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लॉकडाउन : नीतीश कुमार ने बिहारी मज़दूरों को भूखा क्यों छोड़ दिया?

प्रशांत किशोर. चुनावी रणनीतिकार. कोरोनावायरस पर देश दुनिया की तैयारियों पर लल्लनटॉप ने उनसे बात की. उनकी राजनीतिक और चुनावी पहचान से अलग. बातचीत में प्रशांत किशोर ने क्या कहा. बातचीत में प्रशांत किशोर ने लॉकडाउन के फ़ैसले पर सवाल उठाए. कहा,

“लॉकडाउन से वायरस को ख़त्म नहीं कर सकते हैं. सोशल डिसटेंसिंग होगी. पुलिसिंग होगी. लेकिन जो इंफ़ेक्टेड है, वो घरों में बंद है. स्प्रेड रोकने में मदद मिलेगी. लेकिन वायरस ख़त्म नहीं होगा. बिना टेस्टिंग, आइसोलेशन, कांटैक्ट ट्रेसिंग और क्वॉरंटीन के लॉकडाउन बहुत मददगार साबित नहीं होगा. हमें ये क़दम उठाने होंगे.”

हॉटस्पॉट में टेस्टिंग की बात आई तो प्रशांत किशोर ने कहा,

“हॉटस्पॉट में अभी हम उनकी ही टेस्टिंग कर रहे हैं, जो ऑलरेडी बीमार हैं. उनसे मिलने वाले लोगों की ही टेस्टिंग हो रही है. रैंडम स्तर पर मास टेस्टिंग नहीं हो रही है. हमें बहुत पहले जाग जाना चाहिए था. ICMR रोज़ाना की जांच में ये बता रहा है कि कितने टेस्ट हुए. लेकिन ये नहीं बता रहा है कि भारत को अभी और टेस्ट करने की ज़रूरत है. या किट नहीं है.”

इसी मुद्दे पर आगे बात करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा,

“जितने केस दिख रहे हैं, उसे ही सच मान लेना सही नहीं है. ये कहना सही होगा कि जितने टेस्ट कर रहे हैं, उस हिसाब से इतने केस आए हैं. एकदम मुमकिन है कि सोसायटी में और भी एक्टिव केस हों, और हमें उनकी जानकारी नहीं है.”

बात बिहार की आयी. बात आयी हज़ारों की संख्या में घर लौटते मज़दूरों की. प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार की सरकार को आड़े हाथों लिया. कहा कि कौन-सी चुनी हुई राज्य सरकार अपने ही राज्य के नागरिकों को कहती है कि आप जहां हैं, वहीं रहिए. कोटा से छात्रों और रास्तों में फ़ंसे मज़दूरों को लाने के लिए बसों का इंतज़ाम करवाने के लिए यूपी सरकार के काम की सराहना की. और क्या कहा पीके ने,

“जिन-जिन राज्यों में बिहार के लोग फ़ंसे हुए हैं, नीतीश कुमार को उन राज्यों से उन्हें लाने के प्रयास करने चाहिए थे. लॉकडाउन का हवाला देकर आप उन्हें नहीं ला सके. लेकिन आप बिहार के किसी भी गांव, क़स्बे या शहर चले जाइए. कहीं भी 100 प्रतिशत लॉकडाउन का पालन नहीं हो रहा है. किसी भी जगह 50 प्रतिशत से ऊपर लॉकडाउन प्रभाव में नहीं है. और ऐसे में आप अपने राज्य के नागरिकों को लाने से मना कर रहे हैं. ये अजीब बात है.”

प्रशांत किशोर ने आगे कहा,

“मैंने कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की. किसी भी मुख्यमंत्री को नीतीश कुमार ने फ़ोन नहीं किया. अरे आप उन्हें ला नहीं सकते थे, तो कम से कम चार अधिकारियों को उन राज्यों में भेज देते. वे वहां पर उनके रहने-खाने की व्यवस्था देख लेते. आपने ऐसा तक नहीं किया.”

जब तमाम देशों के मॉडल की बात सामने आयी, तो प्रशांत किशोर ने कहा कि सभी देश अपने-अपने सामाजिक और आर्थिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए इस बीमारी से लड़ रहे हैं. कहा,

“पूरा विश्व लड़ रहा है. और लगभग हर संगठन अपने-अपने विचार और अपने तरीक़े लेकर सामने आ रहा है. ये बीमारी ऐसी है, जिसके बारे में किसी को अंदेशा नहीं था. कोई भविष्यवाणी नहीं थी. चीज़ें लम्बे समय तक अनियमित रहीं. नहीं पता लग सका कि कुछ भी क्यों और कैसे हो रहा है. फिर भी तमाम फलकों ने अपने स्तर पर प्रयास किए. और कर ही रहे हैं. सिंगापुर, साउथ कोरिया जैसे देशों ने बहुत हद तक मामलों को क़ाबू में किया है. लेकिन फिर वही बात आती है. कि सभी देश अपनी-अपनी स्थितियों के हिसाब से ही प्रयास कर रहे हैं. किसी एक देश का मॉडल आपको अच्छा लग सकता है, लेकिन वो आदर्श मॉडल नहीं हो सकता है.”

प्रशांत किशोर की लल्लनटॉप से बातचीत यहां देखिए :

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