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जब भारत से लगे पाकिस्तान में नारा लगा - 'हम क्या चाहते, आज़ादी'

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पाकिस्तान की हर बात में कश्मीर है. सोते-जागते. उठते-बैठते. बस कश्मीर का जिक्र. कश्मीर भी पूरा नहीं. वो हिस्सा, जो भारत के पास है. क्या पाकिस्तान के मंत्री, क्या नेता, क्या सेना और क्या आतंकवादी. सब कश्मीर-कश्मीर जपते हैं. भारत कश्मीरियों पर जुल्म कर रहा है. कश्मीरी भारत से अलग होना चाहते हैं. कश्मीर को आजादी दो. तमाम बातें. मगर पाकिस्तान को अपने गिरेबां में झांकने की फुर्सत नहीं. वरना वो देख लेता कि उसके कई हिस्से उससे अलग होने के लिए लड़ रहे हैं. पाकिस्तान में एक प्रांत है. सिंध. वो भी पिछले कई दशकों से आजाद होने का जतन कर रहा है. 3 जुलाई को भी वहां एक रैली हुई. सैकड़ों लोग शामिल हुए उसमें. एक ‘जय सिंध क्यूमी महाज पार्टी’ है वहां. उसने ये रैली आयोजित की थी. लोगों ने नारे लगाए-

हम क्या चाहते, आजादी.

पाकिस्तानी मीडिया ऐसी रैलियों का जिक्र नहीं करता
जब ये नारे कश्मीर में लगते हैं, तब पाकिस्तान खुश होता है. हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसे उठाने का जतन करता है. मगर जब उसके यहां ऐसे नारे लगते हैं, तो पाकिस्तानी मीडिया इसे पूरी तरह से ब्लैक आउट कर देता है. हमारे यहां भी आपको मीडिया के अंदर सिलेक्टिव अप्रोच दिखेगा. कुछ खास मुद्दों की खबर न करना. या करना भी, तो एक खास तरीके से करना. मगर फिर भी भारत में ऐसा कभी नहीं होता कि पूरी मीडिया ही मुद्दा दबा दे. पूरी तरह ब्लैकआउट कर दे.

सिंध में ये प्रोटेस्ट ऐसे वक्त में हुआ, जब पाकिस्तान में आम चुनाव होने वाले हैं. सुरक्षा के इंतजाम तगड़े हैं. पाकिस्तान अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है. ऐसे में इतनी तादाद में लोगों का बाहर निकलना मायने रखता है. क्योंकि उन्हें शांति से भी विरोध जताने का हक नहीं है. विरोध प्रदर्शन निकालने की इजाजत नहीं है. शांति से अपनी बात कहने पर भी उन्हें निशाना बनाया जाता है. पुलिस जब पीटने पर आती है, तो आदमी-औरत का फर्क नहीं करती. कराची में गुमशुदा सिंधियों के परिवारों का एक शिविर है. वहां पुलिस ने प्रदर्शन कर रही औरतों पर खूब जोर दिखाया. उनके कपड़े फाड़े. उन्हें सड़कों पर घसीटा. मारा. फिर भी ये लोग डरकर घर नहीं बैठे हैं. आबादी संघर्ष कर रही है. अपने हजारों गुमशुदा साथियों के लिए लड़ रही है. उन इलाकों में अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी मुश्किल ही पहुंच पाती है. इस मामले में सोशल मीडिया को शुक्रिया कहना होगा. क्योंकि उसकी वजह से दुनिया कुछ हद तक वहां के हालात जान पाती है. इसीलिए इस खबर में हमने ढेर सारे ट्वीट्स लगाए हैं.

