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पेगासस से जासूसी के आरोपों को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर बताया, लेकिन ये सवाल भी उठा दिए

पेगासस (Pegasus) कथित जासूसी मामला गुरुवार 5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में गूंजा. मामले की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली 9 याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में एकसाथ सुनवाई हुई. इस दौरान चीफ जस्टिस एनवी रमना की बेंच ने कहा कि अगर मीडिया रिपोर्ट्स सही हैं तो ये आरोप काफी गंभीर हैं. अदालत ने ये सवाल भी उठाया कि अभी तक इस मामले में आपराधिक केस दर्ज कराने की कोशिश क्यों नहीं हुई.

‘जांच से सामने आएगी सच्चाई’

पेगासस मामले पर सुनवाई करने वाली बेंच में चीफ जस्टिस रमना के अलावा जस्टिस सूर्य कांत शामिल हैं. सुनवाई के दौरान वरिष्ठ पत्रकार एन. राम की ओर से कपिल सिब्बल ने मांग रखी कि सरकार को पेगासस पर जवाब देना चाहिए. वजह ये है कि पेगासस बनाने वाली कंपनी ने खुद कहा है कि वह अपने स्पाईवेयर को सिर्फ सरकारों को ही उपलब्ध कराती है. इस पर जस्टिस रमना ने कहा कि अगर ऐसा है तो कोई राज्य सरकार भी इसके पीछे हो सकती है. सिब्बल ने आगे कहा कि संसद में असदुद्दीन ओवैसी के सवाल पर केंद्र सरकार के मंत्री मान चुके हैं कि भारत मे 121 लोगों को निशाने पर लिया गया था. आगे की सच्चाई तभी पता चलेगी, जब कोर्ट सरकार से जानकारी ले.

कोर्ट ने पूछा, केस क्यों नहीं दर्ज कराया

चीफ जस्टिस ने सवाल उठाया कि पेगासस का मामला 2019 में भी सामने आया था, 2 साल बाद ये मामला क्यों उठाया जा रहा है. इस पर सिब्बल ने कहा कि कनाडा की सिटीजन लैब ने जासूसी से संबंधित नए खुलासे किए हैं, इसलिए ये मामला अभी चर्चा में है. वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने कहा कि जुलाई में ही लिस्ट सामने आई है कि किन-किनकी जासूसी हुई. जस्टिस रमना ने पूछा कि अगर आपको पक्का पता है कि आपके फोन की जासूसी हुई तो आपने कानूनन FIR दर्ज क्यों नहीं करवाई? सुनवाई के दौरान जस्टिस रमना ने कहा-

“अगर मीडिया रिपोर्ट्स सही हैं तो आरोप बहुत ही गंभीर हैं. मैं ये भी नहीं कहना चाहता कि याचिका में कुछ भी नहीं है. कुछ याचिकाओं में कहा गया है कि कोई असर नहीं पड़ा है और कुछ में बताया गया है कि फोन हैक हुआ है. लेकिन किसी ने आपराधिक मामला दर्ज करने की कोशिश नहीं की है.”

इस पर सिब्बल ने कहा कि हमें तो अभी पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट के एक रजिस्ट्रार और एक पूर्व जज का नंबर भी इनके निशाने पर था. CJI ने कहा कि हम मानते हैं कि यह गंभीर मसला है. लेकिन एडिटर्स गिल्ड को छोड़कर सारी याचिकाएं अखबारों की खबरों पर आधारित हैं. जांच का आदेश देने के लिए हमें कोई ठोस आधार नहीं दिख रहा है. उन्होंने कहा कि-

“जिन लोगों ने याचिका दायर की है, उन्हें ज्यादा जानकार और संसाधन संपन्न होना चाहिए. उन्हें तथ्यों को सामने रखने में और ज्यादा मेहनत करनी चाहिए.”

खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में विदेशी कंपनियां भी शामिल हैं. यह एक जटिल मसला है. वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने कहा कि IT एक्ट की धारा 43 के तहत हम मुआवजा मांग सकते हैं, लेकिन बिना जांच के कैसे पता चलेगा कि इसका ज़िम्मेदार कौन है. टेलीग्राफ एक्ट के तहत सीमित दायरे में ही मामला दर्ज किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस मामले में विशेष जांच की जरूरत है. अभी तो सिर्फ 300 लोगों के नाम सामने आए है. ये 3 हज़ार या 10 हज़ार भी हो सकते हैं.

