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नेपाल की राष्ट्रपति ने क्या किया जो सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ गया?

आज एक हाइपोथिसिस से शुरुआत करते हैं. मान लीजिए कि एक्स वाई ज़ेड नाम का एक लोकतांत्रिक देश है. इस देश में सर्वोच्च पद राष्ट्रपति का है. उनसे अपेक्षा है कि वो संविधान मुताबिक आचरण करते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. लेकिन अगर राष्ट्रपति निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करने की जगह संविधान से ही बेईमानी करने लगें, तो? वो अपने निजी और राजनैतिक हितों के लिए पद की गरिमा मिटा दें, तो? ऐसा हो, तो क्या होना चाहिए? राष्ट्रपति को मनमानी की खुली छूट दे देनी चाहिए. या फिर किसी और पावर सेंटर को सामने आकर चीजें ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए?

हमारे पड़ोसी देश नेपाल में फिलहाल यही स्थिति पैदा हो गई है. 12 जुलाई को यहां सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंडमार्क जज़मेंट दिया. अदालत ने अपने इस फ़ैसले में राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की नैतिक और संवैधानिक भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए. साथ ही, प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के साढ़े तीन साल लंबे कार्यकाल का भी पटाक्षेप कर दिया. कोर्ट ने कहा कि विपक्षी नेता शेर बहादुर देउबा को तत्काल प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाए.

देउबा नेपाली कांग्रेस के लीडर हैं. वो आज प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं. मगर वो इस पद पर बने रहेंगे कि नहीं, ये बड़ा सवाल है. इस पसोपेश की वजह है, नंबर्स. देउबा के शपथ लेने से पहले ही उनके गठबंधन में फूट पड़ गई है. ये पूरा मामला क्या है, विस्तार से बताते हैं.

कोइराला निवास की कहानी

इस कहानी की शुरुआत एक घर से करते हैं. नेपाल में एक ज़िला है, मोरंग. इसका मुख्यालय है, बिराटनगर. तराई में बसा ये शहर भारत से जुड़ी नेपाल की दक्षिण-पूर्वी सीमा के पास पड़ता है. भारत वाली साइड में जहां बिहार का अररिया ज़िला है, उसी के पार नेपाली साइड में बसा है, बिराटनगर. ये नेपाल के प्रदेश नंबर एक की राजधानी है. इसी बिराटनगर शहर में टीन की छत वाला एक दो मंजिला घर है. करीब 160 बरस पुराने इस घर को लोग पुकारते हैं, कोइराला निवास.

इस घर को जिन सज्जन ने बनाया था, उनका नाम था- कृष्ण प्रसाद कोइराला. ये 20वीं सदी के शुरुआत की बात है. उस वक़्त नेपाल के शासक थे, महाराजा चंद्र शमशेर राणा. आगे बढ़ने से पहले चंद्र शमशेर राणा का ब्रीफ़ परिचय जान लीजिए. वो नेपाल की राणा हुकूमत के चश्म-ओ-चिराग़ थे. इस राणा हुकूमत की नींव रखी थी, उनके पूर्वज जंग बहादुर ने.

जंग बहादुर सेना में जनरल थे. 1846 में उन्होंने शाह वंश का तख़्तापलट कर दिया. जंग बहादुर ने राणा की पदवी धारण कर ली. उन्होंने कहा कि वो नेपाल के प्रधानमंत्री हैं. जैसे राजा का बेटा राजा बनता है, उसी तरह उनके उत्तराधिकारी भी राणा कहलाएंगे और नेपाल के प्रधानमंत्री बनते जाएंगे. इस व्यवस्था के तहत शाह वंश के राजा केवल नाम के लिए गद्दी पर बैठते थे. असली सत्ता राणा के हाथ में होती थी.

