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राज्यसभा चुनाव: कौन है ये बीजेपी नेता, जिसे पार्टी के अंदर से बाहर तक, सब हराने में जुटे हैं

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90 विधानसभा सीटों वाले छत्तीसगढ़ में राज्यसभा की एक सीट के लिए 23 मार्च को चुनाव होना है. ये सीट बीजेपी नेता डॉ. भूषण लाल जांगड़े का कार्यकाल खत्म होने की वजह से खाली हो रही है. जांगड़े का कार्यकाल 2 अप्रैल को खत्म हो रहा है. इस चुनाव के मद्देनज़र बीजेपी ने अपने राज्यसभा उम्मीदवार का नाम घोषित कर दिया है. ये नाम है सरोज पांडेय.

सरोज पांडेय
सरोज पांडेय

छत्तीसगढ़ के हिस्से में कुल 5 राज्यसभा सीटें हैं, जिनमें से अभी 3 पर बीजेपी और 2 पर कांग्रेस का कब्ज़ा है. बीजेपी से अभी डॉ. भूषण लाल जांगड़े, रणविजय सिंह जूदेव और राम विचार नेताम सांसद हैं, जबकि कांग्रेस से छाया वर्मा और मोतीलाल वोरा सांसद हैं. यहां 91 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें 49 बीजेपी और 39 कांग्रेस के पास हैं. राज्यसभा का गणित कहता है:

1 सीट पर चुनाव है. इस संख्या में 1 जोड़ा जाएगा. संख्या हो जाएगी 2. इसे कुल विधानसभा सीटों से भाग दिया जाएगा. यानी 90 को दो से भाग देंगे, तो आएगा 45. इसमें भी 1 जोड़ा जाएगा, तो संख्या होगी 46. यानी छत्तीसगढ़ की एक राज्यसभा सीट पर अपना सांसद भेजने के लिए पार्टी को कम से कम 46 विधायकों की ज़रूरत होगी.

गणित के हिसाब से ये सीट आराम से बीजेपी के खाते में जा रही है, क्योंकि उसके पास 49 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 39. इन 39 विधायकों में से कांग्रेस अमित जोगी, सियाराम कौशिक और आरके राय को पहले ही पार्टी से बाहर कर चुकी है. ये सिर्फ तकनीकी तौर पर कांग्रेस से जुड़े हैं. छत्तीसगढ़ में सीधी टक्कर भी बीजेपी और कांग्रेस की है, ऐसे में मोटे तौर पर किसी बड़े जोड़-तोड़ की उम्मीद कम है. लेकिन कांग्रेस ने अपनी तरफ से लेखराम साहू को कैंडिडेट बनाकर छत्तीसगढ़ के राज्यसभा सांसद का चुनाव रोचक बना दिया है.

कांग्रेस से राज्यसभा उम्मीदवार लेखराम साहू
कांग्रेस से राज्यसभा उम्मीदवार लेखराम साहू

कौन हैं सरोज पांडेय

बीजेपी की राष्ट्रीय महासचिव हैं और महाराष्ट्र की प्रभारी हैं. उम्र 50 साल है और 1992-93 में रविशंकर शुक्ल विवि से MHSc किया है. मूलत: छत्तीसगढ़ से ताल्लुक रखने वाली सरोज छात्र राजनीति में सक्रिय रही हैं. ये वो वक्त था, जब वो दुर्ग के शासकीय महिला महाविद्यालय में थीं. बिना किसी राजनीतिक बैकग्राउंड के इन्होंने पार्टी के तौर पर बीजेपी को चुना. साल 2000 में इन्हें दुर्ग नगर निगम का महापौर चुना गया और 2005 में जनता ने इन्हें रिपीट भी किया. दुर्ग में ये लगातार 10 साल मेयर रहीं और इस बीच इन्हें बेस्ट मेयर का अवॉर्ड भी मिला.

स्थानीय लोगों के साथ सरोज पांडेय
स्थानीय लोगों के साथ सरोज पांडेय

साल 2008 में बीजेपी ने इन्हें दुर्ग जिले की वैशाली नगर सीट से विधानसभा का टिकट दिया. वैशाली नगर सीट उस समय नई ही थी. दिसंबर 2008 में सरोज ने इस सीट पर कांग्रेस के बृज मोहन सिंह को 21,267 वोटों से हराया. इस तरह वो महापौर रहते हुए विधायक भी बन गईं. 2008 में ही उन्हें बीजेपी महिला मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया. अगले साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इन्हें दुर्ग से लोकसभा उम्मीदवार भी बना दिया.

बीजेपी दफ्तर में सरोज पांडेय
बीजेपी दफ्तर में सरोज पांडेय

लोकसभा चुनाव में सरोज का सामना ताराचंद साहू से था, जो बीजेपी से सांसदी का चुनाव जीत चुके थे. दुर्ग सीट पर बीजेपी 1996 से काबिज थी और ताराचंद चार बार सांसद रह चुके थे. लेकिन उनके बागी होने पर 2009 में बीजेपी ने सरोज पांडेय को टिकट दिया और सरोज जीत भी गईं. 2009 के चुनाव में कांग्रेस के प्रदीप चौबै दूसरे नंबर पर रहे थे और ताराचंद तीसरे नंबर पर खिसक गए थे.

