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चाचा शिवपाल ने बनाई नई पार्टी ससेमो

शिवपाल यादव ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा नाम से अलग पार्टी बनाई है.

बात 1999 की है. एक नौजवान कन्नौज सीट से अपना नामांकन दाखिल करने जा रहा था. अब तक पिता के नाम के अलावा उसकी कोई पहचान नहीं थी. यह सीट भी उसके पिता ने ही खाली की थी. पार्टी का नाम था समाजवादी पार्टी और नौजवान था अखिलेश यादव. मुलायम को पता था कि पत्रकार क्या सवाल दागेंगे? हुआ भी वैसा ही. सवाल आया, “सपा परिवारवाद के खिलाफ खड़ी हुई पार्टी थी, फिर ये क्या है?”

 

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जवाब अखिलेश को देना था, लेकिन दिया उनके बगल में खड़े एक शख्स ने. इलाहाबाद विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यक्ष जिसने ‘छोटे लोहिया’ की उपाधि कमाई थी. नाम था जनेश्वर मिश्र और जवाब था, “ये सत्ता नहीं, संघर्ष का वंशवाद है.” अब जनेश्वर मिश्र नहीं रहे. सपा परिवारवाद के झगड़े की निर्णायक जंग लड़ रही है.

 

 

तो आखिर वो हो ही गया, जिसकी अटकलें लंबे समय से लगाई जा रही थीं. समाजवादी परिवार में आखिरी बंटवारा होने का ऐलान हो गया है. चाचा शिवपाल तय कर चुके हैं कि अखिलेश के साथ अब उनकी नहीं निभेगी. इस अलगौझे में तय हुआ है कि चाचा अब नई पार्टी बनाएंगे. नाम रखा है समाजवादी सेक्युलर मोर्चा. शिवपाल का कहना है कि बड़े भाई मुलायम अगर चाहें तो इस नई पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकते हैं.

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2010 में अमर सिंह की विदाई से ये कयास लगाए जा रहे थे कि शायद परिवार का एका फिर से कायम हो जाए. 2016 में अमर सिंह अपनी वापसी के साथ पुरानी कलह को साथ लेकर आए. अमर सिंह की वजह से उठे बवाल के बाद सपा दो हिस्सों में बंट गई. एक धड़ा अखिलेश और रामगोपाल का और दूसरा धड़ा शिवपाल का.

 

 

2010 में अमर सिंह के सपा से दूर होने के बाद रामगोपाल लुटियंस दिल्ली में सपा का चेहरा बन गए. 70 साल के ‘प्रोफेसर साहब’ रामगोपाल और अमर के बीच दिल्ली में सपा का मैनेजर बनने की लड़ाई थी. अमर की तरह रामगोपाल के पास भी जनसमर्थन नहीं है. खेमे कई खड़े हो गई और संतुलन बहुत मुश्किल.

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यूपी में शिवपाल का वही कद है, जो दिल्ली में रामगोपाल का है. 15 सितंबर 2016 को शिवपाल ने अपने बेटे के साथ पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा भी दिया, जो स्वीकार नहीं हुआ. शिवपाल पार्टी के कार्यकर्ताओं और सपा के नेताओं पर दबाव बनाकर, उन पर अपनी मजबूत पकड़ के साथ परंपरागत राजनीति में विश्वास रखते हैं, जबकि अखिलेश समाजवादी पार्टी को 2.0 वर्जन में अपडेट करना चाहते हैं. शिवपाल की राजनीति में अमर सिंह फिट बैठते हैं, लेकिन अखिलेश के विजन में उनकी कोई जगह नहीं. सपा उसी अंतर से परेशान है जो सरसों के तेल और जॉनसन के लोशन में है.

 

 

सामाजिक न्याय और पिछड़ों की राजनीति की बुनियाद पर खड़ी सपा में यह अंतर्कलह क्या अपने अंजाम तक पहुंच गई है? या फिर हिंदी फिल्मों की तरह ही अभी कोई खुशनुमा अंत आना अभी बाकी है? फिलहाल तो इसके आसार काम ही दिख रहे हैं.

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