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इंजीनियर को लूट ट्रेन से फेंका, दोनों पैर कटे, रेलवे मदद के नाम पर मजाक कर रही

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केस नंबर 1 –

8 सितंबर 2019. लोकसभा अध्यक्ष और कोटा से सांसद ओम बिरला नई दिल्ली से कोटा जा रहे थे. इंदौर-नई दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस से. साथ में केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक भी थे. रात करीब 12 बजे पास के कोच में कुछ लड़के शोर मचाने लगे. बिरला ने अपने सहायक से कहा कि अटेंडेंट से कहो- लड़कों को शांत करवाएं. सोने का टाइम है ये. सहायक राघवेंद्र लड़कों के पास पहुंचे और शांत रहने को कहा तो लड़के उनसे उलझ पड़े. झगड़ा कर लिया. अब मामला स्पीकर और मंत्री जी का था तो रेलवे पुलिस एक्टिव हो गई. 1 बजके 10 मिनट पर ट्रेन मथुरा पहुंची तो पुलिस ने आरोपी 5 लड़कों को गिरफ्तार कर लिया. अब लड़के लगाएंगे कोर्ट कचहरी का चक्कर.

केस नंबर 2-

6 सितंबर 2019. ट्रेन यही इंदौर-नई दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस थी. स्पीकर साहब की लोकसभा के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर दीपक शुक्ला दिल्ली जा रहे थे. रिजर्वेशन नहीं था तो वो जनरल कोच में थे. सुबह करीब 6.30 बजे ट्रेन ओखला के पास पहुंची तो कुछ लुटेरे उसमें चढ़ गए. लूटपाट करने लगे. दीपक का मोबाइल छीनने की कोशिश की तो उन्होंने विरोध किया. लुटेरों ने उनको चलती ट्रेन से फेंक दिया. कुछ लोगों ने चेन पुलिंग कर तुरंत ट्रेन रोकी. मगर ट्रेन रुकने के बाद भी न जीआरपी, न आरपीएफ एस्कोर्टिंग न ट्रेन का गार्ड मौके पर आया. कुछ सह यात्रियों ने दीपक को ऑटो से अपोलो अस्पताल पहुंचाया. दीपक के दोनों पैर काटने पड़े हैं. घर वालों का कहना है कि न रेलवे की तरफ से कोई मदद मिली है न पुलिस की तरफ से.

कोटा के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान जाते-जाते बची.
कोटा के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान जाते-जाते बची.

ये तो आपने त्वरित ट्रीटमेंट देखा. वीआईपी और आम आदमी के साथ रेलवे का. आगे कहानी और भी वीभत्स है. मगर उससे पहले आपको दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अंश बताते हैं. ये रिपोर्ट इस घटना के बाद हुई थी. रिपोर्ट बताती है कि कोटा से गुजरने वाली 122 ट्रेनों में से केवल 45 में एस्कोर्टिंग होती है. कोटा तो खैर छोटा सैंपल है. ये सिक्योरिटी कितनी कमजोर है वो एक आरटीआई के जवाब में मिले आंकड़ें बताते हैं. 2017 में रेलवे में चोरी के 33,044 मामले दर्ज हुए. 2016 में इस तरह के करीब 22 हजार मामले थे. माने ये चोरी के मामले घटने की बजाए बढ़े. बुलेट ट्रेन लाएंगे, स्टेशन को मॉल बना देंगे जैसे वादे ऐसे आकंड़े देखकर बेइमानी लगते हैं. कुल हासिल ये है कि रेलगाड़ी में जाइये तो सुरक्षा आप भरोसे या राम भरोसे है.

सॉफ्टवेयर इंजीनियर दीपक फिलहाल दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती हैं. उन्होंने बताया कि हादसे के बाद उन्होंने पास खड़े रेलवे के कर्मचारियों से मदद मांगी. मगर वो बोले- ये हमारा काम नहीं. पुलिस वाले आएंगे तो मदद मिलेगी. सह यात्रियों ने उनको अस्पताल नहीं पहुंचाया होता तो उनकी वहीं जान चली जाती. दीपक की मौके पर कोई मदद नहीं करने के बाद रेलवे आगे भी उनको कोई मदद नहीं दे रहा है. रेलवे के कुछ अधिकारी उनसे मिले. मगर सिर्फ मिले ही. किसी मदद की बात नहीं की. बस ट्रेन का टिकट लेकर चले गए हैं.

‘अपोलो बिल पर बिल बना रहा’

दीपक के भाई मनमोहन शुक्ला ने हमें बताया कि अब उनको अपोलो अस्पताल प्रशासन की तरफ से परेशान किया जा रहा है. दीपक को फर्स्ट एड मिल जाने के बाद उन्होंने अपोलो वालों से दीपक को एम्स रेफर करने के लिए कहा. मगर ये नहीं किया गया. फिर शाम से ही दो लाख रुपये की मांग की जाने लगी. उनका कहना है कि एम्स में बिना रेफरल लेटर के इलाज नहीं होगा. पर अपोलो वाले ऐसा नहीं कर रहे हैं. इलाज में अब तक 5-6 लाख रुपये लग चुके हैं. परिवार के लिए आगे इस खर्चे को उठाना मुश्किल होता जा रहा है. और अस्पताल बिल पर बिल बना रहा है.

कोटा में दीपक की मदद के लिए समाजसेवी संस्थाओं ने किया प्रदर्शन.
कोटा में दीपक की मदद के लिए समाजसेवी संस्थाओं ने किया प्रदर्शन.

इस घटना को लेकर कोटा के लोगों में भी काफी नाराजगी है. 11 सितंबर को कोटा में परिवार की मदद के लिए मंडल रेल प्रबंधक के कार्यालय पर प्रदर्शन किया है. परिवार की आर्थिक मदद और नौकरी देने की मांग की है. दीपक के पिता का कहना है कि उनका सारा पैसा इलाज में चला गया. दीपक का चार साल का बच्चा है. पत्नी है. आगे पूरी जिंदगी है. मदद नहीं मिली तो उनका परिवार कैसे गुजारा करेगा, ये वो खुद भी नहीं जानते.

सरकार चूंकि भारतीय रेलवे में तमाम सुधारों का दावा कर रही है. प्राइवेटाइजेशन कर तमाम स्टेशनों को मॉल बनाने की बात कर रही है. तेज रफ्तार ट्रेनों का वादा किया जा रहा है. ये सब अच्छा है. होना चाहिए. मगर सबसे जरूरी है एक यात्री का उसकी मंजिल तक पहुंच जाना. सही-सलामत. अगर वो नहीं हो पाया. दीपक की तरह लोग शिकार होते रहे. तो सारे बदलाव बेकार हैं.


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