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सरकारी स्कूलों में बने टॉयलेट को लेकर कैग ने अपनी रिपोर्ट में क्या भांडा फोड़ा है?

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग (CAG). इसकी एक रिपोर्ट संसद में पेश की गई है. इसमें कहा गया है कि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSE) की ओर से सरकारी स्कूलों में 1 लाख 40 हजार टॉयलेट का निर्माण किया गया. लेकिन सीएजी ने ऑडिट में पाया कि इनमें से 40 प्रतिशत टॉयलेट या तो ‘गायब’ हैं या उनका निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है या किसी वजह से इस्तेमाल में नहीं लाए जाते.

बुधवार, 23 सितंबर को संसद में पेश एक ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने कहा कि 70% से अधिक टॉयलेट में पानी की सुविधा नहीं है, जबकि 75% टॉयलेट में साफ-सफाई नहीं है.

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSE) को दी गई थी जिम्मेदारी

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सितंबर, 2014 में ‘स्वच्छ विद्यालय अभियान’ शुरू किया था, ताकि शिक्षा अधिकार अधिनियम की अनिवार्यता को पूरा किया जा सके. मंत्रालय ने सभी स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट को अनिवार्य बना दिया था. लेकिन फंड की कमी, खराब रख-रखाव और शौचालयों में पानी की खराब उपलब्धता को बड़ी चुनौतियों के रूप में पहचाना गया. केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSE) को एक साल की अवधि में इस अंतर को पाटने के लिए कहा गया.

देश में 10.8 लाख सरकारी स्कूल हैं. 53 सीपीएसई की ओर से कुल मिलाकर 1 लाख 40 हजार से अधिक टॉयलेट का निर्माण किया गया. इसमें बिजली, कोयला और तेल कंपनियों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा. कैग ऑडिट ने 15 राज्यों में इन कंपनियों द्वारा निर्मित 2,695 शौचालयों का फिजिकल सर्वे किया.

कैग की रिपोर्ट में क्या निकला?

# इस सर्वे से पता चला कि 200 टॉयलेट केवल कागजों पर ही बना दिए गए, जबकि 86 का आंशिक निर्माण किया गया.

# ऐसे 83 टॉयलेट मिले, जिनका निर्माण पहले ही किसी अन्य योजना में हो चुका था.

# 691 शौचालय पानी की कमी की वजह से यूज में नहीं थे. सफाई की कमी, टूट-फूट, शौचालयों के बंद होने और अन्य कारणों से उपयोग में नहीं थे. इस तरह लगभग 40% शौचालय गैर-मौजूद थे, आंशिक रूप से या पूरी तरह से यूज में नहीं थे.

# रिपोर्ट में कहा गया है कि 1,967 को-एड स्कूलों (जिसमें लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते हैं) में से 99 में टॉयलेट इस्तेमाल में नहीं थे. जबकि 436 स्कूलों में केवल एक ही टॉयलेट दोनों यूज कर रहे थे. 27 प्रतिशत स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट की सुविधा देने का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ.

# सर्वे में पाया गया कि 72% निर्मित शौचालयों में पानी की कोई सुविधा नहीं थी, जबकि 55% में हाथ धोने की कोई सुविधा नहीं थी. ऑडिटर ने यह भी देखा कि शौचालय के खराब निर्माण की वजह से भी वो इस्तेमाल में नहीं थे.

# हर दिन कम से कम एक बार टॉयलेट साफ करने का प्रावधान है, लेकिन 75 प्रतिशत टॉयलेट में इसका पालन नहीं किया गया. सर्वे में पाया गया कि 715 शौचालयों को साफ नहीं किया जा रहा है, जबकि 1,097 को महीने में एक बार, सप्ताह में दो बार साफ किया जा रहा है.

क्या था लक्ष्य

छात्रों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए प्रोजेक्ट में कहा गया था कि CPSE पानी की सुविधा के साथ स्कूलों में टॉयलेट का निर्माण करेंगी. हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध कराएंगी. साथ ही तीन से पांच साल तक CSR बजट से इसका रख-रखाव करेंगी. लेकिन इन बातों का खयाल नहीं रखा गया.


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