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सुप्रीम कोर्ट ने मूर्तियों पर क्या फैसला दिया था, जिसे योगी सरकार चुनौती देने की तैयारी में है?

भारत में महापुरुषों की मूर्ति लगाना आम बात है. वैसे तो ये महापुरुषों सबके हैं. लेकिन राजनीतिक दलों के अपने-अपने महापुरुष होते हैं. वे इन महापुरुषों के पदचिह्नों का अनुसरण करें या ना करें, लेकिन उनकी मूर्तियों को बडे से बड़ा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ये मूर्तियां आमतौर पर मैदानों, दफ्तरों या शहर के मुख्य चौक पर बनाई जाती हैं. एक समय ऐसा भी था जब फुटपाथ और सार्वजनिक सड़कों पर भी मूर्तियों को स्थापित कर दिया जाता था.

लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में इस पर रोक लगा दी. उसने राज्यों से कहा था कि वे सार्वजनिक जगहों पर मूर्तियां लगाने की अनुमति ना दें. लेकिन 8 साल बाद इस रोक में छूट की मांग की जा रही है. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की तरफ से. उसका कहना है कि वो प्रदेश की सड़कों पर संतों, धार्मिक नेताओं, स्वतंत्रता सेनानियों, राजनीतिक हस्तियों, शहीदों आदि की मूर्तियां लगाना चाहती है. ऐसा करने के पीछे सरकार के अपने तर्क हैं. लेकिन पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में जानते हैं.

Mahatma Gandhi
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर लखनऊ में उन्हें श्रद्धांजलि देते सीएम योगी. (तस्वीर- पीटीआई)

कोर्ट ने दिया था ये फैसला

बाद में ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने 18 जनवरी 2013 को एक फैसला दिया. इसमें कहा गया,

“राज्य सरकारों को सार्वजनिक सड़कों अथवा फुटपाथों पर किसी भी मूर्ति की स्थापना या संरचना के निर्माण की अनुमति नहीं दी जाएगी.”

ये आदेश पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया आरएम लोढ़ा और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने तत्कालीन केरल सरकार के खिलाफ दिया था. उसने राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक नेता की मूर्ति के निर्माण की अनुमति देने के लिए दायर एक आवेदन पर विचार करते हुए ये आदेश दिया था. पीठ ने कहा था,

“समय आ गया है की सड़कों से सटे सार्वजनिक स्थानों पर मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों और गुरुद्वारों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया जाए. इनके होने से वाहनों की आवाजाही काफी हद तक बाधित होती है, जिससे लंबे ट्रैफिक जाम हो जाते हैं.”

जस्टिस लोढ़ा और जस्टिस मुखोपाध्याय ने कहा था,

“सार्वजनिक सड़क किसी की संपत्ति नहीं है. प्रत्येक नागरिक को सड़क का उपयोग करने का अधिकार है और मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे का निर्माण करके या किसी सार्वजनिक व्यक्ति की मूर्ति स्थापित करके उस अधिकार को बाधित नहीं किया जा सकता है.”

जस्टिस लोढ़ा ने ये भी कहा था कि सड़क के बीच में मूर्तियों की क्या आवश्यकता है. उनका कहना था कि देश के नेताओं को चमकाने से बेहतर है कि इस पैसे का उपयोग गरीबों के लिए किया जाए. प्रतिबंध लगाने के बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश स्ट्रीट लाइट, मास्क लाइट या अन्य जन उपयोगी सेवाओं की स्थापना पर लागू नहीं होगा.

इस आदेश के बाद पूर्णतः नहीं तो बहुत बड़े स्तर पर फुटपाथों और सड़कों पर मूर्तियां बनना बंद हो गईं. लेकिन 8 साल बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इस मुद्दे को फिर उठा रही है.

Nehru
जवाहरलाल नेहरू की एक मूर्ति के पास कांग्रेस समर्थक. (फाइल फोटो)

क्या कह रही है योगी सरकार?

बीते साल यूपी सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर मूर्ति नहीं लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को हटाने के लिए एक याचिका दायर की थी. बीती 19 जुलाई को इसकी सुनवाई होनी थी. लेकिन राज्य सरकार के वकील के अनुरोध पर इसे दो सप्ताह के लिए टाल दिया गया. हालांकि उससे पहले इस मुद्दे पर यूपी सरकार का रुख सामने आ गया था. उसने सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियां लगाने का समर्थन किया है. योगी सरकार का तर्क है,

“कई बार किसी धार्मिक या राजनीतिक व्यक्ति की मूर्ति को एक पिकनिक स्थल या कुछ समान रूप से अप्रयुक्त या उपेक्षित भूमि के विकास के लिए खड़ा करना उपयुक्त होता है. ये मूर्तियां उस स्थान को विकसित और ठीक से स्थापित करने में मदद करती हैं.”

यूपी सरकार ने प्रतिमाओं की स्थापना के लिए 2013 के प्रतिबंध पर ढील देने की मांग करते हुए कहा,

“रोड डिविजन पर मूर्तियों को स्थापित करने से आम जनता को असुविधा नहीं होगी और सौंदर्य उद्देश्यों की पूर्ति होगी. ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियां स्थापित करना उस क्षेत्र के लोगों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है. ये पर्यटन को प्रोत्साहित करने और उस विशेष स्थान या क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास को संरक्षित करने में सहायता करता है.”

मूर्ति स्थापित करने पर पूर्ण प्रतिबंध ‘अस्पष्ट’

योगी सरकार का ये भी कहना है कि सार्वजनिक जगहों पर मूर्ति लगाने पर लगा पूर्ण प्रतिबंध स्पष्ट नहीं है. सरकार के अनुसार,

“किसी भी सार्वजनिक स्थान पर किसी भी मूर्ति को स्थापित करने पर पूर्ण प्रतिबंध अस्पष्ट है. आबादी और आने वाली पीढ़ियों में देशभक्ति और मूल्यों की भावना पैदा करने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों, शहीदों और महान भारतीय संतों की मूर्तियों को स्थापित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं. मूर्तियों के होने से जगह के सौंदर्यपूर्ण दिखने और बिना किसी कारण के बेहतर रखरखाव में मदद मिलेगी.”

ये तो हो गए योगी सरकार के तर्क. अब देखना ये है कि केवल तर्कों से सुप्रीम कोर्ट अपना 8 साल पुराना फैसला पलट देगा या योगी सरकार को इसके लिए कुछ ठोस कारण भी पेश करने होंगे.

(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे रौनक भैड़ा ने लिखी है.)


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