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योगी आदित्यनाथ नहीं, केशव प्रसाद मौर्य हों यूपी के मुख्यमंत्री: ओम प्रकाश राजभर

“ये सरकार सोच रही है कि हम ओम प्रकाश को दबा देंगे. अरे ओम प्रकाश को दबाओगे, तो आग लग जाएगी. ओम प्रकाश खिलवाड़ नहीं है, उसके साथ इन गरीबों का आशीर्वाद है. पूर्वांचल में अब जो ओम प्रकाश चाहेगा, वही होगा. उसी की सरकार बनेगी, जो पूर्वांचल में ओम प्रकाश की ताकत को सलाम करेगा. इग्नोर करेगा, ज़मीन में दफना दूंगा. धमकी देते हैं लोग कि सरकार से निकलवा दूंगा. अरे धमकी देने वालों, तेरी क्या औकात! अंगद की तरह पैर जमाया हूं. अब आमने-सामने होगा. अगर गरीबों की ज़मीन उजाड़ी जाती है, तो निकल पड़ो गांवों से और घेर लो अधिकारियों को. तब ये मानेंगे. बहुत हो गया ड्रामा.

गरीब किसी तरह छप्पर रखता है. ये उजाड़ रहे हैं और कहते हैं कि रामराज आया है. मुझे मालूम है रामराज. मैं जानता हूं भगवान राम के साथ बहुत वानर लड़े थे. पुल बांधना हुआ समुद्र पर, तो वानरों ने पुल बांधा. राम-रावण की लड़ाई में अगर शहीद हुआ, तो वानर शहीद हुआ. और एक भी आवास आज तक वानर नहीं पाया. पाया हो, तो बता दो. आज भी इस सरकार में अधिकारी पैसा लेकर बांट रहे हैं. भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर सरकार और आज भी रिश्वतखोरी हो रही है. हमको डरवाते हैं कि मंत्रिमंडल से हटा दूंगा. हटा दो. मैं तो अटैची में इस्तीफा टाइप करवाकर रखा हूं. गठबंधन धर्म निभाऊंगा. अगर वो नहीं निभाएंगे, तो हम भी नहीं निभाएंगे.”

*****

पूर्वांचल जैसे संदर्भों से आप भांप गए होंगे कि बात उत्तर प्रदेश की है. पर जो इतना तल्खीभरा बयान आपने पढ़ा, ये किसी विपक्षी नेता का बयान नहीं है. ‘दबाने के बदले दफ्न करने’, ‘अधिकारियों को घेर लेने’ और ‘रिश्वत अटैची में लेकर चलने वाला’ ये बयान है ओम प्रकाश राजभर का. वो सूबे में बीजेपी के साथ गठबंधन वाली पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के अध्यक्ष, गाज़ीपुर की ज़हूराबाद विधानसभा से विधायक और योगी सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग और विकलांग विकास विभाग के मंत्री हैं.

मंत्रीपद की शपथ लेते ओम प्रकाश राजभर
मंत्रीपद की शपथ लेते ओम प्रकाश राजभर

राजभर पिछले कई दिनों से अपनी सीनियर पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. जनवरी से अब तक वो अपनी सरकार पर चमचागिरी, घूसखोरी और गरीबों-पिछड़ों को ठगने जैसे कई आरोप लगा चुके हैं. बात तब बढ़ गई, जब 18 मार्च को उन्होंने कह दिया कि वो किसी के गुलाम नहीं हैं. 19 मार्च को रही कसर भी पूरी हो गई, जब उन्होंने कहा,

‘मैंने कई बार चिंता जताई है, लेकिन ये लोग 325 सीटें लेकर पागल होकर घूम रहे हैं. हम NDA का हिस्सा हैं, लेकिन बीजेपी गठबंधन धर्म नहीं निभा रही है. यूपी सरकार कामकाज छोड़कर मंदिर राजनीति खेल रही है. पिछड़ों-गरीबों के कल्याण पर कोई ध्यान नहीं है. सच बोलना विद्रोह है, तो मैं विद्रोह कर रहा हूं.’