कृष्ण प्रसाद कोइराला इस राणाशाही के विरोधी थे. उन्होंने इस व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए जन चेतना फैलानी शुरू की. ये ख़बर राणा चंद्र शमशेर तक भी पहुंची. राणा को बहुत गुस्सा आया. उसने कृष्ण प्रसाद कोइराला को देश निकाला दे दिया. कृष्ण बाबू अपने परिवार को साथ लेकर बिहार चले आए. यहां उनका मन गांधीवाद में रम गया. वो भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल हो गए.

कृष्ण प्रसाद कोइराला के पांच बेटे हुए- मातृका, बिश्वेश्वर, गिरिजा, केशव और तारिणी. इन्हें कहा जाता है, कोइराला फैमिली. नेपाल में लोकतंत्र लाने का श्रेय जिन लोगों को दिया जाता है, उसमें कोइराला फैमिली सबसे आगे है. इसी परिवार की अगुवाई में नेपाल को आज़ाद कराने की मुहिम शुरू हुई. इस संघर्ष के शुरुआती चैप्टर का नाम था- ऑल इंडिया नेपाली नैशनल कॉन्ग्रेस. ये एक पॉलिटिकल पार्टी थी. इसका गठन बनारस में हुआ था. गठन की तारीख़ थी- 31 अक्टूबर, 1946.

NNC का गठन

इस शुरुआती गठन के तीन महीने बाद 25 जनवरी, 1947 को कोलकाता के पास स्थित भवानीपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया. इसमें पार्टी के नाम से ‘ऑल इंडिया’ हटा दिया गया. अब पार्टी का नाम रह गया, नेपाली नैशनल कॉन्ग्रेस. शॉर्ट में इसे कहते थे, NNC. इस पार्टी के पहले कार्यकारी अध्यक्ष चुने गए, BP उर्फ़ बिश्वेश्वर कोइराला.

हमने आपको कोइराला फैमिली के बारे में बताया था न. उसी का हिस्सा थे BP. वो नेपाल की सबसे चर्चित, सबसे बड़ी राजनैतिक हस्तियों में गिने जाते हैं. लेकिन BP का योगदान केवल नेपाल के लिए नहीं है. उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सेदारी की. भारत की आज़ादी के लिए वो जेल भी गए. इसी संघर्ष ने उन्हें नेपाल में डेमोक्रैटिक मूवमेंट शुरू करने की प्रेरणा दी. BP ने सोचा कि अगर संघर्ष के रास्ते ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से हटाया जा सकता है. तो फिर नेपाल को भी राणाशाही से मुक्ति मिल सकती है.

BP ने भारत में जगह-जगह घूमकर नेपाली मूल के लोगों को एकजुट करना शुरू किया. एक ओर जहां BP भारत में रहकर नेपाल के लिए सपोर्ट जुटा रहे थे. वहीं उनके छोटे भाई गिरिजा प्रसाद कोइराला नेपाल जाकर वहां लोगों को लामबंद कर रहे थे. इन भाइयों ने मिलकर मार्च 1947 में अपने गृहनगर बिराटनगर के भीतर एक जूट मिल में मज़दूरों की हड़ताल करवाई. इस हड़ताल ने नेपाल में राणाशाही के खिलाफ़ एक बड़े संघर्ष को जन्म दिया.

इस संघर्ष का मकस़द था, नेपाली जनमानस में चेतना जगाना. राजनैतिक संघर्ष को व्यापक करने के लिए ज़रूरी था कि अलग-अलग राजनैतिक धड़े भी एकजुटता दिखाएं. ताकि छिटपुट लड़ने की जगह लोग संगठित होकर संघर्ष करें. इसी के तहत हुआ एक पॉलिटिकल मर्ज़र. हमने आपको 1947 में गठित हुई पार्टी ‘NNC’ के बारे में बताया था. इसके अलावा एक और पार्टी थी, NDC. पूरा नाम, नेपाल डेमोक्रैटिक कॉन्ग्रेस. अप्रैल 1950 में कलकत्ता में आयोजित एक सम्मेलन में NNC और NDC का विलय हो गया. इस मर्ज़र से बनी नई पार्टी का नाम था, नेपाली कॉन्ग्रेस. इस पार्टी का गठन नेपाल के ट्रॉन्सफ़ॉर्मेशन के इतिहास में एक बहुत अहम पड़ाव मानी जाती है.