ये रैलियां सबूत हैं, कि पाकिस्तान बनने की नींव ही गलत थी
पाकिस्तान एक खयाल था. इसकी नींव थी धर्म. इस खयाल को साकार करने वालों का कहना था. कि हिंदू और मुसलमान, दोनों साथ नहीं रह सकते. कि उनके हित अलग-अलग हैं. कि हिंदुस्तान में बस हिंदुओं का भविष्य है. यहां मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होगी. अंग्रेजी में इसे नाम दिया गया- टू स्टेट थिअरी. इस पर यकीन करने वालों ने देश बांट लिया. अलग हो गए. मगर उन्होंने जो सोचा था, वैसा हुआ नहीं. इस्लाम उन्हें आपस में मुल्क की तरह नहीं जोड़ पाया. इसीलिए पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्से उससे अलग होकर जीना चाहते हैं. अलग होने की मांग करने वाले इन लोगों ने खुद को कभी पाकिस्तानी नहीं माना. वो या तो बलूच रहे. या पश्तून. या फिर सिंधी. बांग्लादेश तो अलग होने में कामयाब भी हो गया. उनके लिए उनकी संस्कृति पहले थी, मुसलमान होने की पहचान बाद में.

कहां है सिंध? क्या है सिंध?
बहुत साल पहले की बात है. तब दुनिया ऐसे अदृश्य लकीरों में नहीं बंटी थी. तब एक देश से दूसरे देश जाने के लिए वीज़ा नहीं लगता था. ये तब की बात है, जिसका जिक्र करके हम कहते हैं कि भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था. तब लोग महीनों तक पैदल-पैदल चलकर यात्रा किया करते थे. तब कोई यात्री हिंदूकुश पार करके जब इस ओर आता, तब उत्तर से पश्चिम जाती एक नदी नजर आती. इसका नाम था- सिंधु. जिसका जिक्र ऋग्वेद में भी है. ये जो पश्तो, फारसी, कुर्दिश, जजाकी जैसी भाषाएं हैं, इनकी बूढ़ी अम्मा इस्तेमाल में थीं तब. उनको कहते थे प्रोटो-ईरानिक भाषाएं. उसमें ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ हुआ करता था. मतलब वहां सिंधु हो गई हिंदू. और हिंदू के पार बसी जगह हिंदुस्तान. ईरान को पार करके ये नाम पहुंचा ग्रीक. वो कहने लगे- इंडोस. रोम वालों ने सुना, तो वो कहने लगे इंडस. इंडस के पार बसे लोग हो गए ‘पीपल ऑफ द इंडस’. यानी, इंडिका. इंडिया. जिस नदी के नाम से हमारी पहचान जुड़ी है, उसके इलाके को ‘सिंध’ कहते हैं.

पाकिस्तान में आम चुनाव होने वाले हैं. देश में सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं. ऐसी रैलियां निकालना वहां बहुत मुश्किल है. बहुत जोखिम है इसमें. फिर भी लोग सड़कों पर उतरे (फोटो: The Lallantop)
पाकिस्तान में आम चुनाव होने वाले हैं. देश में सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं. ऐसी रैलियां निकालना वहां बहुत मुश्किल है. बहुत जोखिम है इसमें. फिर भी लोग सड़कों पर उतरे (फोटो: The Lallantop)

