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तकनीकी शिक्षा की क्वालिटी सुधारने के लिए हायर किए गए इन टीचर्स के साथ बड़ा खेल हो गया!

शास्त्री भवन. लुटियंस दिल्ली की एक सरकारी इमारत. यहां कई सारे मंत्रालय हैं. शिक्षा मंत्रालय का कामकाज भी यहीं से होता है. शास्त्री भवन से बाहर निकलने पर सड़क के उस पार एक छोटा सा पार्क है. इस पार्क में पिछले 40 दिनों से कुछ लोग रोज आकर बैठते हैं. ये लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आए हैं. पूरे दिन पार्क में बैठे रहते हैं. फिर शाम को चले जाते हैं. अगले दिन फिर आ जाते हैं… और फिर वही प्रक्रिया.

कौन हैं ये लोग?

बीते कई हफ्तों से शास्त्री भवन के सामने धरना दे रहे ये लोग IIT और NIT जैसे संस्थानों से पढ़े हुए हैं. 30 सितंबर तक 12 अलग-अलग राज्यों के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर हुआ करते थे. अब नहीं हैं. दरअसल, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) ने वर्ल्ड बैंक के साथ मिलकर अप्रैल 2017 से एक प्रोजेक्ट शुरू किया था. प्रोजेक्ट का नाम है Technical Education Quality Improvement Programme (TEQIP). कम आय वाले राज्यों पर विशेष ध्यान देते हुए ये प्रोजेक्ट शुरू किया गया था. केंद्र के साथ 12 राज्यों ने एमओयू यानी सहमति पत्र साइन किए थे.

केंद्र और राज्यों के बीच का सहमति पत्र
केंद्र और राज्यों के बीच का सहमति पत्र

चिह्नित राज्यों में पहले से मौजूद इंजीनियरिंग संस्थानों में तकनीकी शिक्षा की क्वालिटी सुधारने के लिए TEQIP कार्यक्रम के तीन चरण शुरू किए गए थे. अप्रैल 2017 में 10 चिह्नित राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के 53 इंजीनियरिंग कॉलेजों में 1,554 टीचर्स की नियुक्ति की गई थी. ये असिस्टेंट प्रोफेसर देश के प्रमुख संस्थानों- भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (NITs) से ग्रेजुएट अथवा पोस्ट ग्रेजुएट थे. इन्हें तीन साल के लिए कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर नियुक्त किया गया था.

बुंदेलखंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी, झांसी में असिस्टेंट प्रोफेसर अनुराग बताते हैं,

इस प्रोजेक्ट को इस तरह से डिजाइन किया गया था कि केंद्र सरकार तीन साल तक विश्व बैंक की सहायता से चयनित शिक्षकों को सैलरी देगी. तीन साल के बाद जो वेल परफार्मिंग फैकल्टी बचेंगी, जिनका रेगुलर इंटरवल पर अप्रेजल होता है उनको राज्य सरकार अपने संस्थानों में रेगुलर करेगी. इसके लिए एक एमओयू साइन किया गया था केंद्र और राज्य के बीच.

हम सब लोगों का परफार्मेंस अप्रेजल हुआ. नीति आयोग से लेकर सरकार की कई एजेंसियों ने हमारे काम की सराहना की. तीन साल निकट आया तो केंद्र ने राज्यों को खुद पत्र लिखे कि हमारे और आपके बीच जो एमओयू साइन हुआ है उसका संज्ञान लेकर आप इन शिक्षकों का रेगुलराइजेशन करें. जब राज्यों ने कुछ किया नहीं तो हम दिल्ली आए. उस समय केंद्र ने हमें छह महीने का एक्सटेंशन दे दिया. और ये आश्वासन दिया कि आपके विषय का हम निवारण कर देंगे. दोबारा आपको नहीं आना पड़ेगा.

