कोरोना संक्रमण को नीचे लाना था, हम इकॉनमी को नीचे ले आए. लोगों के हाथ में पैसा नहीं दिया गया. हमने पूरब के देशों से सीखने की बजाय पश्चिमी देशों की तरफ देखा.

आगे राहुल गांधी से उनकी पूरी बातचीत पढ़ेंगे, लेकिन पहले राजीव बजाज और उनके बैकग्राउंड के बारे में थोड़ा-सा बताते हैं.

‘हमारा बजाज’

बजाज ग्रुप जमनालाल बजाज ने शुरू किया था. 1920 के दशक में. वो महात्मा गांधी के काफी करीबी थे. जमनालाल बजाज के बेटे हुए कमलनयन बजाज. और उनके बेटे हुए राहुल बजाज. राहुल बजाज अब बजाज ग्रुप के चेयरमैन हैं. जमनालाल बजाज के पोते. राहुल बजाज वही हैं, जिन्होंने कुछ महीनों पहले अमित शाह के सामने कह दिया था- लोग आपसे डरते हैं. अगर हम आपकी खुले तौर पर आलोचना करें, तो इतना विश्वास नहीं है कि आप इसे पसंद करेंगे. आज बजाज ग्रुप की 24 कंपनियां हैं. मोटरसाइकिल और स्कूटर की दुनिया में खूब नाम हुआ. बहुत से लोगों को ‘हमारा बजाज’ वाला ऐड याद होगा.

राजीव बजाज

राहुल बजाज के बेटे हैं राजीव बजाज, जिनसे राहुल गांधी ने बात की. बजाज ग्रुप में राजीव बजाज चौथी पीढ़ी से आते हैं. वो 2005 से बजाज ऑटो के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. राजीव बजाज ने पल्सर मोटरसाइकिल को काफी फेमस किया था. माना जाता है कि इसके बाद बजाज कंपनी एक तरह से फिर जी उठी. 21 दिसंबर, 1966 को पैदा हुए राजीव बजाज ने 1988 में पुणे यूनिवर्सिटी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएशन और वारविक यूनिवर्सिटी से 1990 में मास्टर्स किया है. 2017 में ‘इंडिया टुडे’ मैगज़ीन ने उन्हें 50 सबसे पावरफुल लोगों की लिस्ट में शामिल किया था.

राजीव बजाज पहले भी लॉकडाउन की आलोचना कर चुके हैं. फोटो: India Today
राजीव बजाज पहले भी लॉकडाउन की आलोचना कर चुके हैं. फोटो: India Today

राहुल गांधी और राजीव बजाज की बातचीत

राहुल गांधी: कोविड के दौरान आपके यहां कैसी परिस्थिति है? आप इसे कैसे देखते हैं?

राजीव बजाज: हम सब एक अनिश्चित समय से गुजर रहे हैं. सबके लिए नया अनुभव है. जो लोग इसे झेल सकते हैं, उनके लिए उतना बुरा नहीं है, लेकिन जब आप देखते हैं कि आपके आस-पास बिजनेस, लोगों के साथ जो हो रहा है, तो ये बुरा है.

राहुल गांधी: यकीन नहीं होता कि दुनिया इस तरह लॉक हो जाएगी. वर्ल्ड वॉर में भी ऐसा नहीं हुआ. तब भी चीजें खुली हुई थीं.

राजीव बजाज: हमारे जापान, सिंगापुर में दोस्त हैं. कावासाकी से हमारे जुड़ाव की वजह से. इसके अलावा यूरोप, अमेरिका में भी दोस्त हैं. भारत में एक तरह का ‘ड्रैकोनियन लॉकडाउन’ है. ऐसे लॉकडाउन के बारे में मैंने कहीं से भी नहीं सुना. दुनिया के कई देशों में बाहर निकलने की इजाज़त थी, लेकिन हमारे यहां स्थिति अलग रही.

‘हमें पश्चिम की जगह पूरब के देशों की तरफ देखना चाहिए था’

राहुल गांधी: समृद्ध लोग इससे निपट सकते हैं, लेकिन गरीबों, प्रवासी मजदूरों के लिए ये काफी बुरा रहा है. उन्होंने भरोसा खो दिया.