आजादी की ये मांग कब शुरू हुई?
1947 में आजादी मिली. बंटवारा हुआ. बंटवारे के बाद ये जगह पाकिस्तान में चली गई. पाकिस्तान के चार प्रांतों में से एक बन गया. हिंदुस्तान में आपको ढेर सारी सिंधी कॉलोनियां दिखेंगी. बंटवारे के समय ढेर सारे सिंधी बचकर हिंदुस्तान आ गए थे. फिर क्या हुआ कि भारत से भागकर गए ढेर सारे मुसलमानों (जिनको वहां मुहाज़िर कहते हैं) को यहां जगह मिल गई. इससे सिंध की आबादी का बैलेंस बिगड़ गया. वहां के मूल बाशिंदे कम हो गए. मूल सिंधियों ने पाकिस्तान को कभी दिल से नहीं अपनाया. वो मांग करते हैं ‘सिंधुदेश’ की. अलग सिंध देश. जो पाकिस्तान से अलग हो. आजाद हो. इसकी शुरुआत हुई 1967 में. जब पाकिस्तान सरकार ने उनके ऊपर उर्दू को थोप दिया. वहां से फिर जो संघर्ष चला, उसने धीरे-धीरे राष्ट्रवाद का चेहरा ले लिया. मतलब, उनके लिए सिंध कोई प्रांत नहीं था. उनकी पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा था. उनका मुल्क था. फिर चाहे वो सिंधी मुसलमान हो. कि सिंधी हिंदू. इनकी लड़ाई वैसी ही है, जैसी बलूचिस्तान के लोगों की है. जिन्हें लगता है कि पाकिस्तान में उनकी पहचान सुरक्षित नहीं है. कि पाकिस्तान उन्हें बस उनके प्राकृतिक संसाधनों के लिए इस्तेमाल करता है. पाकिस्तान के सिस्टम में उनकी वो जगह नहीं, जिसके वो हकदार हैं. ये शिकायत भी है कि पाकिस्तान में उन्हें इंसान नहीं समझा जाता. उनका दमन होता है. न उनकी कोई सुनता है, न उनकी कोई कहता है.

सालों से पाकिस्तान इन्हें कुचलने में लगा है
ये बात सही भी है. सिंध प्रांत को पाकिस्तान में अनाज की टोकरी कहते हैं. ये जगह न हो, तो पाकिस्तान को पानी के लाले पड़ जाएंगे. फिर भी पाकिस्तान में दबदबा है पंजाब का. न केवल राजनीति में, बल्कि नौकरशाही में भी. हर जगह. एक भुट्टो परिवार अपवाद है. भुट्टो सिंध के हैं. इस परिवार ने पाकिस्तान को दो प्रधानमंत्री दिए हैं. इनका दामाद पाकिस्तान का राष्ट्रपति बना. यही वजह है कि जुल्फिकार अली भुट्टो के आगे आने के बाद सिंध में चल रही आजादी की मांग कम हुई. लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि आजादी की ये मांग कभी पूरी तरह खत्म हुई हो. ये मूवमेंट बार-बार सिर उठाता रहा.

पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना. वहां भी ये संस्कृति का फर्क हावी था.
पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना. वहां भी ये संस्कृति का फर्क हावी था. पाकिस्तानी हुकूमत के हाथों उपेक्षित होने और सताये जाने की शिकायत अलग थी. ऐसा ही सिंध में भी है (फोटो: The Lallantop)

पाकिस्तान के पास बस पंजाब बचेगा!
यहां के लोग पाकिस्तान पर इल्जाम लगाते हैं. कि उनकी आवाज दबाने के लिए पाकिस्तानी हुकूमत उनके ऊपर जोर डालती है. सेना उनके ऊपर जुल्म करती है. उनके मानवाधिकारों का कोई अता-पता नहीं. कोई कभी मार दिया जाता है. कभी रातोरात गायब करवा दिया जाता है. बिल्कुल वैसा ही पैटर्न, जैसा बलूचिस्तान में सालों से हो रहा है. इस सबके बावजूद ‘सिंधुदेश’ की मांग ने दम नहीं तोड़ा. पाकिस्तान ने ऐसी मांगों को कुचलने के लिए काफी संसाधन खर्च किए हैं. सेना, ISI. सालों से ये सब मिलकर इन्हें दबाने की कोशिश में जुटे हैं. पाकिस्तान में ये हाल है कि अगर वहां इतनी आबादी पाकिस्तान से अलग होना चाहती है कि अगर वो अलग हो जाएं, तो पाकिस्तान शायद कुछ अदद किलोमीटर ही बचा रह जाएगा. बलूच अलग होना चाहते हैं. पश्तून अलग होना चाहते हैं. सिंधी अलग होना चाहते हैं. गिलगिल-बाल्टिस्तान वाले अलग होना चाहते हैं. खैबर-पख्तूनख्वा अलग जाना चाहता है. ये सब चले गए, तो बचेगा क्या फिर पाकिस्तान के पास?


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