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24 घंटों से महाराष्ट्र की सड़कों पर दूध बह रहा है, सरकार 'सोच' में है

महाराष्ट्र में किसानों को अपनी मेहनत सड़कों पर बहाते हुए 24 घंटे हो गए हैं. लेकिन कोई रास्ता न निकलते देख किसान क्रांति मोर्चा के तहत किसान आज भी हड़ताल पर हैं. किसान अपना दूध सड़कों पर बहा रहे हैं या मुफ्त में बांट रहे हैं. सब्ज़ियां भी फेंकी जा रही हैं जिसकी वजह से कई जगह किसानों और व्यापारियों की झड़प हुई. मंडियां आज भी नहीं खुली हैं. आंदोलन के केंद्र नासिक में कुछ जगह बलवे के चलते प्रशासन ने धारा 144 लगा दी है. नासिक के ही येवला में 1 जून को हड़ताल के पहले दिन बलवे के चलते पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी और कर्फ्यू लगा देना पड़ा था.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आंदोलन मराठवाड़ा से निकल कर विदर्भ के इलाकों में भी पहुंच गया है.

क्यों आंदोलन कर रहे हैं किसान?

लोन माफी पैकेज की अपनी मांग को लेकर 1 जून से पूरे महाराष्ट्र में पांच लाख किसान बेमियादी हड़ताल पर चले गए हैं. कृषि मंडियों में काम ठप रुक गया. महाराष्ट्र के शहरों को दूध के अलावा सब्ज़ियों की सप्लाई भी रोक दी गई. हड़ताल के डर से 30 जून को महाराष्ट्र की कई मंडियों में किसानों ने अपनी उपज आनन-फानन में बेचीं. सुबह जब दूध के ट्रक शहरों की ओर दूध लेकर बढ़े, उन्हें रोक कर दूध सड़कों पर बहा दिया गयाः

 

 

ये सब सुन कर लगता है कि किसान गुंडागर्दी पर उतर आए हैं. लेकिन किसान गुटों का कहना है कि वो अपनी मांगें मनवाने के लिए मजबूरी में ऐसा कर रहे हैं. उनकी मांगें कुछ इस तरह हैं:

#1. किसानों का कर्ज़ बिना शर्त माफ किया जाए. किसान चाहते हैं कि उनकी ज़मीन से जुड़े 7/12 दस्तावेज़ पर से सारी देनदारियां हटाई जाएं. 

#2. 60 साल से ऊपर के किसानों के लिए पेंशन स्कीम लाई जाए.

#3. दूध का दाम कम से कम 50 रुपए लीटर किया जाए.

#4. किसानों को बिना ब्याज़ कर्ज़ दिया जाए.

#5. किसानों के मुद्दों पर सलाह देने के लिए बनाई गई स्वामिनाथन कमिटी की सिफारिशें मान ली जाएं.

 

पूरे मामले की पड़ताल यहां देखें, सुनेंः

 

लोन माफी के लिए महाराष्ट्र के किसान पिछले दो सालों से मांग कर रहे हैं. लेकिन राज्य सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया. महाराष्ट्र के किसान देखते रहे और उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज़ माफ हो गया. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र दोनों में भाजपा की सरकार है (महाराष्ट्र की महायुति सरकार में भाजपा सीनियर पार्टी है).

 

भाजपा के देवेंद्र फडनवीस भाजपा-शिवसेना महायुति सरकार के मुख्यमंत्री हैं
भाजपा के देवेंद्र फडनवीस भाजपा-शिवसेना महायुति सरकार के मुख्यमंत्री हैं

तारीख पर तारीख

किसान अपनी मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. ताज़ा हड़ताल से पहले भी राज्य के किसानों का एक डेलिगेशन किसान क्रांति मोर्चा के बैनर तले 30 मई को मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से भी मिला था. लेकिन बात नहीं बनी. सरकारी अफसरों का कहना है कि पूरा कर्ज़ माफ करना सरकार के लिए फिलहाल संभव नहीं है. राज्य के किसान लंबे समय से अपने मुद्दों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. इसी साल मार्च में किसानों ने अपनी उपज मुंबई में महाराष्ट्र विधान सभा के बाहर बिखेर दी थी.