राजीव बजाज: शुरू से ही मुझे लगता है और ये मेरा विचार है कि एशियाई देश होने के बावजूद हमने पूरब की तरफ नहीं देखा, बल्कि पश्चिमी देशों इटली, फ्रांस, यूके की तरफ देखा. ये किसी भी तरह सही मापदंड नहीं हैं. चाहे वहां का तापमान हो, जनसंख्या हो, डेमोग्राफी हो. हमें पता है कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए किसी भी तरह का मेडिकल ढांचा पर्याप्त नहीं है, लेकिन किसी ने भी हमें नहीं बताया कि कितने फीसदी लोग खतरे में हैं.

नारायण मूर्ति कहते हैं, जब भी संदेह हो, इसका खुलासा करना चाहिए. सच्चाई, तर्क और फैक्ट के मामले में हमारे यहां कमी रह गई. ये बढ़ता गया और लोगों के मन में डर पैदा कर दिया है. लोगों को लगता है कि ये बीमारी कैंसर या उसके जैसी है. अब लोगों की सोच को बदला जाए और जीवन पटरी पर लाया जा सके. लेकिन इसमें एक लंबा वक्त लग सकता है.

‘हमने इन्फेक्शन कर्व की जगह जीडीपी कर्व को फ्लैट कर दिया’

राहुल गांधी: मैंने कई एक्सपर्ट से बात की है. लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में एक ने बताया कि जब आप पूर्ण लॉकडाउन लगाते हैं, तो आप बीमारी का स्वभाव बदल रहे हैं. आप लोगों के दिमाग में इसे घातक बीमारी बना रहे हैं. फिर इसे बदलने में बहुत मुश्किल होती है. हम पश्चिम की तरफ क्यों देखते हैं?

राजीव बजाज: टीबी, निमोनिया, डायरिया जैसी बीमारी की बजाय ऐसा कुछ पहली बार हुआ है. इस बीमारी ने विकसित देशों को सीधे चोट पहुंचाई है. क्योंकि जब अमीर और फेमस लोग बीमार होते हैं, तो हेडलाइन बनती है. अफ्रीका में हर दिन 8000 बच्चे भूख से मरते हैं, लेकिन किसे परवाह है. क्योंकि इस बीमारी से विकसित देशों के अमीर लोग और समृद्ध लोग प्रभावित हैं, इसलिए कोरोना पर शोर ज्यादा है. लोगों को लगा कि अगर इनको ऐसा हो सकता है, तो हम तो कहीं के नहीं रहे.

हमारे पास कई विकल्प थे. एक, हार्ड लॉकडाउन, जो एकदम अभेद्य हो, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. दूसरा कि बिजनेस पहले की तरह चलते रहते और कहा जाता कि जो होगा, होगा. ये दोनों एक्सट्रीम हैं. किसी ने इनके बारे में नहीं कहा. हर कोई बीच का रास्ता निकालना चाहता है. कमजोर लॉकडाउन से वायरस रहता है. हमने अभी उस समस्या को हल नहीं किया है. लेकिन अर्थव्यवस्था ज़रूर बिगड़ गई है. हमने इन्फेक्शन कर्व की जगह जीडीपी कर्व को फ्लैट कर दिया. हम दोनों तरफ से फंस गए. जापान और स्वीडन से जो हम सुन रहे हैं, कुछ वैसा करना चाहिए था. वहां पर नियमों का पालन हो रहा है, लेकिन लोगों के लिए जीवन को मुश्किल नहीं बनाया जा रहा है.

‘लोगों के हाथ में सीधा पैसा नहीं दिया जा रहा’

राजीव बजाज: हम नागरिकों को लग रहा है कि रणनीति को नहीं, बल्कि जिम्मेदारी को आगे पास किया जा रहा है. बहुत से लोग हेलमेट पहनकर नहीं निकलते, तो पुलिस कुछ नहीं बोलती. लेकिन जब कोई बगैर मास्क के दिखता है, कोई मॉर्निंग वॉक के लिए निकलता है, तो उसे बेइज्जत किया जाता है. डंडे मारे जाते हैं. तो ये अपने ही लोगों से व्यवहार का अनुपात क्या है? हमने अमेरिका, जापान की कहानियां सुनीं कि वो लोगों को एक हज़ार डॉलर प्रति व्यक्ति दे रहे हैं. सहयोग के रूप में. भारत में सीधा हाथ में पैसा नहीं दिया गया.

