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कोरोना काल के बीच चीन ने मंगल ग्रह पर उतारा ‘आग का देवता’!

कोरोना काल के बीच चीन ने अपने एक बड़े स्पेस प्रोग्राम को अंजाम दिया है. उसने मंगल ग्रह पर स्पेसक्राफ्ट उतार दिया है. नाम है- Zhurong, जो मंगल ग्रह के उत्तरी क्षेत्र की जानकारियां पृथ्वी तक भेजेगा. चीन पहली बार ऐसा करने में सफल हुआ है. जबकि दुनियाभर की बात करें तो उससे पहले दो ही देश ऐसा कर सके हैं – अमेरिका ने 1976 में स्पेसक्राफ्ट को मंगल ग्रह पर लैंड कराया था. इसके बाद से तो वह 9 सफल लैंडिंग करा चुका है. इससे पहले 1971 में सोवियत संघ ने ऐसा किया था, लेकिन उनका मिशन पूरी तरह सफल नहीं रहा था. क्योंकि सोवियत संघ के स्पेसक्राफ्ट में मंगल पर टचडाउन करते ही तकनीकी ख़राबी आ गई थी और उसने वहां से सूचनाएं भेजना बंद कर दिया था.

चीन की न्यूज़ एजेंसी Xinhua के मुताबिक Zhurong मंगल ग्रह पर यूटोपिया प्लैनिशिया (Utopia Planitia) पर अपने खोजी अभियान की शुरुआत करेगा और वहां से जानकारियां भेजेगा. यूटोपिया प्लैनिशिया, ग्रह के उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित एक विशाल भूभाग है. चीन के राष्ट्रपति शी झिनपिंग ने देश को इसके लिए बधाई देते हुए कहा है कि ये चीन के वैज्ञानिकों की अभूतपूर्व उपलब्धि है.

आग का देवता

झूरॉन्ग, चीन की भाषा का शब्द है, जिसका मतलब होता है- आग का देवता. इसे Tianwen-1 ऑर्बिटर के ज़रिये लैंड कराया गया है. बीजिंग के समय के मुताबिक ये 15 मई को सुबह 7 बजकर 18 मिनट पर लैंड हुआ. भारतीय समय के मुताबिक सुबह के करीब 4 बजकर 48 मिनट. 17 मिनट लेकर इस स्पेसक्राफ्ट ने अपने सोलर पैनल समेटे और फिर धरती पर संदेश भेजा.

क्या चुनौती थी?

पृथ्वी से मंगल ग्रह तक की दूरी करीब 32 करोड़ किलोमीटर है. मंगल ग्रह से स्पेसक्राफ्ट कोई भी संदेश भेजे तो उसे पृथ्वी पर रिसीव होने में करीब 18 मिनट लगते हैं. इस नाते स्पेसक्राफ्ट को वहां लैंड करने और ख़ुद को सेटल करने का पूरा प्रोसेस ख़ुद ही मैनेज करना था. क्योंकि अगर वो कोई संदेश भेजता भी तो पृथ्वी पर वो 18 मिनट बाद मिलता. तब कहीं जाकर यहां से उसे कोई कमांड दी जा सकती.

Zhurong रोवर के सतह तक पहुंचने के हर चरण को इसी तरह डिज़ाइन किया गया था. मंगल ग्रह के वातावरण में एंट्री करना, वहां लैंड करना बिल्कुल इसी तरह रह. Tianwen-1 ऑर्बिटर से रोवर को रिलीज़ किया गया और ये रोवर धीरे-धीरे सतह की ओर बढ़ा. एक पैराशूट के ज़रिये इस रोवर की रफ्तार को नियंत्रित किया गया और इसे उस जगह तक ले जाया गया, वहां वैज्ञानिक इसे लैंड कराना चाह रहे थे. ये एक बड़ी चुनौती होती है.


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