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सरकार फिल्मों के सर्टिफिकेशन में क्या बदलाव करने जा रही, जो फ़िल्ममेकर्स की आज़ादी छीन सकता है?

कुछ वक़्त से देश में सिनेमा से जुड़े विभागों और कानूनों में काफ़ी फ़ेरबदल चल रहा है. 6 अप्रैल 2021 को सरकार ने Film Certificate Appellate Tribunal यानी FCAT को अचानक बंद कर दिया था. और अब सिनेमैटोग्राफ ऐक्ट 1952 में संशोधन के लिए सरकार ने नया ड्राफ्ट 18 जून शुक्रवार को जारी किया है. 2 जुलाई तक ये ड्राफ्ट सरकार ने पब्लिक और फ़िल्म मेकर्स की राय जानने के लिए सार्वजनिक रखा है. जहां सब इस बिल के प्रति अपनी राय दे सकते हैं. इस नए बिल में कुछ अच्छे पॉइंट्स हैं. लेकिन कुछ ऐसे पॉइंट भी हैं जो फ़िल्ममेकर्स के कंटेंट बनाने और जनता के कंटेंट देखने की स्वतंत्रता को बंधित कर सकते हैं. क्या हैं इस ड्राफ्ट की मुख्य बातें, आपको हम सिंपली समझा देते हैं.

#पायरेसी के खिलाफ़ सख्ती

मौजूदा सिनेमैटोग्राफ ऐक्ट (1952) में पायरेसी के लिए कोई सख्त क़ानून नहीं है. जिस कारण इस नए ड्राफ्ट में सेक्शन 6AA जोड़ा गया है. जिसके अनुसार फ़िल्म की बिना अधिकार रिकॉर्डिंग करने की मनाही होगी. अगर कोई इस नियम का उल्लंघन करता हुआ पाया जाएगा तो उस व्यक्ति के खिलाफ़ सख्त कार्यवाही होगी. आरोपी को तीन महीने से लेकर तीन साल तक की जेल की सजा दी जाएगी. या उसे तीन लाख का जुर्माना भरना पड़ेगा. साथ ही जिस फ़िल्म की उस व्यक्ति ने पायरेसी की होगी उसके पूरे प्रोडक्शन मूल्य का 5% भी जुर्माने में जोड़ा जा सकता है. सजा और जुर्माना दोनों भी हो सकता है. सरकार का कहना है पायरेसी से हर साल एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का बहुत नुकसान होता है. इस बिल के ज़रिये पायरेसी करने वालों पर लगाम लगेगी.

#नया सर्टिफिकेशन

अगर ये बिल पास होता है तो केंद्र सरकार को CBFC द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट को पुनः परिक्षण के आदेश देने की पावर मिल जाएगी. मतलब है कि अगर सरकार को ये ज्ञात हुआ कि किसी फ़िल्म में सेक्शन 5B (प्रिंसिपल फॉर गाइडेंस इन सर्टिफाइंग फ़िल्म्स ) का उल्लंघन हुआ है तो सरकार CBFC को फ़िल्म का सर्टिफिकेशन रद्द करने या बदलाव करने का आदेश दे सकेगी. आगे बढ़ने से पहले क्या कहता है सेक्शन 5B ये समझ लीजिए.

अगर कोई फ़िल्म या फ़िल्म का कोई सीन देश की अखंडता के खिलाफ़, देश की शांति के खिलाफ़, देश की नैतिकता के खिलाफ़, दूसरे देशों से संबंधों को खराब करने, देश का माहौल बिगाड़ने लायक लगता है तो सरकार इस पर रोक लगा सकती है. लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से CBFC के किसी भी फ़ैसले को ओवररूल करने या बदलने के अधिकार छीन लिए और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले का समर्थन किया. इस फ़ैसले के बाद सरकार के पास सिर्फ़ इतनी पावर थी कि वे CBFC बोर्ड के हेड से फ़िल्म पर दुबारा विचार करने की राय दे सकें. मौजूदा एक्ट में सेक्शन 6 के आधार पर सरकार के पास फ़िल्म सर्टिफिकेशन की प्रोसीडिंग की रिकॉर्डिंग देखने का भी अधिकार है.

पायरेसी करने पर सख्त होगी सज़ा.
पायरेसी करने पर सख्त होगी सज़ा.