इस बात को अब सात दशक बीत चुके हैं. इन सात दशकों में नेपाल कई बदलावों से गुज़रा. पहले राणाशाही थी. फिर कॉन्स्टिट्यूशनल मोनार्की की व्यवस्था आई. और अप्रैल 2008 में फाइनली नेपाल एक लोकतंत्र बन गया.

नेपाल में लोकतंत्र

ऐसा लगा कि अब नेपाल में राजनैतिक स्थिरता आएगी. जनता के हितों की सोचने वाली सरकार बनेगी. जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए राज रहेगा. मगर ऐसा हुआ नहीं. लोकतंत्र आने के बाद से ही नेपाल में राजनैतिक अस्थिरता हावी है. इसमें लोकतंत्र का दोष नहीं. दोष है, पार्टियों और नेताओं का. आपसी झगड़े और राजनैतिक हितों के चलते वो कभी किसी से हाथ मिलाते हैं. कभी किसी से हाथ झिटक लेते हैं. कभी गठबंधन से सरकार बनती है. कभी समर्थन वापसी से सरकार गिरती है. इस राजनैतिक खींच-तान के चलते नेपाल को ऐसा प्रधानमंत्री तक नहीं मिल पाया, जो अपना कार्यकाल पूरा कर सके.

अब सवाल उठता है कि हम ये इतिहास आज क्यों बता रहे हैं. इसकी वजह है, नेपाल का हालिया घटनाक्रम. वहां एकबार फिर नेपाली कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ है. नेपाली कॉन्ग्रेस के मुखिया शेर बहादुर देउबा 5वीं बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं.

इस हालिया डिवेलपमेंट की बात करने से पहले आपको बीते कुछ महीनों का घटनाक्रम समझना होगा. इस नई सरकार से पहले नेपाल के प्रधानमंत्री थे, के पी शर्मा ओली. ओली एक गठबंधन सरकार के मुखिया थे. इस सरकार में दो मुख्य पार्टियां थीं. पहली, ओली की पार्टी UML. इसका पूरा नाम है, यूनिफ़ाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट्स. गठबंधन की दूसरी पार्टी थी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल माओइस्ट सेंटर. इसके लीडर थे, पुष्‍प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड.

ये गठबंधन बना था 2017 में. इस गठबंधन के तहत दोनों पार्टियों ने अपना एक साझा फ्रंट बनाया. इसका नाम रखा गया- नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी. ओली और प्रचंड ने तय किया कि पांच साल के कार्यकाल को फ़िफ्टी-फ़िफ्टी बांटेंगे. शुरुआत के ढाई साल ओली और बाकी बचे ढाई साल प्रचंड रहेंगे प्रधानमंत्री.

ओली ने दी दगा?

मगर दो साल का कार्यकाल पूरा करते-करते ओली ने सत्ता साझा करने वाले करार से छिटकना शुरू किया. संकेत दिया कि वो प्रचंड को प्रधानमंत्री पद नहीं सौंपेंगे. इसके बाद से ही प्रचंड गुट के साथ उनका टकराव बढ़ता गया. ये टकराव 20 दिसंबर, 2020 को चरम पर पहुंचा. इस रोज़ ओली ने कैबिनेट की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई. इसमें उन्होंने संसद को भंग करने का प्रस्ताव दिया. राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने भी इस प्रस्ताव को अपनी मंज़ूरी दे दी.