यूपी में बीजेपी की गठबंधन सरकार में ऐसा क्या हो गया, जो उसके सहयोगी ये बताने लगे हैं कि वो इस्तीफा साथ रखकर चलते हैं. इस बाबत जब दी लल्लनटॉप ने राजभर से बात की, तो उन्होंने तफ्सील से बहुत कुछ गिनाया.

योगी सरकार की गलतियां गिनाने वाली रैली में राजभर
योगी सरकार की गलतियां गिनाने वाली रैली में राजभर

राजभर की सबसे बड़ी तकलीफ ये है कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते हैं और इस बारे में जब वो बीजेपी नेताओं, मंत्रियों और मुख्यमंत्री से बात करते हैं, तो उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिलता. राजभर के मुताबिक वो पिछड़ों की सेवा करने के लिए सरकार में आए थे, लेकिन मौजूदा सरकार में मंदिर बनाने की बातें करने के अलावा कुछ नहीं हो रहा है. अब उनकी सिर्फ एक मांग है- बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात करना. पर राजभर और बीजेपी का ये गठबंधन हुआ कैसे था!

403 सीटों वाले यूपी में राजभर की पार्टी को बीजेपी से गठबंधन के तहत 8 सीटें मिली थीं. SBSP इनमें से 4 सीटों पर जीती और उसे 0.70% वोट मिला. राजभर के मुताबिक चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उनसे कहा, ‘हम पिछड़ों-दलितों को उनका अधिकार दिलाना चाहते हैं. आप भी वही लड़ाई लड़ रहे हैं, तो आइए साथ में लड़ें.’

राजभर के मुताबिक बड़ी पार्टी के साथ रहकर बदलाव लाने की मंशा से उन्होंने गठबंधन किया, लेकिन अब पार्टी और सरकार में कोई सुनता नहीं है. उन्होंने सीएम योगी से लेकर अमित शाह और सुनील बंसल तक बात पहुंचाई, लेकिन किसी ने कुछ किया नहीं. बकौल राजभर, ‘जब राशन कार्ड दुरुस्त नहीं कर सकते, पात्रों की मदद नहीं कर सकते, तो दोबारा वोट कैसे मांगेंगे. जिसके लिए बहुमत मिला, उसी पर पानी फिर गया.’

जुलाई 2017 में धरना टालने के बाद डीएम के ट्रांसफर के लिए शाह से मिलने के दौरान राजभर
जुलाई 2017 में धरना टालने के बाद डीएम के ट्रांसफर के लिए शाह से मिलने के दौरान राजभर

राजभर ने 1981 में सियासत शुरू की थी. कांशीराम के वक्त में. वो लंबे समय BSP में रहे. फिर 2002 में टिकट के बदले पैसे मांगने के आरोप में पार्टी छोड़ थी. अपनी पार्टी बनाई ‘सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी’. इस पार्टी के झंडे पर वो 2004 से यूपी का हर बड़ा चुनाव लड़ते आ रहे हैं, लेकिन सफलता उन्हें 2017 में बीजेपी के साथ आने के बाद ही मिली. सरकार में आने के कुछ ही महीनों बाद उनकी शिकायतें सतह पर आ गईं.

जून 2017 में राजभर ने बात न सुनने पर गाज़ीपुर के डीएम के खिलाफ धरने पर बैठने का ऐलान किया था. उन्होंने कहा था, ‘सपा के दौर के अधिकारियों ने 15 साल लूटपाट की है और आज भी बात न मानते हुए पुराने काम कर रहे हैं. इससे पिछड़ों का भला नहीं हो पा रहा है. मेरा प्रदर्शन सरकार नहीं भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ है. ये हमारी उपेक्षा नहीं, उम्मीद करने वाली जनता की उपेक्षा है.’

हालांकि, धरने से पहले ही राजभर की लखनऊ में योगी आदित्यनाथ के मुलाकात हो गई और 19 में से 17 मांगें माने जाने की घोषणा के साथ ही धरना कैंसिल कर दिया गया.