मोटी बात ये है कि इस नए बिल के लागू होने पर केंद्र सरकार के पास CBFC के फ़ैसलों को बदलने की ताकत आ जाएगी. और हां याद रखें कि FCAT आलरेडी बंद हो चुका है. यानी अगर बिल पास हो जाता है तो मेन पावर सिर्फ सरकार के पास होगी. इस नए ड्राफ्ट को ‘स्वयंवर’,’ द चोला हेरिटेज’ जैसी नेशनलअवार्ड विनिंग फ़िल्में बनाने वाले सम्मानित फ़िल्ममेकर अदूर गोपालाकृष्णन ने ‘सुपर सेंसर’ नाम दिया है. खैर, तीसरा पॉइंट मेन है.

#एज बेस्ड सर्टिफिकेशन

अब तक फ़िल्मों को तीन सर्टिफिकेट दिए जाते हैं.

1. A सर्टिफिकेट – अगर फ़िल्म में गालियां, बहुत ज़्यादा हिंसा, नग्नता, सेक्स सीन्स होते हैं. केवल वयस्कों के लिए बनी फ़िल्म.

2. U/A सर्टिफिकेट – जिन फ़िल्मों में थोड़ी बहुत ही हिंसा या मामूली लव मेकिंग सीन्स होते हैं, ये फ़िल्म बच्चे भी देख सकते हैं. मगर माता-पिता की निगरानी में.

3. U सर्टिफिकेट- जिसमें ज्यादा हिंसक या उतेजक सीन नहीं होते और जिसे पूरे परिवार के साथ देखा जा सकता है.

एक और होता है Sसर्टिफिकेट. ये उन फ़िल्मों को दिया जाता है जो फ़िल्में जनता के लिए नहीं बल्कि स्पेशल वैज्ञानिकों के लिए बनाई जाती हैं.

अब इस नए ड्राफ्ट में उम्र संबंधित नई कैटेगरी जुड़ गई हैं. जैसे,

U/A 7+ –  7 साल से ऊपर के ही बच्चे इस सर्टिफिकेट की फ़िल्मों को देखें, वो भी माता-पिता की निगरानी में.
U/A 13+ – 13 साल से ऊपर के ही बच्चे इस सर्टिफिकेट की फ़िल्मों को देखें, वो भी माता-पिता की निगरानी में.
U/A 16+ – 16 साल से ऊपर के ही बच्चे इस सर्टिफिकेट की फ़िल्मों को देखें, वो भी माता-पिता की निगरानी में.

अब तक CBFC द्वारा दिए जाने वाला सर्टिफिकेशन सिर्फ़ 10 साल के लिए वैलिड होता था. लेकिन इस नए बिल के लागू होने के बाद फ़िल्म का सिर्फ एक बार ही सर्टिफिकेशन होगा और वो आजीवन वैलिड रहेगा.

#पहले क्या हुआ

2013 में कांग्रेस सरकार के इन्फॉर्मेशन एंड ब्राडकास्टिंग मिनिस्ट्री के हेड मनीष तिवारी ने जस्टिस मुकुल मुद्गल की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी. इस कमेटी की रिपोर्ट में कुछ मुख्य पाइंट्स थे जैसे-

#फ़िल्म के सीन्स ना काटे जाएं.
# बोर्ड सिर्फ फ़िल्म का सर्टिफिकेशन करे.
# U/A12+ और U/A15+ जैसी कैटेगरीज़ को जोड़ा जाए.

2014 में कांग्रेस की सरकार चली गई और बीजीपी की सरकार आ गई. जिस कारण ये रिपोर्ट गट्ठरों में दब गई. 2016 में जब अभिषेक चौबे की फ़िल्म ‘उड़ता पंजाब’ की कांट-छांट का विरोध हुआ तो उस समय के इन्फॉर्मेशन एंड ब्राडकास्टिंग मिनिस्ट्री हेड अरुण जेटली ने डायरेक्टर श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में अपनी एक्सपर्ट कमेटी बनाई. इस कमेटी के मुख्य पॉइंट ये थे.

# 12+ और 15+ दो तरह के U/A सर्टिफिकेट जारी किए जाएं.
# 18+ फ़िल्मों यानी एडल्ट फ़िल्मों को भी A तथा AC (एडल्ट विद कॉशन) दो तरह के सर्टिफिकेट दिए जाएं.

इन रिपोर्ट्स का भी पिछली रिपोर्ट्स वाला हाल हुआ था.


 ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है.


वीडियो: क्या है FCAT जिसे सरकार ने बंद करने का मनमाना फैसला ले लिया?

 

 

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