जानकारों ने कहा कि ओली और राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी का ये कदम असंवैधानिक है. इस तर्क का क्या कारण है? 2015 के नेपाली संविधान में पांच साल के पार्लियामेंट की व्यवस्था है. कार्यकाल पूरा होने से पहले संसद भंग किए जाने का प्रावधान संविधान में है ही नहीं. बल्कि संविधान तो ये कहता है कि अगर चुनी हुई संसद का टर्म पूरा होने से पहले कोई सरकार गिर जाए, तो चुनाव करवाने की जगह उसी इलेक्टेड पार्लियामेंट के भीतर नई सरकार बनवाने की हर संभव कोशिश की जाए. इस लिहाज से देखें, तो राष्ट्रपति भंडारी ने अपने कर्तव्य का सही निर्वहन नहीं किया. उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करके ये सुनिश्चित किया कि किसी को भी सरकार बनाने का मौका न मिले.

विपक्षी दलों ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. फरवरी 2021 में कोर्ट का फ़ैसला आया. उसने भंग की गई संसद को वापस बहाल करने का आदेश दिया. ये फ़ैसला ओली के लिए बड़ा झटका था. उनके पास प्रधानमंत्री बने रहने लायक संख्या नहीं थी. विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ़ साझा मोर्चा बना लिया था. ओली को अपना बहुमत साबित करना था. 10 मई, 2021 को संसद के निचले सदन में वोटिंग हुई. कॉन्फ़िडेंस मोशन जीतने के लिए ओली को 275 सदस्यों के सदन में कम-से-कम 138 वोटों की दरकार थी. मगर उन्हें केवल 93 वोट ही मिल सके.

यानी नेपाल में बना राजनैतिक डेडलॉक सुलझ नहीं रहा था. इस बीच विपक्षी गठबंधन ने भी शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा पेश किया. इस धड़े का कहना था कि उनके पास 149 सांसदों का समर्थन है. इस बीच विपक्षी धड़े को काउंटर करने के लिए ओली ने भी दोबारा सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया. उन्होंने कहा कि उनके पास 153 सांसदों का समर्थन है.

जानकारों का आरोप था कि ओली के पास समर्थन नहीं है. वो बस विपक्ष का रास्ता रोकने के लिए दावा कर रहे हैं. इसी डेडलॉक के बीच 21 मई, 2021 की रात प्रधानमंत्री ओली ने राष्ट्रपति से हाउस ऑफ़ रेप्रेजेंटेटिव्स को भंग किए जाने की सिफ़ारिश की. साथ ही, जल्द चुनाव करवाने की भी अपील की. इस अनुशंसा पर अमल करते हुए 22 मई को राष्ट्रपति भंडारी ने फिर से संसद भंग कर दिया. पांच महीने में ये दूसरी बार था, जब भंडारी और ओली की जोड़ी ने संसद भंग करवाई हो. राष्ट्रपति ने ये ऐलान भी किया कि नवंबर 2021 में फिर से चुनाव करवाए जाएंगे.

राष्ट्रपति पर आरोप

राष्ट्रपति ने शेर बहादुर देउबा वाले गुट को सरकार बनाने का मौका देने से पहले ही संसद भंग कर दी थी. इस फ़ैसले की बहुत आलोचना हुई. जवाब में राष्ट्रपति ने कहा कि देउबा गुट के पास भी सरकार बनाने लायक संख्याबल नहीं था. इसीलिए उन्होंने संसद भंग करके चुनाव करवाने की राह बनाई है.

इसके खिलाफ़ विपक्षी दलों की ओर से एक साझा बयान आया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को चाहिए था कि वो शेर बहादुर देउबा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करतीं. बिना फ्लोर टेस्ट के राष्ट्रपति ने कैसे तय किया कि विपक्ष के पास ज़रूरी संख्या नहीं है. विपक्ष ने ये भी ऐलान किया कि वो ओली और भंडारी द्वारा लिए गए असंवैधानिक निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. विपक्ष के इस जॉइंट स्टेटमेंट पर नेपाली कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा, CPN-माओइस्ट सेंटर के प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड, CPM-UML के बाग़ी धड़े के नेता माधव कुमार नेपाल समेत कुछ और पार्टी प्रमुखों के दस्तख़त थे.