सड़क पर तूअर और प्याज़ बिखेरते किसान
सड़क पर तूअर और प्याज़ बिखेरते किसान

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहां किसानों पर लगातार मार पड़ी है. लगातार 2 साल पड़े सूखे ने किसानों को कर्ज़ में डुबो दिया था. कई किसानों ने आत्महत्या कर ली. किसान आत्महत्या में महाराष्ट्र सबसे ऊपर तक पहुंच गया. पिछले साल अच्छी बारिश हुई तो कुछ इलाकों में बाढ़ आ गई. इस साल पैदावार बंपर है तो माल का भाव नहीं मिल रहा. गन्ना, टमाटर, प्याज, तुअर, कपास – कोई फसल ऐसी नहीं है जिसमें किसान को भाव मिला हो. महाराष्ट्र में किसान बड़ी संख्या में क्लीनिकल डिप्रेशन से पीड़ित हैं. इस से जुड़ी एक रपट यहां क्लिक कर के पढ़ें.

क्या है किसान क्रांति मोर्चा?

किसान क्रांति मोर्चा कई किसान गुटों का एक गठबंधन है. 3 अप्रैल 2017 को इसकी बैठक अहमदनगर के पुणतांबा में हुई थी. इसमें 37 किसान संगठन शामिल हुए थे. इस मीटिंग में तय किया गया था कि किसानों की मांगें न मानी गईं तो महाराष्ट्र के बड़े शहरों को दूध और सब्ज़ियों की सप्लाई रोक दी जाए. मोर्चे का ज़ोर नासिक और अहमदनगर में ज़्यादा है. यही वो दो ज़िले हैं जहां से मुंबई को दूध और सब्ज़ी सप्लाई होती है.

मुंबई की सप्लाई रोकने पर ज़्यादा ज़ोर है ताकी राज्य सरकार पर दबाव बनाया जाए. इन दो ज़िलों के अलावा सतारा और कोल्हापुर में भी मोर्चे का असर है.

परेशान किसान नुकसान उठा कर  हालांकि इस तरह की खबरें भी हैं कि कई कोल्ड स्टोर मालिकों ने हड़ताल चलने तक किसानों का माल अपने यहां रखने की पेशकश की है.

ये हड़ताल नई तरह की राजनीति की शुरुआत है

यहां दिलचस्प ये है कि किसान क्रांति मोर्चे ने अब तक खुद को किसी भी राजनैतिक पार्टी से दूर रखा है. बावजूद इसके इस हड़ताल को काफी सहयोग मिला है. और इसीलिए हर पार्टी खुद को इनसे करीब दिखाने की कोशिश में हैं. शरद पवार अपने बयानों में आज के माहौल की तुलना उस वक्त से कर रहे हैं जब वो कृषि मंत्री थे. ये कुछ-कुछ उन मौन रैलियों जैसा है जो पिछले दिनों पूरे महाराष्ट्र में हुई थीं. मराठा गुटों ने इन रैलियों को नेताओं से दूर रखा था. सारे नेताओं को ‘बाहर से समर्थन’ देना पड़ा था.

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे. इस मामले में शिवसेना को कम नुकसान होगा
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे. शिवसेना को भाजपा पर हमला करने का मौका मिल गया है

यही इस बार भी हो रहा है. शिवसेना लोन माफी को लेकर अपनी ही गठबंधन सरकार के खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रही है. उनके नेता किसानों से मिल कर ‘शिवसंपर्क’ कर रहे हैं. इसी तरह की एक मीटिंग में एक ‘फर्ज़ी’ शिवसेना नेता किसानों से मिलने पहुंच गया था. पुणे के पिम्मपरी से शिवसेना के विधायक गौतम चाबुकस्वार ने अपनी जगह अपने हमशक्ल यशोधर फणसे को उस्मानाबाद में किसानों की एक सभा में भेज दिया था. तब उनकी बहुत भद्द पिटी थी. पूरा मामला यहां क्लिक  कर के पढ़ें.

