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ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट से दिल्ली पुलिस को किस साजिश का पता चला?

भारत को विदेशी निवेश पसंद है. विदेशी हथियार पसंद हैं. विदेशी गाड़ियां पसंद हैं. विदेशी सम्मान तो बहुत ज़्यादा पसंद हैं. चाहे फिल्म के लिए हो या व्यक्ति के लिए. बस विदेश से आने वाली एक चीज़ की मनाही है – आलोचना. अगर इस बात में कोई दम न होता, तो जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी किए जाने के बाद यूरोपियन यूनियन के दक्षिणपंथी सांसदों के लिए श्रीनगर में लाल कालीन न बिछाया जाता. वो भी तब, जब भारत के ही पत्रकार और सांसद कश्मीर में घुस नहीं पा रहे थे. आज आढ़तियों के कथित चंगुल से किसानों को निकालने की बात हो रही है. लेकिन राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर विदेशी सांसदों का ये टूर एक अंतरराष्ट्रीय आढ़तिए के माध्यम से ही हुआ था. अंग्रेज़ी में – ब्रोकर.

खैर, मुद्दे पर लौटते हैं. रिएना और ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया तो तंत्र अचानक हरकत में नज़र आ गया. कल का दिन अगर रिएना के नाम था तो आज हर तरफ ग्रेटा की चर्चा थी. दिल्ली पुलिस ने तो ग्रेटा थनबर्ग के खिलाफ एफआईआर दी दर्ज कर दी है. ये शुरुआती खबर थी. बाद में साफ हुआ कि एफआईआर में ग्रेटा का नाम नहीं है. टूलकिट बनाने वालों के खिलाफ एफआईआर की गई है. टूलकिट का खेल क्या है, हम आपको आगे बताएंगे. एफआईआर में आपराधिक षडयंत्र, धर्म के नाम पर लोगों को भड़काने और शांति भंग करने जैसे आरोप लगाए गए हैं. एफआईआर की जानकारी आई तो ग्रेटा ने एक और ट्वीट करके लिखा है –

मैं अब भी किसानों के साथ खड़ी हूं. शांतिपूर्ण प्रदर्शन के उनके अधिकार का समर्थन करती हूं. किसी भी स्तर की नफरत, धमकी या मानवाधिकार उल्लंघन इसे बदल नहीं सकते.

इसके साथ ग्रेटा ने अपना पुराना हैशटैग भी इस्तेमाल किया – #FarmerProtest

दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने एफआईआर दर्ज की है

2 फरवरी को किए अपने ट्वीट में ग्रेटा ने एक टूलकिट शेयर की थी. इसे लेकर दिल्ली पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि इससे किसानों को भड़काने के लिए एक विदेशी नेटवर्क द्वारा साज़िश का पता चलता है. चूंकि ग्रेटा ने टूलकिट वाला अपना पिछला ट्वीट डिलीट कर दिया था, तो बहुत सारे लोगों ने कहा ये चोर की दाढ़ी में तिनका था. लेकिन 4 फरवरी की सुबह उन्होंने एक और ट्वीट करके एक अपडेटेड टूलकिट शेयर कर दी. इस ट्वीट में ग्रेटा ने लिखा –

अगर आप (किसान आंदोलन की) मदद करना चाहें तो भारत में ग्राउंड पर मौजूद लोगों द्वारा बनाई ये अपडेटेड टूलकिट देखें. उन लोगों ने पुराना डॉक्यूमेंट हटा दिया था, क्योंकि वो पुराना था.

टूलकिट और अंतरराष्ट्रीय साज़िश सुनकर लगता है कि ग्रेटा ने ऐसा कोई दस्तावेज़ शेयर कर दिया जिसे पढ़कर भारत में कोई लड़का दौड़ते हुए मसाला बांधकर बम बना लेगा. और फिर हिंसा होगी. इस बात का सच मालूम करने का एक ही तरीका है. कि आप टूलकिट पर खुद गौर करें. इस टूलकिट का शीर्षक है – भारत में किसान आंदोलन.

शुरुआत एक नोट से होता है –

ये दस्तावेज़ का मकसद ऐसे लोगों को भारत में किसान आंदोलन के बारे में समझाना है, जो इस बारे में कुछ नहीं जानते. ताकि वो अपने निष्कर्षों के आधार पर हालात की बेहतर समझ पैदा करके और ये तय कर सकें कि किसानों की मदद कैसे करनी है.