विपक्ष की इसी याचिका पर 12 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया. चीफ़ जस्टिस चोलेंद्र शमशेर राणा के नेतृत्व में गठित पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने संसद को वापस बहाल करने का आदेश दिया. साथ ही, ये भी कहा कि विपक्षी गुट के नेता शेर बहादुर देउबा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को लैंडमार्क जज़मेंट बताया जा रहा है. क्यों? क्योंकि इस फ़ैसले में नेपाली सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की व्याख्या और पावर डिविज़न से जुड़ी कई अहम टिप्पणियां की हैं. इसमें सबसे ज़रूरी पक्ष राष्ट्रपति की भूमिका से जुड़ा है. जब राष्ट्रपति भंडारी द्वारा संसद भंग किए जाने के खिलाफ़ याचिकाएं दायर हुईं, तो राष्ट्रपति ने कहा कि उनका पद सर्वोच्च है. उनके द्वारा लिए गए फ़ैसलों की समीक्षा का अधिकार न्यायपालिका के पास नहीं है. भंडारी की दलील थी कि कोर्ट द्वारा गठित संविधान पीठ राष्ट्रपति के फ़ैसलों को रिव्यू नहीं कर सकती. मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज़ कर दिया. कोर्ट ने कहा कि जब राष्ट्रपति संविधान का पालन न करें, तो उनके किए ग़लत को ठीक करने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा-

राष्ट्रपति द्वारा लिया गया फ़ैसला एक्ज़िक्यूटिव के अंतर्गत आता है. ऐसी स्थिति में अगर राष्ट्रपति के फ़ैसलों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखा गया, तो ये संविधान में वर्णित पावर, कंट्रोल और बैलेंस के सेपरेशन सिद्धांत पर हमला होगा.

कोर्ट ने साफ़ कहा कि राष्ट्रपति ने संविधान की ग़लत व्याख्या की. उन्होंने देउबा द्वारा पेश किए गए सरकार बनाने के दावे को खारिज़ करते हुए संवैधानिक व्यवस्था का पालन नहीं किया. अपने 167 पन्नों के निर्णय में बेंच ने ये भी कहा कि राष्ट्रपति की जिम्मेदारियां और उसकी अथॉरिटी क़ानून द्वारा स्पष्ट की गई है. राष्ट्रपति को उसी के मुताबिक अपना काम करना चाहिए. बेंच ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है. देश के बाकी लोगों का कर्तव्य है कि वो अदालत द्वारा पेश की गई व्याख्या को मानें. एक लाइन में समझें तो इस फ़ैसले का निचोड़ ये था कि राष्ट्रपति अपना काम करने में नाकाम रहीं. इसीलिए कोर्ट को दखलंदाज़ी करनी पड़ी.

पक्षपात का आरोप

कई जानकारों का कहना है कि कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद राष्ट्रपति भंडारी ने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है. उन्हें तत्काल इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. राष्ट्रपति भंडारी, ओली गुट का हिस्सा मानी जाती हैं. उनपर राष्ट्रपति पद की गरिमा भूलकर पक्षपात करने के आरोप लगातार लगते रहे हैं. इल्ज़ाम है कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन को दलगत राजनीति का अड्डा बना दिया है. राष्ट्रपति की मर्यादा भूलकर वो ओली के पक्ष में फैसले लेती हैं. सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा वरडिक्ट में इन आरोपों पर न्यायपालिका की मुहर लगती दिखती है.

