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जैवलिन के इतिहास का वो थ्रो जिसने इस खेल को हमेशा के लिए बदल दिया

नीरज चोपड़ा. पूरे भारत देश में शायद ही कोई ऐसा हो, जो इस नाम से अनजान हो. लेकिन कम ही लोग ऐसे होंगे, जो नीरज के पूर्व कोच का कारनामा जानते होंगे. बता दें कि नीरज के पूर्व कोच उवे हॉन के नाम जैवलिन थ्रो के खेल का सबसे लम्बा थ्रो दर्ज़ है. और अब उस रिकॉर्ड का टूटना भी लगभग असंभव है.

हॉन एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने भाले को 100 मीटर से ज्यादा दूर तक फेंक रखा है. जैवलिन थ्रो का वर्ल्ड रिकॉर्ड आज भी उन्हीं के नाम है. साल 1984 में हॉन ने 104.80 मीटर का अविश्वसनीय थ्रो फेंका था, और इसका रिकॉर्ड आज तक कोई जैवलिन थ्रोअर नहीं तोड़ पाया है.

हालांकि इसमें एक पेंच यह भी है कि साल 1986 के बाद से जैवलिन की टेक्नीक में काफी बदलाव लाए गए हैं. जैवलिन में कुछ तकनीकी बदलाव किए गए जिनकी वजह से 100 मीटर की दूरी प्राप्त कर पाना नामुमकिन सा हो गया है.

क्यों हुआ बदलाव?

इन बदलावों के पीछे के तमाम कारणों में से एक था एथलीट्स की सुरक्षा. जैवलिन के इतनी दूरी तय करने की वजह से फील्ड के चारों तरफ ट्रैक पर होने वाले इवेंट्स के लिए खतरा बढ़ गया था. मैदान काफी छोटे हुआ करते थे. ऐसा हो सकता था कि कोई भाला ट्रैक पर दौड़ रहे किसी खिलाड़ी को जा लगे. दूसरा कारण यह था कि उस समय के जैवलिन बहुत कम बार नुकीली तरफ से मैदान पर गिरते थे. ज्यादातर जैवलिन अपने पेट के बल मैदान पर गिरते और आगे की तरफ घिसटते थे जिसके कारण भी चोट लगने का रिस्क था.

इसके चलते भाले की अगले हिस्से को पिछले हिस्से के मुक़ाबले थोड़ा भारी रखा गया. इससे यह हुआ कि नीचे गिरते समय भाला आगे वाली नुकीली साइड की तरफ से ही मैदान पर गिरने लगा. और साथ ही उसकी दूरी भी कम हो गई.

यही कारण है कि टोक्यो ओलंपिक्स के फाइनल में भी औसतन थ्रो 80 से 85 मीटर के बीच में ही रहा. नीरज चोपड़ा को जिस थ्रो ने गोल्ड दिलाया वह भी 87.58 मीटर का ही था. वर्तमान समय के हिसाब से यह एक बहुत बढ़िया थ्रो है. लेकिन उनके पूर्व कोच के थ्रो से अब भी 17 मीटर कम है.


टोक्यो ओलंपिक: जैवलिन थ्रो में गोल्ड जीतने के बाद नीरज चोपड़ा का पुराना ट्वीट वायरल हो गया

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