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पहली बार उर्जित पटेल ने सरकार को दिखाया कि RBI गवर्नर वो हैं

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रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच का अघोषित सीज़फायर बुधवार, 7 जून को खत्म हो गया. जितने लोगों की शिकायत थी कि रघुराम राजन के जाने के बाद से बैंक काफी ‘चुप-चुप’ सा रहता है, उन्होंने कल कान साफ कर के उर्जित पटेल को सुना. उर्जित ने कल सरकार पर तीन बम गिराएः

बम नंबर 1ः  रेपो-रिवर्स रेपो दरों में कोई बदलाव नहीं किया. पिछली बार की तरह रेपो रेट 6.25 फीसदी और रिवर्स रेपो रेट 6 फीसदी ही रखे गए.
बम नंबर 2ः  उर्जित ने बयान दिया कि रिज़र्व बैंक ने मौद्रिक नीति (मॉनेटरी पॉलिसी) की समीक्षा से पहले सरकार से मिलने से इनकार कर दिया था.
बम नंबर 3ः  इसी के साथ 2 राज्यों में कर्ज़ माफी के लिए चल रहे आंदोलन के बीच चेतावनी दी कि लोन माफी के ऐलान होते रहे, तो पूरे देश के खाते पर असर पड़ सकता है.

(ये जानना चाहते हों कि रेपो-रिवर्स रेपो क्या होता है, तो यहां क्लिक कर के पढ़ें.)

माने जलाया भी और पर्याप्त नमक भी रगड़ दिया. इसके बाद कुछ ही घंटों बाद सरकार की ओर से मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यन ने बयान जारी कर के कह दिया कि रेपो-रिवर्स रेपो दरें कम करने के लिए पर्याप्त कारण थे और बैंक को इस दिशा में कदम उठाना चाहिए था. कोई और गवर्नर होते तो इसे सरकार और बैंक के बीच चलने वाली सामान्य खींचतान कह कर खारिज कर दिया जाता. लेकिन बुधवार के वाकये ने ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि उर्जित पटेल के गवर्नर पद पर आने के बाद से लगातर कहा जा रहा था कि इस बार के गवर्नर साहब सरकार से ज़रा ‘कम उलझा करते हैं.’

 

वित्तमंत्री अरुण जेटली. केंद्र सरकार चाहती है कि दरें कम रहें.
वित्तमंत्री अरुण जेटली. केंद्र सरकार चाहती है कि दरें कम रहें.

मौद्रिक नीति – रिज़र्व बैंक और सरकार का आदिम झगड़ा

मोटा-माटी हिसाब ये रहता है कि सरकारें चाहती हैं कि रेपो और रिवर्स रेपो दरें कम से कम रहें, ताकि बाज़ार में पैसे की आवक बढ़े. इससे व्यापार के बढ़ने की उम्मीद की जाती है. लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक संभल कर चलने की नीति का पालन करता है और दरों में ज़्यादा हेर-फेर करने के पक्ष में नहीं रहता. मौद्रिक नीति को लेकर सरकार अपनी सलाह बैंक को भेज सकती है लेकिन अंतिम फैसला हमेशा रिज़र्व बैंक बोर्ड का ही होता है. इसी को लेकर रघुराम राजन ने बतौर रिज़र्व बैंक गवर्नर अपने आखिरी भाषण में स्टीफेंस कॉलेज में कहा था कि रिज़र्व बैंक के ना कहने की आज़ादी को बचा कर रखना बहुत ज़रूरी है.

राजन के जाने के बाद नोटबंदी का फैसला आया और लगातार इस बात का अंदेशा जताया जाने लगा कि रिज़र्व बैंक सरकार की मांगों के आगे झुकने लगा है. इसी के चलते सरकार ‘सलाह’ को बैंक के काम-काज में दखल माना जा रहा था.

 

FILE PHOTO: The Reserve Bank of India (RBI) seal is pictured on a gate outside the RBI headquarters in Mumbai, India, February 2, 2016. REUTERS/Danish Siddiqui/File photo
लेकिन रिज़र्व बैंक है कि मानता नहीं (फोटोःरॉयटर्स)

कल क्या नया हुआ?

बुधवार को सार्वजनिक हुई दरों के पहले मौद्रिक नीति पर सरकार की ‘राय’ बैंक तक पहुंचाने के लिए तीन लोगों की एक कमिटी 1 जून 2017 को रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति कमिटी से मिलना चाहती थी. सरकार की ओर से इस मीटिंग में अरविंद सुब्रह्मण्यन के अलावा प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल और आर्थिक मामलों के सचिव आने वाले थे. लेकिन रिज़र्व बैंक की कमिटी ने सरकार की कमिटी से मिलने से ही इनकार कर दिया.

फिर दरों की घोषणा में बैंक ने साफ तौर पर सरकार को निराश किया. उर्जित पटेल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि बैंक ने सरकार की कमिटी से मिलने से इनकार किया. ये सब इस तरह लिया गया कि बैंक अपनी स्वायत्ता का दम भर रहा हो. कि हम सरकार की कमिटी से मिलने से इनकार भी कर सकते हैं. ये पिछले दिनों में बनी उर्जित और खुद रिज़र्व बैंक की पैसिव छवि को तोड़ता दिखा. इसके बाद जिस तत्परता के साथ सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने बैंक के फैसले की आलोचना की, उसे से सरकार की नाराज़गी भी जगजाहिर हुई.

उर्जित पटेल के गवर्नर बनने के बाद संभवतः ये पहली बार है कि रिज़र्व बैंक ने सरकार की राय से साफ अलग दिखने की कोशिश की हो. अगर ये अपवाद न हुआ तो हम आगे सरकार और बैंक में और भी तकरार देखेंगे क्योंकि सरकार हर तरह से मौद्रिक नीति में दखल देना चाहती है जिसे रिज़र्व बैंक अपने अधिकारों का अतिक्रमण मानता है. यही रघुराम राजन और उनसे पहले डी सुब्बाराव के कार्यकाल में होता था.

यहां देखने लायक ये रहेगा कि सरकार अपनी मनवाने के लिए सलाह ही भेजती रहेगी या कोई विधाई कदम उठा कर ऐसा कोई रास्ता निकालेगी जिस से उसकी सलाह रिज़र्व बैंक के लिए बाध्यकारी हो जाएं. 


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