इसके बाद भारत में किसानों पर एक छोटा बैकग्राउंडर है

इसमें भारत में कृषि और किसानों की हालत की जानकारी है. किसानों की आत्महत्याओं का ज़िक्र है. और साथ ही ये दावा कि भारत में कृषि कानूनों को बिना किसानों को भरोसे में लिए पास किया गया. ये दावा भी है कि भारत में किसानों की एक बड़ी संख्या ऐसी कंपनियों के चंगुल में फंस रहे हैं जिनका एक ही मकसद है – मुनाफा. टूलकिट कहती है कि ये सिर्फ एक देश के किसानों से जुड़ा मुद्दा नहीं है. ये दुनिया के तमाम आम लोगों को उनकी शर्तों पर एक अच्छा जीवन जीने का मौका देने से जुड़ा हुआ है. जो कि किसी भी सच्चे लोकतंत्र में होना चाहिए.

इसके बाद कुछ कदम उठाने के सुझाव हैं. जैसे –

#1
किसानों के समर्थन में ट्वीट करें – साथ में #FarmersProtest #StandWithFarmers जैसे हैशटैग लगाएं
#2
सरकारी नुमाइंदों को कॉल या ईमेल करें, ऑनलाइन पिटीशन चलाएं
#3
13 -14 जनवरी को करीब के भारतीय दूतावास पर प्रदर्शन करें. तस्वीरें हैशटैग के साथ ट्वीट करें.

इसके बाद कुछ और सुझाव हैं प्रायर एक्शन शीर्षक के साथ –
इसमें भी वीडियो, तस्वीरें और मैसेज ट्वीट करने की बातें हैं. साथ में भारत के पीएमओ, और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे IMF, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइज़ेशन , Food and Agriculture Organization और वर्ल्ड बैंक को टैग करने की सलाह है. आगे लिखा है कि पास हो रहे प्रदर्शन में जाएं, या खुद आयोजन कर लें.

इसके बाद टूलकिट का वो हिस्सा आता है, जिसने ज़्यादा ध्यान खींचा है. जो विवादित लग सकते हैं. इसमें #AskIndiaWhy नाम से कैंपेन चलाने की बात है. साथ में कुछ बिंदु हैं
– भारत में मानवाधिकार उल्लंघन और हाशिए पर मौजूद लोगों की अनदेखी का लंबा इतिहास है,
– दुनिया को भारत के किसानों की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत है. दुनिया को जानना चाहिए कि भारत में हाशिए पर मौजूद लोगों की आवाज़ पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.
– इसके बाद एक बार फिर हैशटैग्स के साथ डिजिटल स्ट्राइक की बात है. दर्शक समझें कि स्ट्राइक का मतलब हमेशा सर्जिकल स्ट्राइक के अर्थ में नहीं होता. डिजिटल स्ट्राइक ट्वीट, फेसबुक पोस्ट वगैरह के बारे में है.

हमने आपको टूलकिट में मौजूद सारी चीज़ों के बारे में बताया. जो सामान्य लगीं वो भी, और जो विवादित हो सकती हैं वो भी. अब आप ग्रेटा के ट्वीट, उनकी टूलकिट और उसपर दिल्ली पुलिस की एफआईआर पर अपनी राय बना सकते हैं.

आप जानते ही हैं कि अंतरराष्ट्रीय आलोचना के जवाब में देसी एकता वाले ट्वीट हुए. कुछ नामी ट्वीट्स के बारे में हमने आपको कल बता दिया था. कुछ और ट्वीट थे, जिनकी चर्चा आज तक हो रही है. मिसाल के लिए सचिन तेंदुलकर. इन्होंने कल ट्वीट कर दिया कि भारत की संप्रभुता के साथ छेड़खानी नहीं हो सकती. बाहरी ताकतें सिर्फ दर्शक हो सकती हैं. भारतीय ही भारत के बारे में निर्णय ले सकते हैं. साथ में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव के चलाए हैशटैग भी थे.

सोशल मीडिया पर सचिन से पूछा जाने लगा कि एक ट्वीट से संप्रभुता पर आंच कैसे आ जाती है?