एक मंच पर अमित शाह और ओम प्रकाश राजभर
एक मंच पर अमित शाह और ओम प्रकाश राजभर

इसके बाद राजभर ने 2018 की शुरुआत से जो मोर्चा खोला, वो अब तक जारी है. 31 जनवरी को उन्होंने बनारस में कहा, ‘हमें मालूम है कि उनके यहां जो चमचागिरी करेगा, वो बहुत अच्छा रहेगा. जो समाज की बात करेगा, वो बुरा रहेगा, तो ओम प्रकाश बुरा रहेगा. पिछली सरकार में 500 रुपए घूस लेते थे, तो इस सरकार में 5,000 घूस ले रहे हैं.’

3 फरवरी को बनारस में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रैली थी, लेकिन राजभर ने उसमें शामिल होने के बजाय अपनी रैली की. भीड़ के ज़रिए मेसेज देने की कोशिश की गई कि बीजेपी को अनिल राजभर से नहीं, बल्कि ओम प्रकाश राजभर से फायदा होगा. 7 फरवरी को कौशांबी में कहा कि 2019 का चुनाव साथ मिलकर लड़ेंगे, लेकिन ये बताना नहीं भूले कि उनकी पार्टी 32 सीटों पर जीत-हार तय करती है.

8 फरवरी को चीज़ें और तल्ख हो गईं, जब राजभर ने अंबेडकर नगर में कहा कि पिछली सरकार के अधिकारियों की तैनाती की वजह से कासगंज जैसी घटना हुई. बीजेपी की तरफ से इसके जवाब में अनिल राजभर ने कहा कि अगर ओम प्रकाश गठबंधन से संतुष्ट नहीं हैं, तो विकल्प देख लें. 18 फरवरी को चंदौली की अपनी रैली में राजभर ने कुछ ऐसी बातें कहीं, जिससे उनके NDA से बाहर होने के कयास लगने लगे. फिर 20 फरवरी को सीएम योगी के गड्ढे भरने के दावे की खिल्ली उड़ाते हुए कहा, ’70 साल के गड्ढे क्या हमसे 10 महीने में ही भरवाओगे!’

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राजभर की इतनी शिकायतों पर हमने पूछा कि आखिरी मौजूदा सरकार के काम करने का तरीका क्या है. इस पर राजभर बड़ा दावा करते हैं. वो कहते हैं,

‘कल तक सपा के लोग कहते थे कि काम बोलता है, लेकिन इस सरकार में विज्ञापन बोलता है. विज्ञापन के बल पर बोल रहे हैं और अधिकारी मनमाना काम कर रहे हैं. जब अधिकारी जनप्रतिनिधि की बात नहीं सुनेंगे, तो काम कैसे चलेगा.’

सवाल ये भी उठता है कि क्या सारी दिक्कत राजभर को ही है. विधायक तो बीजेपी के भी हैं, वो शिकायत क्यों नहीं करते? राजभर जवाब देते हैं कि अधिकारी अंकुश के बाहर हैं. मंत्री फोन करता है, तो धमकी देते हैं कि हटवाकर दिखाओ. थाने फोन करने पर पुलिसवाले फरियादियों से कहते हैं कि जाओ अपने मंत्रीजी से कहो कि हमें हटवा दें. अधिकारी ऐसे बात करेगा, तो कैसे चलेगा. न उनकी सुनी जा रही है और न बीजेपी विधायकों की. राजभर उदाहरण गिनाते हैं,

‘बलिया के विधायक ने डीएम के खिलाफ धरना दिया था. भदोही में तो विधायक को 8 घंटे तक धरने पर बैठना पड़ा था. बस्ती के विधायक की किसी पुलिसवाले ने बात नहीं सुनी थी. उन्हें दिनभर थाने में बैठना पड़ा था.’

राजभर के ये दावे सही हैं. बलिया का मामला 11 मार्च 2018 का है, जब बीजेपी विधायक आनंद स्वरूप शुक्ला ने डीएम सुरेंद्र विक्रम के खिलाफ योगी को भ्रष्टाचार की शिकायत वाला पत्र लिखा था. भदोही का मामला 28 जनवरी का है, जब बीजेपी विधायक दीनानाथ भास्कर समर्थकों के साथ तहसील में धरने पर बैठ गए थे. इसके अलावा बस्ती वाला मामला अप्रैल 2017 का है.

