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एक-एक कर 7 लोग उतरे इस 'मौत के कुंए' में, वापस 1 भी नहीं आया

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कहते हैं ये नया भारत है. ये वो भारत है जो दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंतरिक्ष में सैर कर रहा है. अपना स्पेस स्टेशन बनाने जा रहा है. लेकिन सवाल ये है कि अगर ये नया भारत है, तो किसके लिए है. क्या सुदूर गांव में लालटेन की रौशनी में बैठ कर पढ़ते बच्चे के लिए भी ये उतना ही नया भारत है, जितना दिल्ली के कनॉट प्लेस वालों के लिए. क्या स्पेस सेंटर की तैयारी करते अंतरिक्ष यात्री के जितना ही नया भारत उस मजदूर का भी है, जो महज़ पेट भरने के लिए सीवर में उतर कर हर महीने अब भी बार-बार कई शक्लों में मर रहा है. ये विज़ुअल सोचिए ज़रा. एक तरफ़ नए ग्रह की तलाश में निकलता भारत का रॉकेट, दूसरी तरफ़ इसी मुल्क़ के किसी सीवर में सात लोगों की तैरती लाशें. ये इस सीवर की सफ़ाई के लिए उतरे थे. नए भारत के पुराने सीवर की सफ़ाई के लिए.

# क्या मामला है

मामला नया नहीं है. आप कई बार सुन चुके होंगे. इतनी बार सुन चुके होंगे कि अब ध्यान देना भी छोड़ दिया होगा. लेकिन आपके ध्यान ना देने से सीवर में हुई मौतों पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

गुजरात के वड़ोदरा में एक होटेल में सेप्टिक टैंक के अंदर सात लोगों की मौत हो गई. इनमें सफाईकर्मियों के साथ-साथ होटेल के कर्मचारी भी शामिल थे. टैंक में दम घुटने से उनकी मौत हो गई. होटेल के मालिक के खिलाफ लापरवाही के कारण मौत का केस दर्ज किया गया है.

घटना दाभोई तालुका के फार्तिकुई गांव की है. यहां दर्शन होटेल में सफाईकर्मी महेश पतनवडिया, अशोक हरिजन, बृजेश हरिजन और महेश हरिजन सेप्टिक टैंक की सफाई करने के लिए पहुंचे थे. होटेल में काम करने वाले विजय चौधरी, सहदेव वसावा और अजय वसावा उनकी मदद कर रहे थे.

# एक-एक करके उतरे इस मौत के कुंए में 

पुलिस ने स्थानीय मीडिया को बताया है कि सबसे पहले पतनवडिया टैंक में दाखिल हुए. काफी देर बाद जब वह वापस नहीं आए और कोई जवाब भी नहीं दिया तो पहले अशोक, फिर बृजेश और महेश अंदर गए. जब चारों बाहर नहीं आए तो चौधरी, सहदेव और अजय उनकी मदद को अंदर गए लेकिन वे भी बेहोश होकर अंदर गिर गए. जब सातों लोग बाहर नहीं आए तो दाभोई नगर पालिका और स्थानीय पुलिस को सूचना दी गई.

नगर पालिका के पास जरूरी उपकरण नहीं होने के कारण वडोदरा दमकल विभाग से मदद मांगी गई. फायर ऑफिसर निकुंज आजाद ने बताया, ‘टैंक के अंदर गैस का प्रेशर बहुत ज्यादा था जिस कारण सभी सातों की मौत हो गई’

# मौत का दरिया है, और डूब के जाना है

सीवर की सफ़ाई को लेकर नियम हैं. इस बात पर रोक है कि सीवर की सफाई के लिए इसमें आदमी उतारे जाएं. लेकिन नियम हैं नियम का क्या. नियम तो हेलमेट पहनकर चलने का भी है. लेकिन पहनता आदमी चालान के डर से ही है. तो सीवर की सफाई आज भी बदस्तूर जारी है. आदमी सीवर साफ़ करने उतरते हैं और दम घुटने से मारे जाते हैं. पिछले दो सालों में 400 से ज़्यादा सफाईकर्मी सीवर में मारे गए हैं.

# इलाज है, लेकिन इंसानी ज़िंदगी से महंगा है?

ऐसा नहीं है कि दुनिया के सारे वैज्ञानिक चांद पर प्लॉट काटने के आविष्कार में ही बिज़ी हैं. इंसान के ज़िंदा रह पाने के लिए भी आविष्कार हो रहे हैं. ऐसा ही एक आविष्कार केरल के कुछ स्टूडेंट्स ने कर दिखाया है. सीवर साफ़ करने वाला रोबोट. फरवरी 2018 में इसका टेस्ट भी हो चुका है. मामला फ़िट भी है. कई संस्थान और सरकारों ने ऑर्डर भी कर दिया है.

सीवर साफ़ करने वाले रोबोट के साथ इसका आविष्कार करने वाले छात्र
सीवर साफ़ करने वाले रोबोट के साथ इसका आविष्कार करने वाले छात्र

लेकिन सवाल ये है कि गुजरात में ये जो सात आदमी मारे गए हैं. ये एक निजी होटल के सीवर को साफ़ करने में मरे हैं. मुनाफ़ा कमाने वाले होटल ने क्यों सदियों पुराने तरीके से अब भी सफ़ाई जारी रखी थी. क्या सफाई करने वाला रोबोट इन जैसे होटलों और संस्थानों को नहीं खरीदना चाहिए ताकि इंसान सीवर में ना मरें. सवाल कई हैं, लेकिन जवाब उतने साफ़ नहीं हैं. नए भारत में ये भी तय होना चाहिए कि अब कोई और सीवर या गटर में डूबकर ना मरे.

तभी भारत का अंतरिक्ष  में जाना सफल होगा, वरना  जब सेप्टिक टैंक में ही डूबकर मरना है तो मंगल पर क्यों, यहीं अपनी पृथ्वी पर ना मरें?


वीडियो देखें:

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