बहरहाल, कोर्ट के आदेश के बाद 13 जुलाई को राष्ट्रपति भंडारी ने शेर बहादुर देउबा को नेपाल का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया है. अब देउबा को भी विश्वासमत हासिल करना होगा. क्या उनके पास पर्याप्त सपोर्ट है? जवाब है, नहीं. कुछ दिन पहले तक देउबा गठबंधन अच्छी स्थिति में दिख रहा था. उनकी सरकार बनवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी दलों ने जो याचिका डाली थी, उसमें कुल 146 सांसदों के दस्तख़त थे. इनमें 61 नेपाली कॉन्ग्रेस के, 49 कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल माओइस्ट सेंटर के, 23 माधव नेपाल गुट के, 12 उपेंद्र यादव-बाबूराम भट्टाराई वाली जनता समाजवादी पार्टी फ़ैक्शन के और एक राष्ट्रीय जनमोर्चा नेपाल के सांसद थे. कुल मिलाकर हुए 146.

मगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के कुछ ही घंटे पहले खेल बदल गया. विपक्षी गुट को माधव कुमार नेपाल के गुट ने बड़ा झटका दिया. माधव नेपाल ओली की ही पार्टी CPN-UML का हिस्सा थे. ओली के साथ विवाद बढ़ने पर माधव नेपाल के नेतृत्व में पार्टी के 23 लीडर्स अलग हो गए. उन्होंने अपना अलग गुट बना लिया. माधव नेपाल वाला गुट ओली के खिलाफ़ गठित विपक्षी गठबंधन का हिस्सा था. माधव नेपाल भी शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में नई सरकार गठित करने की मांग का समर्थन कर रहे थे. विपक्षी दलों ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका डाली, उसमें माधव नेपाल का गुट भी शामिल था.

लेकिन ओली किसी तरह माधव नेपाल के गुट को वापस साथ लाना चाहते थे. क्योंकि उन्हें एहसास था कि सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ़ फ़ैसला सुना सकता है. ऐसा होता, तो देउबा को सरकार बनाने का आमंत्रण मिलता. ओली चाहते थे कि देउबा खेमे में सेंधमारी करके उनके PM बनने का रास्ता ब्लॉक कर दिया जाए. इसीलिए उन्होंने 23 सांसदों वाले माधव नेपाल गुट के पास बातचीत का न्योता भिजवाया.

दोनों गुटों की तरफ से बातचीत के लिए 10 सदस्यों की एक टास्क फोर्स गठित हुई. 11 जुलाई की रात दोनों गुटों के बीच समझौता भी हो गया. इसके बाद माधव नेपाल वाले गुट ने कहा कि ओली के साथ उनका विवाद अब ख़त्म हो गया है. इसीलिए वो वापस ओली वाले धड़े से जुड़ रहे हैं. साथ ही, बीते दिनों में उन्होंने विपक्षी दलों के साथ जो गठबंधन बनाया था, उसे भी वो छोड़ रहे हैं. माधव नेपाल वाले धड़े के प्रवक्ता रघुजी पंटा ने मीडिया से कहा-

हमारा मतभेद ख़त्म हो गया है. दोनों धड़े वापस साथ आ गए हैं. अब हम शेर बहादुर देउबा वाले विपक्षी धड़े को अपना समर्थन नहीं देंगे.

माधव नेपाल वाले गुट की विदाई के बाद शेर बहादुर देउबा वाला गठबंधन अल्पमत में आ गया है. देउबा को एक महीने के भीतर संसद में विश्वासमत हासिल करना होगा. माधव नेपाल वाले गुट के बिना देउबा का कॉन्फ़िडेंस वोट जीतना बहुत मुश्किल है. ऐसे में संभावना है कि ओली एकबार फिर पिक्चर में वापस लौट सकते हैं. अभी सबकुछ गड्डमड्ड है. कुल मिलाकर, फिलहाल तो नेपाल में राजनैतिक स्थिरता की आस नज़र नहीं आ रही.


वीडियो- दुनियादारी: शेर बहादुर देउबा नेपाल के प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने रह पाएंगे?

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