किसान क्रांति मोर्चा किसी भी राजनैतिक पार्टी से दूर है, लेकिन मोटा-माटी उसकी गतिविधियों का नुकसान भाजपा को हो रहा है (शिवसेना को नहीं). इन रैलियों की पॉलिटिक्स पर ‘दी लल्लनटॉप’ ने सीपीआई नेता राजन क्षीरसागर से बात की. राजन बताते हैं,

”किसान क्रांति मोर्चा की ताकत इस बात से आती है कि उसमें छोटे किसानों के साथ बड़े किसान भी शामिल हैं. क्योंकि 2 सालों के सूखे में सबको नुकसान हुआ है. लेकिन इसका मराठा स्वाभिमान रैलियों जितना हो पाएगा कि नहीं, इसके लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा. लेकिन इतना तय है कि  बिना समझौते ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाएंगे, मामला बढ़ता ही जाएगा. आज किसानों की तकलीफ शहरों की सप्लाई रुकते ही सभी लोगों की तकलीफ बन जाएगी”

मराठा क्रांति मोर्चा की नागपुर में हुई मौन रैली
मराठा क्रांति मोर्चा की नागपुर में हुई मौन रैली

ये सब बताता है कि महाराष्ट्र में राजनैतिक दल ज़मीनी स्तर पर लगातार लोगों से दूर हो रहे हैं. लोग अब अपनी मांगों के लिए राजनैतिक पार्टियों के पार देखना चाहते हैं. ये जितना दिलचस्प है उतना ही खतरनाक भी है. लोगो का राजनैतिक पार्टियों से निराश हों तो लोकतंत्र को दीमक लग जाती है.

हालात बिगड़ भी सकते हैं

फिलहाल हड़ताल शांतिपूर्ण है. पुणे जैसे बड़े शहरों में दूध और सब्ज़ियों का कुछ स्टॉक मौजूद है. लेकिन हड़ताल खिंचने की सूरत में हालात बिगड़ सकते हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ ने पुणे ज़िला सहकारी दूध उत्पादक संघ के तहत चलने वाली कातरज डेरी के मैनेजर संजय कालेकर से बात की. संजय बताते हैं,

” पुणे शहर को सप्लाई होने वाला दूध आस-पास के गावों से आता है. किसान अपना दूध लेकर प्राइमरी डेरी सोसायटी पर पहुंचते हैं जहां से वो चिलिंग सेंटर भेजा जाता है. वहां से दूध एक ट्रक में भर कर शहर लाया जाता है. अब तक किसानों की ओर से दूध की सप्लाई रुकी नहीं है. लेकिन यदि ऐसा होता है तो हमारे पास का स्टॉक दो दिन बाद खत्म हो जाएगा और शहर को दूध नहीं भेजा जा सकेगा. ”

महाराष्ट्र विधानसभा की सीढियों पर 'किसानों की मांगों' को लेकर प्रदर्शन करते विपक्षी नेता (मार्च 2107)
महाराष्ट्र विधानसभा की सीढियों पर ‘किसानों की मांगों’ को लेकर प्रदर्शन करते विपक्षी नेता (मार्च 2107)

इसलिए बेहद ज़रूरी है कि इस मामले का निपटारा जल्द से जल्द हो. क्योंकि इस से दोतरफा नुकसान हैं. पहले से कर्ज़ के बोझ तले दबे किसानों की हालत और बिगड़ेगी जब उनकी उपज बाज़ार नहीं पहुंच पाएगी. साथ ही शहरों में दूध जैसे बेहद ज़रूरी सामान की किल्लत से आम लोगों को परेशानी होगी.


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