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दिल्ली हिंसा के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने सबसे सटीक बात कही है

‘सरकार का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं होता है, सरकार और देश दोनों अलग-अलग हैं.’ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने ये बात अपने एक लेक्चर में कही. ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ ने ‘लोकतंत्र और विरोध’ विषय पर एक बातचीत आयोजित की थी. इसमें जस्टिस दीपक गुप्ता ने लोकतंत्र, न्यायपालिका और विरोध के अधिकार पर कई अहम बातें कहीं. जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. विरोधी सुरों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. और बातचीत के जरिए देश को सही तरीके से चलाया जा सकता है.

# और क्या कहा जस्टिस गुप्ता ने

जस्टिस गुप्ता ने कहा, “किसी पार्टी को 51 फीसदी लोगों का समर्थन हासिल हो तो इसका यह मतलब नहीं है कि बाकी 49 फीसदी लोगों को पांच साल तक कुछ नहीं बोलना चाहिए. लोकतंत्र 100 फीसदी के लिए होता है. सरकार सभी के लिए होती है. लोकतंत्र में हर व्यक्ति की भूमिका होती है. जब तक कोई कानून न तोड़े, उसके पास हर अधिकार है.”

उन्होंने श्रेया सिंघल के मामले में जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर हम विरोधी सुरों को दबाएंगे तो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निडर न्यायपालिका के बिना कानून का शासन नहीं हो सकता.

# प्रदर्शन के अधिकार पर क्या कहा?

जस्टिस गुप्ता ने प्रदर्शनों पर भी खुलकर बात की. उन्होंने कहा, ‘नागरिकों को साथ मिलकर प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन शांतिपूर्ण ढंग से. सरकार हमेशा सही नहीं होती. विरोध महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का मूल था. हम सभी गलतियां करते हैं. सरकार को प्रदर्शन का दमन करने का अधिकार नहीं है जब तक प्रदर्शन हिंसक रूप अख्तियार न कर ले. सही मायने में वह देश आजाद है जहां अभिव्यक्ति की आजादी है और कानून का शासन है.

# सरकार और देश अलग-अलग ?

बड़ा सवाल जो अक्सर पूछा जाता है कि सरकार और देश अलग हैं क्या? इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा, “सरकार और देश दोनों अलग-अलग हैं. सरकार का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं है. कोई भी संस्थान आलोचना से परे नहीं है, फिर चाहे वह न्यायपालिका हो या सशस्त्र बल हों. असहमति के अधिकार में ही आलोचना का अधिकार भी निहित है. अगर हम असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे तो ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला होगा.”

जस्टिस गुप्ता ने आगे कहा, “सिर्फ इसलिए कि आप एक विरोधाभासी दृष्टिकोण रखते हैं, इसका मतलब देश का अनादर नहीं है. जब भी विचारों का टकराव होगा, असंतोष होगा. प्रश्न का अधिकार लोकतंत्र का एक अंतर्निहित हिस्सा है. आज देश में असहमति को राष्ट्र-विरोध के रूप में देखा जाता है.”


वीडियो देखें:

दिल्ली के मौजपुर, भजनपुरा, जाफराबाद और सीलमपुर में हुई हिंसा

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