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शहीदों की 7 कहानियां, एक कहानी मारने वाले नक्सली हिडमा की

सुकमा में जवानों की शहादत के बाद जो कहानियां सामने आई हैं वो रोंगटे खड़ी करती हैं. एक नाम भी आया है, जिसे इन मौतों का जिम्मेदार बताया जा रहा है. वो कहानियां भी सामने आई हैं, जो शहीद होने वाले जवान अपने पीछे छोड़ गए हैं.  कहा जा रहा है कि हिडमा नाम के इंसान ने जवानों पर हमले कराए थे. सुकमा अटैक पहला मौका नहीं है जब हिडमा का नाम आया है. इससे पहले वो 27 कांग्रेसी नेताओं को मरवाने के मामले भी मोस्ट वॉन्टेड है.

इस रिपोर्ट में जानिए शहीदों की कहानी और फिर हिडमा की कुंडली:

1. नरेश: ‘अगली छुट्टियों में करूंगा बेटी की शादी’

हरियाणा के सोनीपत के जैनपुर के रहने वाले एएसआई नरेश की जिंदगी आसान नहीं रही. परिवार की जिम्मेदारी को बचपन से ही अपने कंधों पर ले रखा था. दो भाई-तीन बहनों में सबसे बड़े थे. 8वीं क्लास में थे, तब से ही मजदूरी करनी शुरू कर दी थी. शाम को खान से ट्रक में रेत भरने और उतारने का काम करते थे. दिन में स्कूल जाते थे.

कोई डेढ़ महीने पहले ही छुट्टी लेकर घर आए और दो कमरों का घर बनाया. जमींदारों के यहां मजदूरी कर गेहूं की कटाई की और 7 अप्रैल को छुट्टी पूरी करके ड्यूटी पर चले गए. जब वो ड्यूटी पर जा रहे थे तो अपनी बीवी से उन्होंने कहा था, ‘जब अगली छुट्टियों में आऊंगा तो कोई अच्छा सा लड़का देखकर प्रीति (बेटी) की शादी कर देंगे. तब तक तुम सब लड़का देख लो. अगर कोई ठीक मिले तो मुझे फोन कर देना.’

नरेश की बेटी प्रीति के अलावा 2 बेटे प्रीतम और प्रिंस भी हैं, जो आठवीं और छठी क्लास में पढ़ते हैं. प्रीति फिलहाल 12वीं कक्षा में पढ़ रही है. नरेश के भाई वजीर का कहना है, ‘नरेश अक्सर कहता था कि उसकी तैनाती ऐसी जगह पर है, जहां हर रोज़ सुबह सभी साथियों से आखिरी राम-राम होती है. पता नहीं शाम को सभी जवान वापस लौटेंगे या नहीं.’

2. एक और नरेश: ‘बस एक साल और ड्यूटी थी वहां’

नरेश यादव बिहार के दरभंगा जिले के अहिला गांव के रहने वाले थे. नरेश यादव छुट्टी बिताने के बाद 10 जनवरी को सीआरपीएफ कैंप लौटे थे. जब वो छुट्टी में घर आए थे, तो उन्होंने मकान बनवाने का काम शुरू कराया था. पत्नी से आखिरी बात हमले से दो दिन पहले की थी. शहीद के पिता राम नारायण यादव सरकार ने बताया कि उनका इकलौता बेटा हमेशा कहता था कि जहां अभी ड्यूटी करते हैं, वो जगह काफी खतरनाक है. नरेश यादव का 2 साल का समय पूरा हो चुका था, बस एक साल और उनको वहां ड्यूटी करनी थी. इसी बीच ये हादसा हो गया.

3. राममेहर पिछले हमले में बाल-बाल बचे थे

हरियाणा के करनाल के गांव खेड़ी मानसिंह का जवान राममेहर. इनके पिता पूरन संधू का कहना है कि राममेहर को 1 मई को छुट्टी पर घर आना था. लेकिन बेटा नहीं आया, रात में उसकी मौत की खबर आई. राममेहर के पिता अपने बेटे की मौत के लिए सरकार को दोषी मानते हैं. उनका कहना है कि सरकार अपने जवानों को मरवा रही है, लेकिन उग्रवादियों के खिलाफ खुली कार्रवाई के आदेश नहीं देती है. पिछले महीने जब नक्सलियों ने हमला किया था तब वो कुछ ही दूरी पर थे. राममेहर उस काफिले से थोड़ी दूर थे, जिसमें 12 जवान शहीद हुए थे. अफ़सोस इस बार भाग्य ने साथ नहीं दिया और वो शहीद हो गए.

