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काबुल: अस्पताल के मैटरनिटी वार्ड में आतंकी हमला, बच्चों की आंख नम कर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं

12 मई की सुबह का वक्त था. करीब 11 बज रहे थे. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक अस्पताल के मैटरनिटी वॉर्ड में हमला हुआ. तीन बंदूकधारी 100 पलंग वाले अस्पताल में घुसे और दनादन फायरिंग कर दी. धमाके भी हुए. ‘अलजज़ीरा’ की रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में दो नवजात बच्चों समेत 16 लोगों की मौत हुई. इनमें बच्चों की मां और अस्पताल की कुछ नर्सें भी शामिल थीं.

हमलावरों को रोकने के लिए पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की और तीनों को मार गिराया. अस्पताल में मौजूद करीब 80 लोग घायल हुए, जिन्हें बाद में पुलिस ने बचाया.

ये अस्पताल काबुल के दाश्त-ए-बार्ची इलाके में था. इसे मेडिसिन्स सन्स फ्रन्टियर्स (MSF) चलाता है. ये इंटरनेशनल NGO है. जो ज्यादातर युद्धग्रस्त जगहों पर मेडिकल सेवाएं देता है.

Afghanistan Terror Attack 2
काबुल के अस्पताल में हमले के बाद रोते हुए एक आदमी को संभालता हुआ एक सुरक्षा कर्मी. (फोटो क्रेडिट- AP)

इस हमले के अलावा इसी दिन एक और हमला हुआ. अफगानिस्तान में ही काबुल से करीब 200 किलोमीटर दूर एक प्रांत है- नंगरहार. यहां एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार के दौरान बम विस्फोट हुआ. एक सुसाइड बॉम्बर (आत्मघाती हमलावर) ने भीड़ के बीच ये विस्फोट किया. करीब 24 लोगों की मौत हो गई.

यानी 12 मई को अफगानिस्तान में दो बड़े हमले हुए, जिनमें करीब 40 लोगों की मौत हुई और 80 से ज़्यादा घायल हुए. धमाके की कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो बेहद दर्दनाक है.

ज़िम्मेदारी किसने ली?

BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामिक स्टेट (IS) ने नंगरहार हमले की ज़िम्मेदारी ली है. तालिबान का कहना है कि दोनों में से किसी हमले में उसका हाथ नहीं है.

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अस्पताल की दीवार देखिए, बंदूक की गोलियों से गड्ढे बन गए हैं. (फोटो क्रेडिट- AP)

धमाके पर अफगान क्या बोला?

तालिबान ने दोनों में से किसी हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन अफगान सरकार ने कड़ा रुख अपना लिया है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने अपनी सेना को तालिबान और बाकी आतंकी ग्रुप्स के खिलाफ आक्रामक होने का आदेश दिया. ‘रॉयटर्स’ के मुताबिक गनी ने कहा,

‘सार्वजनिक जगहों पर लोगों को सुरक्षा देने और तालिबान समेत बाकी आंतकी समूहों की धमकियों से उन्हें बचाने के लिए, मैं अफगान की सिक्योरिटी फोर्सस को आदेश देता हूं कि बचाव वाले मोड से अब वो आक्रामक मोड पर आ जाएं. और दुश्मनों के खिलाफ अपने ऑपरेशन्स शुरू कर दें.’

‘CNN’ के मुताबिक गनी ने कहा,

‘अस्पताल और नंगरहार में हुए हमले की मैं निंदा करता हूं. तालिबान से हमने कई बार सीज़फायर का आग्रह किया, लेकिन उसने इन सबको खारिज कर दिया. सीज़फायर की बात कहना कमज़ोरी नहीं होती.’

अशरफ गनी ने ये बात अमेरिका और तालिबान के बीच हुए ‘शांति समझौते’ के करीब ढाई महीने बाद कही.

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हमले के बाद एक नवजात को सुरक्षित जगह पर ले जाता शख्स (फोटो क्रेडिट- AP)

आखिर शांति समझौते का हो क्या रहा है?

29 फरवरी को अमेरिका और तालिबान के बीच ‘शांति समझौता’ हुआ था. इसे पूरा करने से पहले अमेरिका ने एक शर्त रखी थी. ये कि अगर तालिबान समझौता चाहता है, तो उसे हिंसा कम करने के प्रति गंभीरता दिखानी होगी. एक हफ़्ते का टाइमफ्रेम तय हुआ था. ये हफ़्ता 21 फरवरी से शुरू हुआ था. एक हफ्ते तक तालिबान ने कोई हमला नहीं किया, तो फिर समझौता हो गया.

‘पीस अग्रीमेंट’ में ये चार बातें तय हुई थीं-

1. अमेरिका और इसके सहयोगियों के विरुद्ध किसी शख्स या संगठन द्वारा अफगानिस्तान की ज़मीन के इस्तेमाल पर रोक
2. 14 महीने के भीतर सभी अमेरिकी (NATO समेत) फौजों के अफगानिस्तान से बाहर निकलने पर सहमति
3. अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत
4. स्थायी सीज़फायर.

लेकिन एक शर्त पर पेंच फंस गया. अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत पर. दरअसल, अफगान सरकार की कैद में तालिबान के करीब 15,000 लड़ाके हैं. ‘शांति समझौते’ के मुताबिक इनमें से 5,000 को 10 मार्च तक रिहा करने की बात कही गई थी. और इसी दिन से तालिबान और अफगान सरकार के बीच बातचीत शुरू होनी थी. मतलब, ये वार्ता शुरू होने की शर्त थी. लेकिन 1 मार्च को अशरफ गनी ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया. कहा कि तालिबानी कैदियों की रिहाई को उनका कोई कमिटमेंट नहीं था.

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अस्पताल की खिड़की में देखिए गोली से बने छेद. दूसरी तरफ सुरक्षा कर्मी राहत एवं बचाव कार्य करते दिख रहे हैं. (फोटो क्रेडिट- AP)

उनके इनकार के अगले ही दिन, यानी 2 मार्च को पूर्वी अफगानिस्तान में एक हमला हो गया. एक फुटबॉल मैच पर. उस वक्त तालिबान के प्रवक्ता ज़बिहुल्लाह मुजाहिद ने मीडिया को बताया,

‘हिंसा में कमी लाने के लिए तय किया गया समय अब ख़त्म हो गया है. अब हमारी गतिविधियां पहले की तरह जारी रहेंगी. अमेरिका-तालिबान समझौते के तहत, हमारे मुजाहिदीन विदेशी सैनिकों पर हमला नहीं करेंगे. मगर अफगान सरकार पर हमारा हमला जारी रहेगा.’

फिर अफगान सरकार ने कई बार तालिबान से सीज़फायर मानने की अपील की, लेकिन तालिबान ने नहीं माना. फिर कोरोना वायरस के मामले आने लगे, तो सरकार इसमें बिज़ी हो गई. न लड़ाके रिहा हुए और न अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचत हुई. और अब अफगान सरकार ने अपनी सेना को फिर आक्रामक होने का आदेश दे दिया है. ‘शांति समझौते’ पर और जानकारी के लिए यहां क्लिक करें.


वीडियो देखें: USA-तालिबान शांति समझौता में भारत की मौजूदगी के क्या मायने हैं?

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