तहसील में समर्थकों के साथ धरने पर बैठे बीजेपी विधायक दीनानाथ भास्कर
तहसील में समर्थकों के साथ धरने पर बैठे बीजेपी विधायक दीनानाथ भास्कर

हालांकि, ऐसा नहीं है कि राजभर को मौजूदा सरकार से सिर्फ तकलीफ ही है. त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराने के सवाल पर वो कहते हैं कि यूपी और त्रिपुरा की बीजेपी सरकार में फर्क है. वो यूपी पुलिस के एनकाउंटर की भी तारीफ करते हैं. पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वो दो तरह की बातें करते हैं.

7 मार्च 2018 को उन्होंने संत कबीरनगर में कहा कि इस सरकार का अब तक एक भी घोटाला सामने नहीं आया है. जो भी घोटाले हैं, वो पिछली सरकारों के हैं. लेकिन दूसरी तरफ वो ये भी कहते हैं कि घूस की दर 500 से बढ़कर 5,000 हो गई है.

पूर्वांचल की सियासत में राजभर इसलिए चर्चा में रहते हैं, क्योंकि इस इलाके में 18% राजभर हैं. ये ओबीसी समुदाय से आते हैं, जिसमें मौर्य, यादव और लोध भी हैं. मौजूदा वक्त में बीजेपी सोशल इंजीनियरिंग के छांव तले हर वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है. राजभर की पार्टी से गठबंधन इसी का नतीजा था. वैसे राजभर लंबे वक्त से अपने समुदाय को एससी का दर्जा दिलाने की मांग करते रहे हैं. अभी तक के चुनाव परिणाम राजभर की पार्टी पर खेल बिगाड़ने वाली का ठप्पा भी लगाते दिखे हैं.

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ओम प्रकाश कहते हैं कि बीजेपी गठबंधन धर्म नहीं निभा रही है. उनके मुताबिक सीनियर पार्टी होने के नाते बीजेपी को अपने सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना चाहिए, फिर भले वो मनमाना काम करे. चाहे वो लोकसभा उपचुनाव के उम्मीदवारों की घोषणा हो या राज्यसभा कैंडिडेट्स का ऐलान. राजभर के मुताबिक उनकी पार्टी को कहीं भी लूप में नहीं रखा गया.

राजभर को खुद अपने विभाग में काम करने में कहा दिक्कत आ रही है, इसके जवाब में वो कुछ आंकड़े गिनाते हैं,

‘यूपी में विकलांगों के लिए मात्र 16 विद्यालय और लखनऊ में एक यूनिवर्सिटी है. प्रदेश की आबादी डेढ़ करोड़ है. अब हर जिले में विकलांगों के लिए कमिश्नरी विद्यालय की ज़रूरत हो गई है, लेकिन सरकार कहती है कि उसके पास इसके लिए बजट नहीं है. विकलांगों को 4% नौकरी की भी मांग है, लेकिन अधिकारी सुनते ही नहीं हैं. हम अपने लिए ठेका-पट्टा चाहें, तो बात गलत थी. पर बैकवर्ड और विकलांगों की ज़रूरत तो पूरी की जाए.’

राजभर के पिछले कुछ बयानों पर बीजेपी नेता सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था कि उन्हें सार्वजनिक रूप से बोलने के बजाय कैबिनेट में अपनी बात रखनी चाहिए. राजभर जवाब देते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी तो अपनी बात जनता के बीच में रखी थी. मैं जब अंदर कहते-कहते थक गया, तो अब मीडिया के सामने कहा है. लोगों को भी लगे कि उनका नेता लड़ रहा है. वो किसी एक गांव जाकर देख लें कि कितनों का राशन कार्ड नहीं बना है और कितने बीमार हैं. कागज़ों पर सब सुधर गया है, लेकिन असल हालत अलग है.’