कई लोगों ने पीएम मोदी के उस ट्वीट का ज़िक्र कर दिया, जिसमें उन्होंने कैपिटल हिल पर हिंसा के मामले में चिंता जता दी थी. दूसरे क्रिकेटर्स में बड़ा नाम विराट कोहली का है. विराट ने उसी तरह ट्वीट किया, जिसे हमने 3 फरवरी को क्रिप्टिक ट्वीट कहा था. न सांप मरेगा. न लाठी टूटेगी. बस गतिविधी होगी. एक और नामी क्रिकेटर हैं मनोज तिवारी. वही मनोज तिवारी जो सिंगर भी हैं, एक्टर भी हैं, पॉलिटिशन भी हैं. लेकिन उनके ट्वीट्स का ज़िक्र हम कुछ देर रुककर करेंगे.

फिलहाल हम ट्वीट्स की जगह ट्विटर का ज़िक्र करना चाहते हैं. 3 फरवरी को हमने आपको बताया था कि मोदी सरकार ने ट्विटर से कुछ हैशटैग और 257 URL को ब्लॉक करने को कहा था. सरकार का तर्क था कि इनके ज़रिए तथ्यहीन और भ्रामक जानकारी का प्रसार किया गया. इसलिए इनपर कार्रवाई बनती है. ट्विटर ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था. आज समाचार चैनलों पर खबरें फ्लैश हुईं कि ट्विटर को अनौपचारिक तौर पर फिर एक बार चेतावनी दी गई है. साथ ही कहा गया है कि सरकारी आदेशों पर अमल न करने पर ट्विटर को भी वैधानिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. फिलहाल मामला गर्म है इसीलिए काफी सारी चीज़ें इशारों में कही और बताई जाती हैं. लेकिन ये बात समझ आ रही है कि ट्विटर और सरकार के बीच खींचतान चल तो रही है. सरकार ट्विटर की ताकत को समझती है और इसीलिए उसे पूरी तरह से अपने नियंत्रण के बाहर नहीं रखना चाहती.

अब हम सरकार की इस चिंता को समझते हुए कुछ और ट्वीट्स का ज़िक्र करना चाहते हैं. भाजपा नेता कपिल मिश्रा. खुलेआम वीडियो जारी करते फिर रहे हैं कि ग्रेटा 26 जनवरी से पहले ही दंगे करवाने के लिए तैयार थीं. इस दावे का आधार क्या है, कपिल ही जानते होंगे. क्योंकि टूलकिट तो हमने भी पढ़वाई है आपको. जो डॉक्यूमेंट ग्रेटा ने डिलीट भी किया था, उसमें भी 26 जनवरी के रोज़ प्रदर्शन की बात है, लेकिन कहीं हिंसा के लिए कॉल नहीं है. कहीं भयानक दंगे टाइप शब्दों का इस्तेमाल नहीं है. ज़्यादातर बातें ट्वीट्स, वीडियोज़ और इंस्टाग्राम पर लाइव जैसी बातों को लेकर हैं. प्रदर्शन में किसानों के साथ शामिल होने के लिए भी कहा गया है, लेकिन ऐसे आह्वान उस वक्त सभी दिशाओं से हो रहे थे.

एक और ट्वीट में कपिल दिल्ली की सड़कों से पुलिस को हटाकर भयानक दंगों की तैयारी की बात कर रहे हैं. इस दावे का आधार क्या है, ये भी वो नहीं बता रहे. कपिल के कुछ और ट्वीट्स हम आपको दिखाना चाहते हैं. दर्शक हिसाब लगाएं कि ये भाषा कैसी है. क्या इन्हीं चीज़ों को द्विअर्थी या अश्लील नहीं कहा जाता –

