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गायें भी 'टॉयलेट' में जाकर करेंगी सूसू-पॉटी, साइंटिस्टों को उम्मीद बंध गई है

बच्चे को पालने में सबसे जटिल काम है उसे पॉटी ट्रेनिंग (Potty Training) देना. किसी रिसर्च के हवाले से नहीं, अपने पर्सनल अनुभव से बता रहा हूं. अब जर्मनी के साइंटिस्ट एक नई थ्योरी लेकर आए हैं – अगर आप बच्चे को पॉटी ट्रेनिंग दे सकते हैं तो किसी को भी दे सकते हैं. जर्मनी में साइंटिस्ट तो इस थ्योरी को जानवरों पर आजमाने लग गए हैं. ये साइंटिस्ट गायों (Cows) को पॉटी ट्रेनिंग दे रहे हैं. आप पूछेंगे कि इतनी मशक्कत काहे हो रही है तो जान लीजिए कि ये सब मज़ाक में नहीं बल्कि पर्यावरण की रक्षा के लिए हो रहा है. आइए बताते हैं पूरा मामला.

क्यों दी जा रही है गायों को पॉटी ट्रेनिंग?

गायों की पॉटी ट्रेनिंग के पीछे पर्यावरण का एंगल है. असल में वैज्ञानिक लगातार इस बात की तरफ ध्यान दिलाते रहे हैं कि जानवरों के खुले स्थान पर पॉटी-सूसू करने से पर्यावरण में अमोनिया का स्तर बढ़ रहा है. वैज्ञानिकों ने ये भी पाया है कि कृषि दुनियाभर में अमोनिया उत्सर्जित करने का सबसे बड़ा स्रोत है. इसमें भी पशुपालन लगभग आधे का भागीदार है. मतलब जितना भी अमोनिया उत्सर्जन होता है, उसमें से आधा खेती के लिए जरूरी जानवरों के सूसू-पॉटी से होता है. इंसान कृषि कार्यों के लिए जिन पशुओं को पालता है, वो औसतन हर रोज 29 से 40 किलो तक पॉटी और 30 लीटर तक सूसू करते हैं. वो ऐसा जहां भी मन चाहे, वहां कर देते हैं. इसकी वजह की आबोहबा गड़बड़ा रही है. ऐसा वैज्ञानिकों का तर्क है.

गायों से निकली अमोनिया सीधे तो पर्यावरण पर बुरा असर नहीं डालती लेकिन जब ये धरती से मिल जाती है तो नुकसानदायक बन जाती है. गायों की सूसू-पॉटी जब धरती पर गिरती है तो उसमें मौजूद अमोनिया मिट्टी के साथ मिलकर नाइट्रस ऑक्साइड बनाती है. ये एक ग्रीनहाउस गैस है. इसकी वजह से धरती और पानी भी दूषित हो जाता है.

13 सितंबर को जर्नल करेंट बायॉलजीमें प्रकाशित एक स्टडी के लेखक जैन लैंगबाइन कहते हैं कि

“आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि जानवर अपना सूसू-पॉटी कंट्रोल करने की क्षमता नहीं रखते. लेकिन ऐसा नहीं है. क्यों नहीं जानवरों को पॉटी ट्रेनिंग दी जाए. जानवर काफी समझदार होते हैं और वो ये सब सीख सकते हैं.”

कैसे दी जा रही है ट्रेनिंग?

जर्मनी और न्यूजीलैंड के साइंटिस्ट मिलकर गायों और बछड़ों को पॉटी ट्रेनिंग देने का काम शुरू कर चुके हैं. इस ट्रेनिंग का नाम भी रखा गया है. इसे कहते हैं मूलू ट्रेनिंग (MooLoo training). अब इस ट्रेनिंग का सिस्टम भी समझ लीजिए. बछड़ों को एक खास तरह के बाड़े में बंद करके सूसू-पॉटी करवाई जाती है. जब भी वो इस बाड़े के अंदर सूसू या पॉटी करते हैं तो उन्हें इनाम के तौर पर मीठा मिक्सचर या जौ दिया जाता है.

इस स्टडी से जुड़े नील डिर्कसन ने सीएनएन को बताया कि

“जब बछड़े बाहर होते हैं और इनाम चाहते हैं तो इसके लिए बाड़े में जा सकते हैं. लेकिन जल्दी ही वो समझ गए कि इनाम सिर्फ सूसू करने पर ही मिलता है.”

वैज्ञानिकों ने इस बारे में भी जुगाड़ लगाया कि बछड़े उसी बाड़े में जाकर ज्यादा से ज्यादा सूसू-पॉटी करें जिसे उनके लिए टॉयलेट के तौर पर लगाया गया है. उन्होंने बछड़ों को बाड़े के बाहर सूसू-पॉटी करने पर सज़ा देने का सिस्टम भी बनाया है. उन्हें कोई हिंसक सज़ा नहीं दी जाती. बस एक ईयरफोन लगाकर अरुचिकर संगीत सुनाया जाता है. ये सिस्टम कुछ दिन सही चला, हालांकि फिर इसने भी काम करना बंद कर दिया. फिर काम में आया देसी तरीका. गायों का सबसे ज्यादा मूड पानी डालने पर होता है. वैज्ञानिकों ने बात न मानने पर बछड़ों के ऊपर एक डब्बा पानी डालना शुरू किया गया. ये तरीका काम कर रहा है.

बछड़ों को हर रोज़ 45 मिनट ट्रेनिंग दी जाती है. कमाल की बात ये है कि 10 दिनों की ट्रेनिंग में कुल 16 में से 11 बछड़े पास हो गए हैं. मतलब 11 ऐसे बछड़े हैं, जो सूसू और पॉटी आने पर तय जगह पर जाकर निस्तारण करते हैं.

फिलहाल इस रिजल्ट के आधार पर वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि बछड़ों की पॉटी ट्रेनिंग परफॉर्मेंस बच्चों को दी गई पॉटी ट्रेनिंग जितनी ही कारगर है. इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उम्मीद बांध ली है. स्टडी टीम का हिस्सा लैंगबेन कहते हैं कि बछड़ों की पॉटी ट्रेनिंग से मिले नतीजों के आधार पर कहा जा सकता है कि कुछ सालों में सभी गायें टॉयलेट जाया करेंगी.


वीडियो – गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या बड़ा सुझाव दिया?

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