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1000 से ऊपर मुसलमान मार दिए गए हैं और कहीं ये खबर नहीं बताई गई

जब जिसके हाथ में हथियार आये, वो ही काबिल बन जाता है. शांति की बात करने वाले बौद्ध धर्म के लोग हिंसा की लिमिट पार कर रहे हैं. बर्मा में 1 हजार से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को मार दिया गया है. नॉर्थ-ईस्ट राखाइन राज्य में. रायटर्स न्यूज को यूएन के दो अफसरों ने ये सूचना दी. यूएन वहां पर ये हत्यायें रोक नहीं पाया है.

बर्मा के प्रशासन ने अक्टूबर 2016 से रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ जंग छेड़ रखी है. इल्जाम ये लगाया था कि रोहिंग्या लोगों में से कुछ मिलिटैंट्स ने पुलिस बॉर्डर पर हमला किया था. पर प्रशासन ये नहीं मान रहा है कि इतने रोहिंग्या मारे गए हैं. कुछ के मरने की ही बात कर रहे हैं.

ये भी नहीं मान रहे कि औरतों और बच्चों का रेप और मर्डर हुआ है.

ये माना जा रहा है कि जो बर्मा में चल रहा है, उसकी खबर दुनिया में नहीं फैल रही है. सिर्फ अंदाजा लगाया जा रहा है कि कितने लोग मरे हैं. शुरू में कुछ लोगों के मरने की बात आई थी. फिर ये आंकड़ा सैकड़ों में पहुंचा. फिर हजारों की बात हो रही है.

2013 में यूएन ने रोहिंग्या मुसलमानों को दुनिया में सबसे ज्यादा प्रताड़ित समुदाय माना था. इनको पढ़ाई-लिखाई की सुविधा भी नहीं है. दो से ज्यादा बच्चे नहीं पैदा कर सकते.

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आंग सान सू की, बर्मा की मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वाली नेता

कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान?

बर्मा में ज्यादातर आबादी बौद्ध धर्म को मानने वाली है. पर यहां पर 10 लाख के आस-पास मुसलमान भी रहते हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि ये बांग्लादेश से आये हुए हैं. बर्मा की सरकार इनको नागरिकता देने से मना कर दिया है. ये सरकार भूल गई कि ये लोग यहां पर कई पीढ़ियों से रहते हैं. ये लोग बर्मा ने ना तो जमीन जायदाद खरीद सकते हैं, ना ही कुछ कर सकते हैं. इनके आने-जाने पर भी पाबंदियां हैं.

राखाइन स्टेट में 2012 से ही रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति हिंसा जारी है. हजारों लोग मार दिये गये हैं. हजारों घर छोड़कर भाग गये हैं. वो बहुत ही जर्जर कैंपों में रह रहे हैं. बहुत सारे लोग तो बांग्लादेश और इंडिया भाग गये हैं. इंडिया में लगभग 8 हजार रोहिंग्या रहते हैं. ये दिल्ली के अलावा, जम्मू, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं. ये यूएन का आंकड़ा है.

रोहिंग्या समंदर के रास्ते भागने की कोशिश करते हैं. लेकिन कोई भी देश उन्हें लेने को तैयार नहीं है. हज़ारों लोग समंदर में फंसे रहते हैं. नाव डूब जाती है. कुछ बीमारियों की भेंट चढ़ जाते हैं जबकि कई लोग मानव तस्करों के हाथों में पड़ जाते हैं. कई लोग मलेशिया और इंडोनेशिया का रुख़ करते हैं. ये सोचकर कि मुस्लिम-बहुल देश होने के नाते वहां उन्हें शरण मिलेगी, लेकिन ये इतना आसान नहीं होता. ये दोनों ही देश रोहिंग्या लोगों से हमदर्दी तो रखते हैं लेकिन उन्हें अपने यहां शरण नहीं देना चाहते. उन्हें डर होता है कि शरण दी तो और हजारों लोग भी आने लगेंगे. इसका असर समाज और इकॉनमी पर पड़ता है. यहीं थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया भी सोचते हैं.

राखाइन राज्य में क्या हो रहा है?

राखाइन में 2012 में बड़े दंगे हुए थे जिनमें लगभग 200 लोग मारे गए थे. ये दंगे एक बौद्ध लड़की के बलात्कार और फिर उसकी हत्या के बाद शुरू हुए. इसका इल्ज़ाम तीन रोहिंग्या लोगों पर लगा. इसके बाद मार्च 2013, अगस्त 2013, जनवरी 2014 और जून 2014 में भी अल्पसंख्यक रोहिंग्या और बहुसंख्यक बौद्धों के बीच हिंसक टकराव हुआ. लेकिन मरने वालों में ज़्यादातर रोहिंग्या ही बताए जाते हैं.

2016 में बर्मा की मौंगडोव सीमा पर 9 पुलिस वाले मारे गए. ये क्लियर नहीं हुआ कि किसने मारा है. पर रोहिंग्या मुसलमानों पर आरोप लगा. ये हो सकता है कि कुछ हिंसक रोहिंग्या लोगों ने मारा होगा. पर आपराधिक प्रवृत्ति के लोग तो हर समुदाय में होते हैं. इसका बदला बच्चों और औरतों का रेप और मर्डर कर के तो नहीं निकाला जा सकता. अक्टूबर 2016 के बाद से तो बर्मा की सेना ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू कर दिया है.

2016 में ही बर्मा में 25 साल बाद चुनाव हुए थे. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की की पार्टी को बहुमत मिला था. हालांकि संवैधानिक वजहों से वो प्रेसिडेंट नहीं बन पाईं, पर सत्ता में उनका दखल तो बना ही हुआ है. पर मानवाधिकारों के लिए जिंदगी भर लड़ने वाली आंग सान इस मुद्दे पर चुप हैं. राखाइन स्टेट में पत्रकारों को भी नहीं जाने दिया जाता. ऐसा माना जाता है कि आर्मी का अभी भी दखल है. इसलिए आंग सान नहीं बोलतीं. पर एक बार उन्होंने कहा था कि सब कुछ कानून के अंदर ही हो रहा है.

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