kapil khada nahi rakh pai

मिया को लेकर कपिल ने एक और भद्दा और अश्लील ट्वीट किया. ये देखिए –

kapil andolan bhi khada

ऐसे कई ट्वीट हैं. कपिल को बताना चाहिए कि जिस देश में किसान भगवान हैं, उस देश में जुताई को लेकर उनके दिमाग में क्या आता है. कुछ और भी ट्वीट थे, वो अब डिलीट हो गए. ये पूछा जाना चाहिए कि ट्वीटर को जिस कार्रवाई के लिए कहा जा रहा है, क्या उसमें कपिल मिश्रा का नाम भी है? कपिल मिश्रा ने 26 जनवरी के दिन भी दावा किया था कि दिल्ली के कुछ इलाकों से हिंसक भीड़ निकलकर दिल्ली जलाने की तैयारी कर रही है. ये बात भी गलत साबित हुई. क्या कपिल मिश्रा को भ्रामक जानकारी फैलाने के आरोप में वैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा, जैसा ग्रेटा थनबर्ग या फिर खुद ट्विटर को करना पड़ रहा है. तब्लीगी जमात मामले में अदालतों ने अब तक जो फैसले दिए हैं, वो यही बताते हैं कि तब किस तरह एक समूह को निशाने पर लेकर नफरत फैलाई गई. अब तो अदालतों के फैसले भी हैं. क्या अब उन लोगों पर कार्रवाई होगी, जिन्होंने भ्रामक जानकारी फैलाई. या कार्रवाई सिर्फ उन लोगों के लिए है, जिनके निशाने पर सरकार है? इन सवालों के जवाब सरकार को देने हैं.

किसान आंदोलन को लेकर आज एक खबर ये आई कि अमेरिका ने कृषि कानूनों की तारीफ कर दी है. अमेरिका के विदेश मंत्रालय से भारत के किसान आंदोलन पर इंडिया टुडे ने सवाल किया था जिसका एक प्रवक्ता ने जवाब दिया है. पूरे बयान को हम दो हिस्सों में देख सकते हैं. बयान का पहला हिस्सा किसानों को पसंद आएगा और दूसरा हिस्सा मोदी सरकार के पक्ष में जाता है. किसानों के आंदोलन को लेकर अमेरिका ने कहा कि “शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र के फलने-फूलते रहने की निशानी है और ये ही बात भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कही है. हम सभी दलों को बातचीत के ज़रिए मसले को सुलझाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.” प्रदर्शन वाले इलाकों में इंटरनेट बंद करने की बात पर अमेरिका के विदेश विभाग ने कहा है इंटरनेट समेत सूचनाओं तक अबाधित पहुंच अभिव्यक्ति की आज़ादी की बुनियाद है. इतनी बात में तो अमेरिका का किसानों को समर्थन दिखता है. लेकिन इसके आगे अमेरिका ने कृषि कानूनों का समर्थन कर दिया. बयान में कहा गया है कि अमेरिका भारत के बाज़ारों की दक्षता बढ़ाने और प्राइवेट सेक्टर में और ज़्यादा इंवेस्टमेंट को बढ़ावा देने के कदमों का स्वागत करता है. यानी बिना नाम लिए अमेरिका ने मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों का समर्थन कर दिया है. लेकिन साथ में एक राइडर भी है.

ट्विटर के बाद लौटते हैं किसान आंदोलन के मैदान पर

विपक्षी पार्टियों का एक डेलिगेशन आज ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों से मिलने गया था लेकिन पुलिस ने किसानों के पास पहुंचने से पहले ही इन नेताओं को रोक दिया. इस ग्रुप में अकाली दल की सांसद और मोदी सरकार में मंत्री रहीं हरसिमरत कौर बादल, एनसीपी की सुप्रिला सुले, टीएमसी सांसद सौगत रॉय, डीएमके सांसद कणिमोझी के अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस और IUML समेत 15 पार्टियों के नेता शामिल थे.

संसद में भी किसानों के मुद्दे पर घमासान हुआ. किसानों का ज़्यादा बड़ा हितैषी कौन है, ये जताने के लिए सरकार और विपक्ष की संसद में होड़ चली. राज्यसभा में संयमित चर्चा हुई लेकिन लोकसभा में हंगामा चलता रहा. पहले राज्यसभा की बात करते हैं. राज्यसभा और लोकसभा दोनों में ही कार्यवाही प्रश्नकाल से शुरू होती है. लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के लिए प्रश्नकाल नहीं रखा गया. आज चर्चा की शुरुआत आरजेडी के मनोज झा ने की. उन्होंने कहा कि मोनोलॉग के बजाय किसानों के साथ सरकार को डायलॉग करना चाहिए. मनोज झा ने किसानों को खालिस्तानी कहने को लेकर मीडिया को दुश्मन को बताया.