लेकिन राज्यों की ओर से मामले में कोई प्रगति नहीं हुई. केंद्र सरकार की ओर से दिया गया छह महीने का एक्सटेंशन भी बीती 30 सितंबर को खत्म हो गया. अब ये असिस्टेंट प्रोफेसर बेरोजगार हैं. बीते 40 दिन से दिल्ली की सड़कों पर बैठे हैं. इस दौरान इनकी मुलाकात शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से भी हुई और मंत्रालय के सक्षम अधिकारियों से भी. लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ न मिला. जोधपर के MBM कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर विजयलक्ष्मी बताती हैं,

हम लोग 40 दिन से यहां बैठे हैं. हम लोगों ने डिग्निटी के साथ इस प्रोजेक्ट को जॉइन किया था. हम लोग कोई आउट ऑफ द बॉक्स डिमांड नहीं कर रहे हैं. जो हमारे प्रोजेक्ट इम्प्लिमेंटेशन प्लॉन में लिखा था हम उसी के लिए डिमांड कर रहे हैं. हम सारे अधिकारियों से मिलने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कोई मिल नहीं रहा है. जो मिल रहे हैं वो कुछ क्लियर कट बता नहीं रहे हैं.

पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार शिक्षा में सुधार की बात करती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कई बार शिक्षा सुधार और क्वालिटी एजुकेशन पर जोर देने की बात कह चुके हैं. TEQIP प्रोजेक्ट भी तकनीकी शिक्षा की क्वालिटी को सुधारने के लिए ही शुरू किया गया था. लेकिन महज 4 सालों में ही ये प्रोजेक्ट अधर में लटक गया. उज्जैन के इंजीनियरिंग कॉलेज में 4 साल सेवा दे चुके अंशुल अवस्थी कहते हैं,

हम भारत सरकार से यही कह रहे हैं कि शिक्षा सुधार, गुणवत्ता सुधार सतत चलने वाली प्रक्रिया है. ये लगातार चलती रहती है. ये ऐसा नहीं है कि पुल का प्रोजेक्ट था. पुल बन गया और फिर आपने लेबर कहीं भी छोड़ दिया. शिक्षा सुधार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. हमारे काम की तारीफ नीति आयोग और केंद्र की कई एजेंसियों ने की है. इसके बावजूद आज हम यहां हैं. हमारे और शास्त्री भवन के बीच की दूरी देखें तो बीच में केवल एक सड़क है. लेकिन हमारी बात उन तक नहीं पहुंच पा रही है.

करीब 40 दिन हो गए. हम लोग रोज सुबह शास्त्री भवन जाते हैं. वहां शांतिपूर्वक बैठते हैं और वहां उनको अपने होने का अहसास कराते हैं कि हम लोग वो हैं, जिनके काम की तारीफ नीति आयोग और आपकी एजेंसियों ने की है. जिन्हें 30 सितंबर को कॉलेज से निकाल दिया गया है. हम ये बताने के लिए दिल्ली की सड़कों पर हैं. हमसे वादा किया गया था कि आपको एक प्रोसेस के जरिए सस्टैनबिलिटी दी जाएगी. हम लोगों ने कभी जिंदगी में नहीं सोचा था कि हमें इतने दिन तक यहां इस तरह बैठना पड़ेगा. हमें लगा था कि हम उन्हें अपनी स्थिति बताएंगे तो वे हाथों-हाथ लेंगे और सॉल्यूशन देंगे. लेकिन वे तो धैर्य चेक कर रहे हैं कि हम कितने दिन बैठ सकते हैं.

TEQIP फैकल्टी की मांगों पर सरकार का पक्ष जानने के लिए हमने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन उनके कार्यालय से हमें बताया गया कि अभी वे बाहर हैं और बात नहीं कर सकते हैं. हमने शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों से भी बात करने की कोशिश की लेकिन जवाब नहीं मिल सका. अगर मंत्रालय से कोई जवाब आता है तो हम आगे अपडेट कर देंगे.


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