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सुप्रीम कोर्ट का अपहरण को लेकर अहम फैसला- पीड़ित से अच्छे बर्ताव पर किडनैपर को उम्रकैद नहीं

अपहरण की वारदात को अंजाम देने वाले व्यक्ति का पीड़ित से अच्छा व्यवहार हो तो उसे उम्रकैद की सजा नहीं हो सकती या मौत की सजा में नरमी दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण के एक मामले में सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया है. इसमें उसने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति फिरौती के लिए किसी का अपहरण करता है, लेकिन उसे धमकी नहीं देता या परिजनों से पैसे लेने के लिए पीड़ित को मारता या चोट नहीं पहुंचाता है तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364A के तहत आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत सजा देने के लिए ये साबित किया जाना चाहिए कि जिसका अपहरण हुआ, उसकी मौत होने या उसे चोट पहुंचने का खतरा था, या किडनैपर ने अपने आचरण से उस आशंका को जन्म दिया कि पीड़ित को मौत के घाट उतारा जा सकता है.

कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले में संबंधित कानून और महत्वपूर्ण फैसलों की समीक्षा के बाद जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की बेंच ने कहा कि धारा 364ए के तहत अपहरण के आरोपी को दोषी ठहराने के लिए नीचे दिए कारणों का होना जरूरी है,

1. अपहरण के बाद पीड़ित व्यक्ति को हिरासत में रखना.

2. पीड़ित को मौत या चोट पहुंचाने की धमकी देना या ऐसी आशंका पैदा करना जिससे लगे कि पीड़ित की मौत हो सकती है या उसे चोट पहुंचाई जा सकती है.

3. सरकार, दूसरे देश, सरकारी संगठन या किसी अन्य व्यक्ति को कोई कार्य करने या उससे दूर रहने या फिरौती के वास्ते मजबूर करने के लिए पीड़ित को चोट पहुंचाना या उसकी हत्या करना.

शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी को सजा दिलाने के लिए अभियोजन पक्ष को इन बातों को साबित करना होगा. धारा 364ए के तहत फांसी दिए जाने को लेकर अदालत ने कहा कि इसके लिए पहले मानदंड के अलावा दूसरी और तीसरी शर्त को आरोपी के खिलाफ साबित किया जाना चाहिए, नहीं तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

क्या था मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के एक निवासी शेख अहमद की अपील पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणी की है. याचिका में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी.

इंडिया टुडे/आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 में शेख अहमद ने छठवीं कक्षा के एक छात्र का अपहरण किया था. उसने घर छोड़ने के बहाने इस अपराध को अंजाम दिया था. अहमद ने बच्चे के माता-पिता से दो लाख रुपये की फिरौती मांगी थी. पिता ने पुलिस की मदद ली थी, जिसने बच्ची को छुड़ा लिया था. लेकिन बाद में जब मामला अदालत में चला तो बच्चे और उसके पिता दोनों ने बताया कि अपहरणकर्ता ने पीड़ित के साथ अच्छा व्यवहार किया था. उसने कभी भी बच्चे को मारने या घायल करने की धमकी नहीं दी थी.

हालांकि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने ऑटो चालक को आईपीसी की धारा 364ए के तहत दोषी ठहराया और उसे उम्रकैद की सजा सुनाई. वो इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. वहां हुई सुनवाई में शेख अहमद ने दावा किया कि उसके कब्जे में बंधक के जीवन को कोई खतरा नहीं था. लिहाजा उसे केवल धारा 363 के तहत दोषी ठहराया जा सकता था, जिसमें अधिकतम सात साल की जेल की सजा हो सकती है.

आखिरकार इसी हफ्ते हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने धारा 364ए और आजीवन कारावास की सजा को खारिज कर दिया और कहा, “हम याचिकाकर्ता की सात साल के कारावास की सजा से संतुष्ट हैं. वह 5,000 रुपये का जुर्माना देने के लिए बाध्य है.”


किसी भी केस की सुनवाई से खुद को अलग कैसे कर लेते हैं जज?

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