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70 साल बाद पाकिस्तान गए इस शख्स की कहानी हम सबके काम की है

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भारत-पाकिस्तान बंटवारा (पार्टिशन). हमारी जेनरेशन के लिए पार्टिशन मतलब सनी देओल की ‘ग़दर’ या मंटो की कहानियां भर हैं. हमारे लिए वो महज़ एक लफ्ज़ है, जिसे हम सिर्फ बोलते हैं. एक हद तक समझ भी लेते हैं. लेकिन महसूस नहीं कर पाते.

1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तब लाखों लोग मारे गए. इस मौत का खौफ सबकी आंखों में देखा जा सकता था. और उसी से सबको बचना भी था. बहुत मुश्किल हालात थे. लेकिन इससे भी बड़ा दुख था- अपना देश, अपना शहर, अपना घर, सब कुछ छोड़कर, एक बिल्कुल ही नई जगह जाना. जहां आप पहले कभी नहीं गए. ये सब बहुत हृदय विदारक था. ऐसा क़त्लेआम कि लफ़्ज़ों में बयान करना मेरे लिए मुश्किल है. लेकिन भारत से पाकिस्तान गए  इस शख्स की कहानी सुनकर कुछ हद तक उस दर्द को समझा जा सकता है. ये शख्स पाकिस्तान जाना चाहता है. लेकिन उसके घर वाले ये नहीं चाहते थे.  मगर अब वो घूम आए हैं पाकिस्तान. इनकी कहानी सुनकर दंग रह गया हूं.

इंटरनेशनल न्यूज चैनल अल ज़जीरा ने एक वीडियो बनाया है कृष्ण कुमार खन्ना पर. विस्थापन का दर्द क्या होता है, वो सहा है इन्होंने. देश बंटा तो उन्हें उन्हें भी पाकिस्तान में अपना सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान आना पड़ा था. ये वीडियो एक हिंदुस्तानी के ‘अपने घर’ यानी पाकिस्तान जाने के बारे में है. इस वीडियो में अपने घर लौटने की ज़िद है. कृष्ण कुमार के पाकिस्तान जाने की ज़िद से लेकर वहां दो दिन और रुकने की जिद तक. ये वीडियो इतना प्यारा और हार्टवॉर्मिंग है कि इसे जितनी बार देखा जाए उतनी बार आंखें नम हो जाएं.

इनकी पाकिस्तान यात्रा पर ये वीडियो देख हमें लगा कि कहानी आप तक भी पहुंचनी चाहिए. तो पढ़िए!

कृष्णा कुमार पाकिस्तान के शेखूपुरा जिले के रहने वाले थे. वहीं पर उनका मकान और दुकान दोनों थे. वो वहां जाना चाहते हैं, फिर से. आज़ादी के 70 साल बाद. उन लम्हों को, उन यादों को, अपने बचपन को, फिर से जीना चाहते हैं. ‘वो पाकिस्तान जाना चाहते हैं’. उनके घर वाले उन्हें मना कर रहे हैं. पत्नी, भाई, पतोहू सब. सब कहते हैं वहां खतरा है, मार-काट होता है. लेकिन कृष्णा ने मन बना लिया है. अब तो वीज़ा भी लग गया है. दूसरे प्रयास में. पहली बार तो उन्हें वीज़ा ऑफिस वालों ने पाकिस्तान का वीज़ा देने से ही मना कर दिया था. लेकिन अब मिल गया है. पैकिंग हो गई है. जा रहे हैं अपने घर. अपने भाई और भांजे के साथ. जिनका मन बिल्कुल नहीं बस कृष्णा की ज़िद की वजह से जा रहे हैं.

9 बजे ट्रेन है. वहां से बॉर्डर क्रॉस करेंगे फिर पाकिस्तान पहुंचेंगे. बच्चे-बड़े सब दादाजी के साथ फोटो ले रहे हैं. क्या पता आएं-ना आएं. आखिर पाकिस्तान जा रहे हैं. पकिस्तान वाले घर की चाबी भी ले ली है. उस समय ताला लगाकर आए थे न. क्या पता वापस आ जाएं. आज जा रहे हैं. 22 साल की उम्र में आए थे, अब 92 साल के हैं. बॉर्डर पर पुलिस भड़काती है. ख़राब जगह है. वहां के जवान गोली मार देते हैं. स्मग्लिंग करवाते हैं. लेकिन अब बॉर्डर क्रॉस कर लिया है.

अपने परिवार के साथ फ़ोटो खिंचाते कृष्ण कुमार.(फ़ोटो- अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)
अपने परिवार के साथ फ़ोटो खिंचाते कृष्ण कुमार.(फ़ोटो- अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)

यहां का मौसम भी बिल्कुल हिंदुस्तान जैसा है. अरे! लोग भी सेम टू सेम. मिट्टी, लोग सब हमारे जैसे. लेकिन अब लाहौर घूमने की बारी है. वहां के लोगों को भी तो जानना है. बदले हैं या वैसे ही हैं.