बीजेपी सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सरकार औऱ कृषि कानूनों की तरफदारी की. कांग्रेस के 2019 वाले मैनेफेस्टो का ज़िक्र करते हुए सिंधिया ने कहा कि किसान कानूनों के कुछ समर्थकों ने साइड बदल ली है. सुनिए.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद बोलने का नंबर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का आया. ज्योतिरादित्य जब कांग्रेस में थे तब भी दिग्विजय सिंह से उनकी राइवलरी थी. इसलिए ज्योतिरादित्य के तुरंत बाद दिग्विजय का नाम बोले जाने पर सदन में ठहाका लग गया. सभापति वेंकैया नायडू ने भी मुस्कुराते हुए कहा कि मैंने कोई परिवर्तन नहीं किया है, लिस्ट में नाम हैं उसी हिसाब से पुकारा है.

टीएमसी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने गणतंत्र दिवस के दिन किसान की मौत मामले का ज़िक्र करते हुए कहा कि गृह मंत्री और प्रधानमंत्री के हाथों में दिल्ली की कानून व्यवस्था है. उन्हें इस मामले की जांच करनी चाहिए और रिपोर्ट जारी करनी चाहिए. डेरेक ओ’ब्रायन ने किसान कानूनों को रद्द करने के लिए बिल का ड्राफ्ट भी पेश किया. आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने किसान आंदोलन में हिंसा भड़काने वाले दीप सिद्धू को बीजेपी नेता बताते हुए सरकार पर आरोप लगाए.

हरियाणा के कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा ने चर्चा में नाम गिनवाकर कहा कि कई प्रदर्शनकारी किसान परिवारों के परिजन सीमा पर तैनात है, इसके बावजूद किसानों को आतंकी कहा जा रहा है. ये सुब सुनकर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि किसानों के लिए ईमानदारी से काम करने वाली सरकार पर ही इतने सवाल उठाए जा रहे हैं.

ये राज्यसभा की चर्चा थी, जहां आज संयमित ढंग से बिना ज्यादा शोर-शराबे के सभी सांसदों ने अपनी बात रखी. अब लोकसभा चलिए. 4 बजे से लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई. जी हां, कोविड प्रोटोकॉल के चलते ये नया समय तय हुआ है. प्रश्नकाल शुरू होते ही विपक्ष के सांसदों ने नारेबाज़ी शुरू कर दी. किसानों के समर्थन में नारेबाज़ी. इस हंगामे के बीच सिर्फ 15 मिनट बाद ही कार्यवाही 5 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई. सदन दोबारा शुरू हुआ तो फिर हंगामा शुरू हो गया और दिनभर के लिए लोकसभा को स्थगित कर दिया गया.

किसान आंदोलन को लेकर एक झगड़ा दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच चल रहा है

बुधवार रात दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग ने डीटीसी यानी Delhi Transport Corporation को आदेश दिया कि दिल्ली पुलिस को दी गई सभी बसों को तुरंत डिपो में बुलाया जाए. इसके बाद डीटीसी ने उन 576 बसों को लौटने के निर्देश दिए जो दिल्ली पुलिस को दी गई थीं. अमूमन ऐसा होता है कि फोर्स के किसी बड़े मूवमेंट के लिए दिल्ली पुलिस डीटीसी की बस किराये पर लेती है, क्योंकि पुलिस की अपनी बसें कम पड़ जाती हैं. अभी दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन वाली जगह पर जवानों की आवाजाही के लिए डीटीसी की बसें ही काम में ली जा रही थीं. दिल्ली पुलिस बसों का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों को भरने के लिए भी करती है. 26 जनवरी के दिन इन्हें बैरिकेड की तरह भी इस्तेमाल किया गया था.

दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है और डीटीसी केजरीवाल सरकार के अंडर. तो केजरीवाल सरकार ने कह दिया कि हम बसें नहीं देंगे. इस फैसले के बाद बीजेपी वाले सीएम केजरीवाल पर टूट पड़े हैं. बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने इस दिल्ली के सीएम का अराजकता वाला कदम कहा. बीएल संतोष ने केजरीवाल ने लिखा कि कि पंजाब की तमन्ना पूरी करने के लिए दिल्ली वालों को तकलीफ दी जा रही है.

डाल डाल – पांत पांत. सरकार और आंदोलन के बीच यही जुगलबंदी चल रही है. कल फिर इसकी बात होगी.


विडियो- रिहाना और ग्रेटा के ट्वीट के बाद मोदी सरकार को #IndiaTogether क्यों चलवाना पड़ा?

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