राहुल गांधी: कांग्रेस में हम लोगों को भी समझ में नहीं आ रहा कि सरकार लोगों के हाथ में पैसा क्यों नहीं दे रही है. मैं सिर्फ इसके पीछे का लॉजिक समझना चाहता था. मैंने सरकार के लोगों से ये पूछा. मुझसे कई चीजें कही गईं. पहला पॉइंट कि इस वक्त चीन के मुकाबले भारत के पास काफी मौका है. दूसरा, अगर हम मजदूरों को पैसा देते हैं, तो वो बिगड़ जाएंगे और गांवों से वापस नहीं आएंगे. तीसरा, इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ग़लत संदेश जा सकता है, जो निवेश करना चाहते हैं. चौथा, बाद में हम मजदूरों और छोटे उद्योगों को पैसे देने पर विचार कर सकते हैं. इमेज पर मजबूती नहीं निर्भर करती. मजबूती पर इमेज निर्भर करती है. यहां आप अपनी इमेज बचाना चाहते हैं और मजबूती को खत्म कर रहे हैं. आप अपनी अर्थव्यवस्था को बचाएंगे, तो अपने आप आपकी छवि अच्छी होगी.

‘कंपनियों को स्पेशलिस्ट बनना होगा’

राजीव बजाज: भारत जैसा बड़ा देश मुश्किल से बच नहीं सकता है, बल्कि इसे खुद को निकालना पड़ेगा. हमें मनोबल बढ़ाने की ज़रूरत है. मजदूरों को अगर सिर्फ मनोबल बढ़ाने के लिए छह महीने तक ही पैसा दिया जाए, तो मार्केट में डिमांड बढ़ेगी.

राहुल गांधी: बेरोजगारी कोरोना से पहले बड़ी समस्या थी. कोरोना ने इसे किनारे धकेल दिया है. बेरोजगारी पर आपका क्या कहना है? मैन्युफैक्चरिंग पर कैसे जोर दिया जाए?

राजीव बजाज: भारत की मैन्युफैक्चरिंग पर दुनिया की नजर है, ब्राजील बजाज की नीति की तारीफ करता है. अगर आप महेंद्र सिंह धोनी बनना चाहते हैं, तो आप हर छह स्पॉट पर नहीं खेल सकते. अच्छे डॉक्टर, खिलाड़ी, शेफ, म्यूजिशियन सभी स्पेशलिस्ट होते हैं. कंपनियों को भी स्पेशलिस्ट बनना होगा. हम लोग विचारों से काफी खुले हैं. भारत को अपने विचारों का खुलापन नहीं खोना चाहिए.

मुझसे कई लोगों ने कहा कि राहुल गांधी से बात मत करो: बजाज

राहुल गांधी: पहले जो माहौल था, खुलापन था, क्योंकि एक सहिष्णुता का माहौल रहा है. जो बोलना है बोल दो वाला माहौल. लेकिन अब वो पिछले कुछ सालों में बदला है.

राजीव बजाज: मुझसे कई लोगों ने कहा कि राहुल गांधी से बात करके क्यों जोखिम लेते हो. मैंने पहले बहुत कुछ बोला है, जिस पर विवाद हुआ. तो अब तो बोल चुका. कुछ लोगों ने मुझे बात करने से पहले चेताया था, लेकिन मैंने इसमें कुछ बुरा नहीं समझा. आज देश में 100 लोग बोलने से डरते हैं, 90 के पास छुपाने को कुछ है. कई लोग नहीं बोलना चाहते हैं, लेकिन मेरे पिता जैसे कुछ लोग निडर होकर बोलते हैं. बहुत से लोग नहीं बोलना चाहते, क्योंकि वो विरोध नहीं झेल सकते. कुछ चीजों को सुधारने की जरूरत है. पीएम मोदी को आज देश को कहना चाहिए कि हम ऐसे आगे बढ़ने वाले हैं. चीजें कंट्रोल में हैं. इस वायरस से डरने की जरूरत नहीं है और हर किसी की जान इससे नहीं जा रही है.


कोरोना वायरस को लेकर नोबेल विनर अभिजीत बनर्जी और राहुल गांधी की क्या बात हुई?

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