राजभर के बगावती तेवरों के बाद से बीजेपी नेता भी उन पर कई आरोप लगा चुके हैं
राजभर के बगावती तेवरों के बाद से बीजेपी नेता भी उन पर कई आरोप लगा चुके हैं

यूपी में योगी सरकार का एक साल पूरा होने पर सरकार की तरफ से लखनऊ में कार्यक्रम रखा गया था. राजभर इसमें नहीं पहुंचे. पार्टी की तरफ से उन्हें मनाने के लिए संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना को भेजा गया था, लेकिन आधे घंटे की बातचीत के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बैठक में क्या हुआ, इसके जवाब में राजभर कहते हैं, ‘मैंने उनसे कहा कि जब तक मेरी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से बात नहीं हो पाती, तब तक मैं कहीं नहीं जाऊंगा.’

राजभर की नाराज़गी के पीछे एक वजह राज्यसभा चुनाव बताया जा रहा है, जिसमें राजभर अपने 4 विधायकों के बूते बीजेपी का नुकसान कर सकते हैं. यूपी में बीजेपी के 8 सांसद आसानी से राज्यसभा जाते दिख रहे हैं, लेकिन पेंच है नवें सांसद पर, जिसमें निर्दलीय और बाकी सहयोगी दल खेल कर सकते हैं. राज्यसभा के सवाल पर राजभर कहते हैं, ‘सकलदीप राजभर मेरी वजह से राज्यसभा जा रहे हैं, लेकिन दिक्कत ये है कि पर्चा भरते समय ओमप्रकाश को क्यों नहीं पूछा गया. पूर्वांचल में राजभरों के वोट के लिए ओम प्रकाश को पूछते हैं, तो साथ में लेकर क्यों नहीं चलते. ज़रूरत पड़ने पर हम राज्यसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे.’

बीजेपी के राज्यसभा प्रत्याशी सकलदीप राजभर
बीजेपी के राज्यसभा प्रत्याशी सकलदीप राजभर

राज्यसभा के अलावा 2019 के लोकसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा भी छोटा मुद्दा नहीं है. कयास लगाए जा रहे हैं कि राजभर लोकसभा में ज़्यादा सीटें पाने के लिए बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, इस सवाल को वो साफ टाल जाते हैं. कहते हैं, ‘हमने अभी किसी ने कुछ पूछा नहीं है और हमने किसी से कुछ कहा नहीं है.’

सवाल ये भी है कि राजभर को असल दिक्कत सरकार से है, अधिकारियों से है या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से है. इस सवाल का वो गहरा जवाब देते हैं,

‘यूपी में सपा हो, बसपा हो या बीजेपी… पार्टी को भी हो… सब किसी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर चुनाव लड़ते हैं और जीतने पर उसी को मुख्यमंत्री बनाते हैं. लेकिन इन्होंने पहले मौर्या को आगे करके जनता से वोट ले लिया. फिर जब सीएम बनाने की बारी आई, तो किसी और को बना दिया. अगर वोटर की अवहेलना की जाएगी, तो बाद में इसका नुकसान तो होगा ही.’

एक मंच पर केशव और राजभर
एक मंच पर केशव और राजभर

राजभर का इशारा सीधा है कि यूपी में बीजेपी को सीएम की कुर्सी पर योगी के बजाय केशव को बिठाना चाहिए था. उनका ये जवाब सीधा सवाल खड़ा करता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वो बीजेपी के खेमे में खड़े होंगे या उस गठबंधन के खेमे में, जो खुद के सामाजिक न्याय का अगुवा होने का दावा करता है. राजभर इस सवाल का नेताओं वाला जवाब देते हैं,

‘बीजेपी हमें गठबंधन में रखना चाहेगी, तो रहेंगे. नहीं रखना चाहेगी, तो नहीं रहेंगे.’

सपा-बसपा के गठबंधन पर राजभर पहले ही कह चुके हैं, ‘जब बाढ़ आती है, तो कीड़े-मकोड़े पेड़ पर चढ़ जाते हैं.’ अब गेंद हर राज्य में सीनियर पार्टी बनकर रहने की इच्छा रखने वाली बीजेपी के पाले में है.


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