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जब पहली मर्तबा पाकिस्तानी इमामबाड़ा में दफन हुआ ब्राह्मण

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‘वफादारी बशर्ते उस्तवारी अस्ले ईमां है
मरे बुतखाने में तो काबे में गाड़ो बरहमन को’

ग़ालिब जहां कहीं भी होंगे, अपने कहे इस शेर को याद कर आज मन ही मन मुस्किया रहे होंगे. काबा में ब्राह्मण को दफनाने की ग़ालिब की ख्वाहिश कुछ हद तक पूरी हो गई है. पाकिस्तान में इमामबाड़ा के भीतर एक ब्राह्मण को दफनाया गया है. पाकिस्तान में मीरपुर खास के लुंड बलोच ट्राइब में बना ये इमामबाड़ा पंडित घर में जन्मे सुखदेव की अब आरामगाह है.

ये न समझिए कि ये कहानी बड़ी सीधी सी है. कई पेंच हैं. आसां नहीं है इस दुनिया में इंसां होना. इमामबाड़े में पंडित को दफनाने को लेकर विरोध हुआ. कुछ ने कहा ये गलत है. पर अपना ये पंडित सुखदेव पाकिस्तान में लोगों के दिलों में उतर चुका था.

सुखदेव से अब्दुल्ला, अब्दुल्ला से सोहनी फकीर
सुखदेव हिंदू ब्राह्मण फैमिली में पैदा हुए. पले बढ़े. फिर हुआ बंटवारा तो फैमिली के साथ इंडिया आ गए. इंडिया में मन नहीं लगा तो वापस पाकिस्तान के मीरपुर लौट गए. बाद में 6 फुट लंबाई वाले सुखदेव हिंदू से मुसलमां बन गए. सुखदेव से नाम बदलकर अब्दुल्ला हो गए. मीरपुर के लोगों ने अब्दुल्ला को प्यार से नाम दिया सोहनी. सोहनी फकीर. सोहनी, शायद पाकिस्तान का पहला हिंदू ब्राह्मण- मुसलमान हिजड़ा. जी, सोहनी ट्रांसजेंडर थीं.

मीरपुर खास की बार्बर्स कॉलोनी में सोहनी अपने फैमिली के साथ रहती थीं. सबसे बड़े प्यार से बात करती. बच्चों को प्यार से पुचकारती. मंदिरों में पूजा करतीं. लेकिन इन्ही मंदिरों से कुछ दूरी पर बना है आरिब शाह बुखारी का इमामबाड़ा. बड़ा फेमस तीर्थ है मीरपुर का. सोहनी की मंदिरों के साथ पूरी आस्था इस इमामबाड़ा में भी थी. बराबर आती, जातीं. लोगों से दिल लगाकर मिलतीं.

फोटो क्रेडिट: इमरान शेख
फोटो क्रेडिट: इमरान शेख, सोहनी फकीर का घर

सोहनी फकीर की इलाके में अच्छी खासी इज्जत थी. लोग दुआएं लेने आते. शादी ब्याहों में बुलाया जाता. नए बच्चों के नाम रखने के लिए सोहनी फकीर के दर पर लोकल लोग आना कभी नहीं भूलते.

‘मैंने कुछ अच्छा कभी किया हो तो ये ख्वाहिश पूरी कर दो’
सोहनी फकीर इमामबाड़े का ख्याल रखतीं. रिनोवेशन का काम भी करवाया. कहते हैं कि इमामबाड़ा के स्ट्रक्चर को सुधारने का काम भी सोहनी ने करवाया. पैसा दिया गया ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के फंड से.

सोहनी ने एक दिन इमामबाड़ा दो लोग भेजे. उस रोज सोहनी की तबीयत बहुत खराब थी. सोहनी फकीर ने इमामबाड़ा से आए लोगों से पूछा,

क्या आपको लगता है कि मैंने इमामबाड़ा की ढंग से सेवा की है?

जवाब मिला, ‘जी बिलकुल, आपने और बाकी के ख्वाजासराओं (ट्रांसजेंडर्स) ने ही तो इमामबाड़ा का ख्याल रखा है.’

ये सुनकर सोहनी बोलती हैं, ‘मेरी ख्वाहिश है कि मेरी लाश को इमामबाड़ा में दफन किया जाए. क्या ये पॉसिबल है?’ वहां आए दोनों लोगों ने जवाब देने के लिए वक्त मांगा और वहां से चले गए.

इस किस्से के दो रोज ही बीते थे कि इमामबाड़ा खबर पहुंचती है. सोहनी फकीर अब इस दुनिया में नहीं रहीं. दुख के साथ लोगों को याद आई सोहनी फकीर की आखिरी ख्वाहिश. इमाम बाड़ा में दफन होने की ख्वाहिश. कुछ लोगों ने कहा, ये सही नहीं रहेगा कि एक हिजड़े को सूफी संत के बराबर में दफनाया जाए. ये गलत है. लेकिन उधर के लोगों को दिल ज्यादा बड़ा साबित हुआ.

फोटो क्रेडिट: इमरान शेख
फोटो क्रेडिट: इमरान शेख

लोकल लोगों के विरोध के बाद भी सोहनी फकीर को इमामबाड़ा में दफनाया गया. आज सूफी संत आरिब शाह बुखारी की मजार के करीब ही सोहनी फकीर दफन हैं. मालूम नहीं कि मीरपुर के लोगों ने ग़ालिब को पढ़ा है या नहीं. पर सोहनी फकीर की कहानी और ग़ालिब के शेर को जोड़कर देखता हूं तो ख्याल आता है…

मरने के बाद काबा किसने देखा है ग़ालिब
जहां ज़िंदा में दिल लगे, तू वहीं दफन करवा देना मुझे

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