4. बन्ना राम ने वापस आने का वादा किया था

राजस्थान में नीमकथाना के गोवर्धनपुरा के रहने वाले थे कांस्टेबल बन्ना राम. डेढ़ महीने पहले वो भी छुट्टियां बिताकर ड्यूटी पर लौटे थे. घर वालों से वादा करके गए थे कि जल्दी ही वापस आएंगे. 1991 में फ़ौज में भर्ती हुए थे. जुलाई 2016 में उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ में हुई थी. इससे पहले वो अहमदाबाद में तैनात थे.

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5. बिहार के सासाराम के जवान कृष्ण कुमार पांडेय भी हमले में शहीद हो गए. भतीजी के विवाह में शामिल होने के लिए उनको 28 अप्रैल को घर लौटना था. उनके ही कंधे पर शादी की सारी ज़िम्मेदारी थी.

6. बिहार के ही अभय मिश्रा भोजपुर के रहने वाले थे. शहीद के पिता कहना है, ‘अभय अपने लोगों के साथ लड़ाई में शहीद हो गया, यही दुख का कारण है. यदि वह दूसरे देश के साथ लड़ाई में शहीद होता तो इतना ज्यादा दुख नहीं होता.’

7. बिहार में शेखपुरा के रहने वाले रणजीत कुमार ने 2 दिन पहले परिवार से फोन पर बात की थी. बताया था कि वो 28 मई को छुट्टी पर आएंगे. घर में रणजीत के शहीद होने की खबर सुनकर चीख- पुकार मच गई. शहीद की मां का रो- रोकर बुरा हाल था. जो भी उनको दिख रहा था, उससे बोल रही थीं कि ‘मेरा बेटा कहीं खो गया है, कोई उसे ढूंढ़ कर ला दे.’

नक्सलियों का सरदार मडवी हिडमा, जो जवानों को मार रहा है!

इंटेलिजेंस सोर्सेज के मुताबिक इस हमले का मास्टरमाइंड नक्सली कमांडर मडवी हिडमा है. मडवी हिडमा उर्फ हिडमन्ना की उम्र 25 साल है. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक हिडमा सुकमा के जंगरगुंडा इलाके के पलोडी गांव का रहने वाला है. इस इलाके में लोग उसे हिडमालु और संतोष के नाम से भी जानते हैं. इस कुख्यात नक्सली पर 25 लाख रुपये का इनाम है.

लाल घेरे में हिडमा.
लाल घेरे में हिडमा

हिडमा को गुरिल्ला लड़ाई में महारत हासिल है. यही वजह है कि उसे पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की बटालियन-1 का कमांडर बनाया गया है. इस बटालियन के तहत नक्सलियों की तीन यूनिट्स काम करती हैं. ये बटालियन सुकमा और बीजापुर में एक्टिव है. इसके अलावा हिडमा नक्सलवादी की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) का भी सदस्य है.

hidma 1इसने एक साथ 27 कांग्रेस नेताओं समेत 32 लोगों को मरवाया था

25 मई 2013 को जीरम घाटी में नक्सलवादी हमला हुआ था. इस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा समेत 32 लोग मारे गए थे. इनमें 27 कांग्रेसी थे. कहा जाता है कि इन सबको मरवाने वाला हिडमा ही था.

हिडमा लगातार खतरनाक साबित होता जा रहा है. उसने पिछले कुछ सालों में कई बड़ी वारदातों को अंजाम दिया है. 11 मार्च को ही सुकमा में नक्सलवादियों ने 12 जवानों को शहीद किया था. इस हमले का मास्टरमाइंड भी हिडमा ही था. सुकमा से कनाडा का एक सैलानी अगवा हुआ. खबर है कि उसे अगवा करने के पीछे भी हिडमा का ही हाथ है. 2010 में दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे. इस हमले को करवाने में भी उसी का खुफिया दिमाग था. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि वो फिलहाल बुर्कापाल और चिंतागुफा में एक्टिव है, लेकिन उसके ठिकाने की सही जानकारी किसी को नहीं है. ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा के नजदीक होने की वजह से वो नक्सली हमलों को अंजाम देने के बाद दूसरे राज्यों में जाकर छिप जाता है.

क्या इंटेलिजेंस में लापरवाही का फायदा उठाया नक्सलियों ने?

इस हमले में 300 से ज्यादा नक्सली आए. सवाल उठता है कि इतने नक्सली अचानक से कहां से आ गए? क्यों किसी को इस बारे में पता नहीं चला. जब वो जमा हो रहे होंगे तो सुरक्षा एजेंसियां चूक कैसे गईं. सवाल बहुत हो सकते हैं, लेकिन इन मौतों का ज़िम्मेदार कौन है?

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि सीआरपीएफ के सीनियर अफसरों ने नक्सली मूवमेंट या ऑपरेशन संबंधी किसी बात पर काफी टाइम से कोई बैठक नहीं की थी. ढाई महीने से डीजी और स्पेशल डीजी इंटेलिजेंस जैसे अहम पद खाली पड़े हुए हैं. ऐसे में ये सवाल उठने लाज़िमी हैं.


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