कोर्ट ने जारी नहीं किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस तो जारी नहीं किया, लेकिन याचिका की कॉपी केंद्र सरकार के लॉ ऑफिसर को सौंपने को कहा ताकि 10 अगस्त को अगली सुनवाई पर आ सकें. बता दें कि वकील एमएल शर्मा की ओर से दाखिल याचिका में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को भी पार्टी बनाया गया है. सुनवाई के दौरान एमएल शर्मा ने याचिका से नाम हटाने की अनुमति मांगी. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि आपका जो मन है, करिए.

जनहित याचिका दाखिल करने वाले एमएल शर्मा ने एक मौके पर कपिल सिब्बल को टोक दिया. इस पर CJI रमना ने कहा कि सिब्बल सीनियर वकील हैं, उन्हें अपनी बात रखने दी जाए. कोर्ट ने एमएल शर्मा की खिंचाई करते हुए कहा कि आपने एक दिन सीजेआई के पास शिकायत दर्ज कराई, और अगले ही दिन रिट दाखिल कर दी. आखिर हमारे रुख का इंतजार तो करते. CJI रमना ने शर्मा से कहा,

“आपकी याचिका में अखबारों की कटिंग के अलावा क्या डिटेल है? आप चाहते हैं कि सारी जांच हम करें और तथ्य जुटाएं. ये जनहित याचिका दाखिल करने का कोई तरीका नहीं है.”

Supreme Court (2)
पेगासस मामले पर सुनवाई करते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामला गंभीर है लेकिन ये भी कहा कि याचियों को तथ्य बेहतर तरीके से जुटाने चाहिए. (फाइल फोटो- PTI)

पेगासस का पूरा मामला

18 जुलाई को दुनिया के 17 अखबारों-पोर्टल्स पर खबर छपी, जिस पर भारत समेत दुनिया भर में बवाल मच गया. खबर ये कि इज़रायल में सर्विलांस का काम करने वाली निजी कंपनी के डेटाबेस में दुनिया के हज़ारों लोगों के मोबाइल नंबर मिले हैं. इज़रायल की इस कंपनी का नाम NSO ग्रुप है, और इसके जासूसी करने वाले स्पाईवेयर का नाम पेगासस है. पेगासस का तथाकथित डेटाबेस लीक हुआ, और ये सबसे पहले फ्रांस की नॉन प्रॉफिट मीडिया कंपनी- फॉरबिडन स्टोरीज़ और मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल को मिला. इन दोनों ने ये डेटा दुनिया के 17 मीडिया हाउसेज के साथ शेयर किया. इसमें द गार्डियन, वॉशिंगटन पोस्ट जैसे प्रतिष्ठित अखबार शामिल हैं. भारत से द वायर को ये डेटा मिला. इस डेटा की इन्वेस्टिगेशन को नाम दिया गया पेगासस प्रोजेक्ट. अब धीरे-धीरे उन लोगों के नाम सामने रहे हैं, जिनके नंबर कथित तौर पर लीक्ड डेटाबेस में हैं.

जिन भारतीयों का नंबर अब तक पेगासस के संभावित शिकारों की लिस्ट में बताया जाता है, उनमें 40 भारतीय पत्रकारों के अलावा राहुल गांधी और प्रशांत किशोर जैसे लोग भी हैं. सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों, बड़े बिजनेसमैन और मोदी सरकार के दो मंत्रियों के नाम भी इसमें सामने आए हैं. हालांकि खुलासा करने वाली कंपनी का कहना है कि लिस्ट में नाम होने का मतलब यह नहीं है कि सभी के फोन की जासूसी हुई. पेगासस को लेकर हंगामे के कारण संसद के मानसून सत्र में ठीक से कामकाज नहीं हो पा रहा है. रोज का कार्यवाही स्थगित हो रही है. गुरुवार को भी दोनों सदनों में सुचारू काम नहीं हो सका.


वीडियो – नेता नगरी: पेगासस स्पाईवेयर मामले में PM मोदी के खिलाफ कांग्रेस क्या गलती कर रही है?

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