आओ, पहले लाहौर का ‘रंग महल’ तो देख लें. ‘ये शहर तो हमारा घर है. यहां तो आराम ही मिलेगा’. इतने में एक बच्चा आता है हिंदुस्तान और पाकिस्तान के नोटों को मिलाता है. पाकिस्तान वाला थोड़ा छोटा है. लेकिन बच्चा कहता है ‘नोट का साइज़ भले ही थोड़ा छोटा हो लेकिन पाकिस्तान का दिल बहुत बड़ा है. यकीन मानें’. पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगते हैं. और कसम से बताऊं पहली दफ़ा ये सुनकर अच्छा लगा है.

फिर कृष्णा उस पार्क में पहुचे, जहां वो पार्टिशन का फ़ैसला आते वक़्त बैठे थे. यहां पर एक औरत अपने बच्चे के साथ उनसे मिलने आती है. बच्चे को गोद में खिलाते हुए कृष्णा की आंखों में आंसू आ जाते हैं. रो क्यों रहे हैं? पूछने पर बताते हैं ‘ये तो ख़ुशी के आंसू हैं’.

बच्चे के साथ कृष्ण कुमार.(फ़ोटो-अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)
बच्चे के साथ कृष्ण कुमार.(फ़ोटो-अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)

अब पाकिस्तान दौरे का आखिरी चरण था. बच्चा अपने घर पहुंच रहा था ‘शेखूपुरा’. जहां पहुंचते ही उसकी धुंधली यादें वो दंश बयां करने लगती हैं, जो उसने आज़ादी और पार्टिशन के दौरान झेला था. उसका घर है जिसके आंगन में 3-4 लाशें खून से लथपथ पड़ी हैं. एक आदमी अपने बदन में खंजर लिए पड़ा था. उनके पहुंचते ही बोला ‘यही तुम्हारी आज़ादी थी’. और उसके बाद एक सन्नाटा पसर गया.

जिसकी चाबी हिंदुस्तान से लेकर आए थे, वो घर अब किसी और का हो चुका है. लेकिन एक बार देखने की बड़ी तमन्ना है. घर की यादें हैं. बस घूम भर लेने से कसक मिट जाएगी. एक बक्सा है उस ज़माने का, जो अबतक सलामत है. छोटे भाईसाब जो बिल्कुल मटीरीयलिस्टिक हैं, भावनाओं से परे होकर कहते हैं ‘उस ज़माने की चीज़ें बड़ी मजबूत होती थीं. आजकल की होती तो टूट गई होती’. सब हंसते हैं. इस हंसी के साथ घुल जाने का मन करता है.

अपने भाई के साथ कृष्ण कुमार.(फ़ोटो- अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)
अपने भाई के साथ कृष्ण कुमार.(फ़ोटो- अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)

कृष्णा और भी पाकिस्तान देखना चाहते हैं. लेकिन भाई मना करता है. ‘जितना देखना था देख लिया. अब कुछ नहीं बचा. वापस चलो’. शेखूपूरा में दो और दिन रुकना चाहते हैं. लेकिन वीज़ा का हवाला देकर उनको बेबस कर दिया जाता है.

फिर पहुंचते हैं अपने स्कूल जहां से पढ़ाई की थी. स्कूल के किस्से तो सबके होते हैं. सो कदम रखते ही याद आने लगे. हेडमास्टर के मना करने के बावजूद, दीवार फांदकर नेहरू का भाषण सुनने का किस्सा सुनाया. क्लास में जाकर बच्चों से मिले. सवाल-जवाब हुआ.

इतने में एक बच्चा खड़ा होकर पूछता है ‘हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोग स इतनी नफरत क्यों करते हैं?’ टीचरों ने आवाज़ दबाने के लिए सवाल टालने की भरपूर कोशिश की. लेकिन जवाब मिला. कृष्णा जी ने कहा ‘नफरत आदमियों को आदमियों से नहीं है. नफरत गवर्नमेंट को गवर्नमेंट से है. अगर नफरत होती तो मैं आता यहां?’

क्लास में खड़े होकर कृष्ण से सवाल पूछता बच्चा.((फ़ोटो-अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)
क्लास में खड़े होकर कृष्ण से सवाल पूछता बच्चा.((फ़ोटो-अल जज़ीरा यूट्यूब स्क्रीनग्रैब.)

अब विदाई का समय आ गया था. फूल बरसाए जा रहे थे. ‘जी तो नहीं कर रहा जाने का दो दिन और रहना चाहता हूं. लेकिन जाना पड़ेगा’. भाई ने मजबूर कर दिया था. ट्रेन आ गई. हिंदुस्तान पहुंच गई. परिवार वाले स्टेशन आए थे. सवालों की झड़ी के साथ. सब पूछ रहे थे, पाकिस्तान के बारे में. पोती कहती है- ‘मैं यूएस का वीज़ा लगवाकर, फिर से दादाजी के साथ पाकिस्तान जाउंगी’. बाकी सब हंसते हैं. लेकिन दादाजी के मन में फिर से एक उम्मीद तो जरूर जग गई होगी.


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