चाराचंद साहू और सरोज पांडेय: एक फ्रेम में
ताराचंद साहू और सरोज पांडेय: एक फ्रेम में

पर मोदी लहर में हार गईं सरोज पांडेय

2014 में जब बीजेपी के टिकट पर देशभर में कई नए-नवेले नेता चुनाव जीत रहे थे, तब सरोज पांडेय दुर्ग से लोकसभा चुनाव हार गईं. उन्हें हराया था कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू ने. ये छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस की जीती हुई इकलौती लोकसभा सीट थी. इसके बाद बीजेपी ने यूपी के अपने नेता स्वतंत्र देव सिंह को हार का कारण जानने के लिए छत्तीसगढ़ भेजा था. जवाब ये मिला कि सरोज पार्टी की आंतरिक गुटबाजी की वजह से हारीं.

ताम्रध्वज साहू
ताम्रध्वज साहू

छत्तीसगढ़ की सियासत समझने वाले बताते हैं कि दुर्ग में बीजेपी के दो धड़े हैं. पहला धड़ा सरोज पांडेय का है, जबकि दूसरा प्रेम प्रकाश पांडेय का है. प्रेम प्रकाश सीनियर नेता हैं, विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री भी रह चुके हैं. मौजूदा रमन सरकार में भी वो राजस्व और शिक्षामंत्री हैं. इनसे अदावत की कीमत सरोज को चुनाव हारकर चुकानी पड़ी थी.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ प्रेम प्रकाश पांडेय
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ प्रेम प्रकाश पांडेय

लेकिन चुनाव हारने के बाद और बड़ी नेता बन गईं सरोज

छत्तीसगढ़ में सरोज का विरोधी खेमा ये मान रहा था कि लोकसभा चुनाव हारने से उनके करियर पर विराम लग जाएगा, जबकि हुआ इसके उलट. ये चुनाव हारने के बाद सरोज और बड़ी नेता बनकर उभरीं. उन्हें महाराष्ट्र का प्रभार दिया गया और जब बीजेपी ने महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में बढ़िया प्रदर्शन किया, तो इसका सेहरा सरोज पांडेय के सदस्यता अभियान के सिर बंधा. इससे पहले अमित शाह के बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद सरोज को राष्ट्रीय महासचिव बनाया ही जा चुका था.

महाराष्ट्र दौरे पर सरोज की एक तस्वीर
महाराष्ट्र दौरे पर सरोज की एक तस्वीर

बयानबाजी में पीछे नहीं हैं

अक्टूबर 2017 में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह केरल में पार्टी के लिए माहौल बनाने के मकसद से जनरक्षा यात्रा निकाली थी. इस दौरान उन्होंने पी. विजयन की सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि केरल में बीजेपी और संघ के कार्यकर्ताओं पर हमले किए जाते हैं. इसके बाद जब सरोज पांडेय केरल गईं, तो वो शाह से दो कदम आगे निकल गईं. जनरक्षा यात्रा में उन्होंने बयान दिया,

‘हमने मार्च की शुरुआत इसलिए की है कि आने वाले समय में अगर बार-बार हमारे कार्यकर्ताओं के साथ इस तरह से आंख दिखाने की स्थिति होगी, तो हम घर में घुसकर आंख निकाल लेंगे, तय बात है.’

बाद में अपने इस बयान के बचाव में उन्होंने कहा कि ये एक मुहावरा था. ‘हां, मैंने कभी कुछ विवादित या धमकी भरी बात नहीं की है, लेकिन अगर बीजेपी-संघ के कार्यकर्ताओं के साथ लगातार अन्याय होता है, तो मैं बिना हिचके युद्धक्षेत्र में दुर्गा के रूप में आ जाऊंगी.’

सरोज का नाम फाइनल कैसे हुआ

ये रोचक कहानी है. बीजेपी के जिन नेता डॉ. भूषण लाल जांगड़े का कार्यकाल खत्म हो रहा है, ये अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं. पार्टी ने इसे अनुसूचित जाति समाज को साधने के लिए ही राज्यसभा भेजा था. इस बार भी पार्टी ऐसा ही कोई समीकरण तलाश रही थी, जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष धर्मलाल कौशिक का नाम सबसे आगे चल रहा था. कौशिक OBC समुदाय से आते हैं, लेकिन उनकी जल्दबाजी ने उनका पूरा खेल बिगाड़ दिया.

छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष धर्मलाल कौशिक
छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष धर्मलाल कौशिक

छत्तीसगढ़ में ऐसे ढेर सारे नेता थे, जो मुख्यमंत्री रमन सिंह के सामने राज्यसभा की ज़िद लिए खड़े थे. किसी की निजी नाराज़गी मोल लेने से बचने के लिए रमन सिंह ने 25 नाम फाइनल करके आलाकमान को भेज दिए. इससे राज्य में ये संदेश गया कि जो भी तय होगा, ऊपर से तय होगा. हालांकि, इस वक्त तक भी कौशिक और सरोज का नाम आगे चल रहा था. खुद रमन सिंह कौशिक के पक्ष में बताए जा रहे थे. लेकिन नामांकन से दो दिन पहले कौशिक अपने लिए राज्यसभा का नामांकन फॉर्म खरीद लाए.

मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ धर्मलाल कौशिक
मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ धर्मलाल कौशिक

जैसे ही इसकी खबर दूसरे नेताओं को हुई, ये बड़ा मुद्दा बन गया. कांग्रेस ने इसे हाथों-हाथ लिया. कहा कि बीजेपी के नेता अपना नाम फाइनल होने को लेकर हद से ज़्यादा आश्वस्त हैं. खुद स्टेट बीजेपी के कई नेताओं की निगाह टेढ़ी हो गई. कौशिक वो नामांकन फॉर्म वापस करने भी गए, लेकिन वो वापस लिया नहीं गया. बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व कौशिक के इस कदम से खासा नाराज़ हुआ और उनका पत्ता वहीं साफ कर दिया. फिर बीजेपी की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने सरोज का नाम फाइनल कर दिया.

हालांकि, इस प्रकरण के बावजूद रमन सिंह कौशिक के पक्ष में खड़े दिखे. उन्होंने बाद में सफाई भी थी कि कौशिक ने अपने असिस्टेंट से नामांकन पत्र का प्रोफार्मा मंगाया था, लेकिन उनका असिस्टेंट सीधे नामांकन पत्र ही ले आया. इसके उलट कौशिक कहते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते दस्तावेज तैयार रखना उनकी ज़िम्मेदारी है. नेताम का नामांकन पत्र भी उन्होंने ही तैयार कराया था. ऐसे में उन्होंने सावधानीवश फॉर्म खरीदा था.

बीजेपी के राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम
बीजेपी के राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम

पार्टी ने क्या तर्क देकर सरोज को राज्यसभा कैंडिडेट बनाया है

कौशिक को कैंडिडेट बनाकर बीजेपी OBC समुदाय को लुभा सकती थी, लेकिन चूंकि सरोज अगड़े समाज से आती हैं, तो उनका नाम फाइनल करते समय पार्टी को कोई तर्क देना ही था. बीजेपी ने तर्क दिया कि पार्टी राष्ट्रीय महामंत्रियों को राज्यसभा भेजने के जिस फॉर्मूले पर चल रही है, उसी फॉर्मूले के तहत सरोज की दावेदारी पर मुहर लगाई गई है. ऐसा दूसरे राज्यों के राज्यसभा चुनाव में भी देखने को मिला है.

राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवारी का नामांकन दाखिल करते समय सरोज पांडेय
राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवारी का नामांकन दाखिल करते समय सरोज पांडेय

सरोज शनिवार को अपने घर में सीढ़ियों से गिरने की वजह से घायल हो गई थीं. उनके हाथ और पैर में चोट आई. इसलिए सोमवार को जब वो नामांकन करा रही थीं, तब उनके हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था और वो महिला और बाल विकास मंत्री रमशीला साहू का सहारा लेकर चल रही थीं. इनके नामांकन में मुख्यमंत्री रमन सिंह से लेकर राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री सौदान सिंह भी मौजूद थे.

सरोज की दावेदारी पर स्टेट बीजेपी का क्या रिएक्शन है

सरोज के नाम के आगे सफल नेता का ठप्पा भले लगा हो, लेकिन वो छत्तीसगढ़ बीजेपी में हर किसी की चहेती नहीं हैं. स्थानीय सूत्रों के मुताबिक पार्टी के सभी विधायक सरोज के नाम पर वोटिंग के राजी नहीं हैं, क्योंकि उन्हें आलाकमान की तरफ से थोपा गया कैंडिडेट माना जा रहा है. उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा कौशिक गुट है, जो अपने-आप में सक्षम है और जिसके पास रमन सिंह का सपोर्ट भी है. सरोज के विरोध का एक कारण ये भी है कि वो छत्तीसगढ़ के अगले सीएम की रेस में भी आगे हैं.

एक कार्यक्रम में अमित शाह के साथ रमन सिंह और सरोज पांडेय
एक कार्यक्रम में अमित शाह के साथ रमन सिंह और सरोज पांडेय

छत्तीसगढ़ में बीजेपी 15 साल से सत्ता में है और रमन सिंह इतने ही सालों से मुख्यमंत्री हैं. अभी की सियासी बयार रमन सिंह के खिलाफ जाती दिख रही है, जो 2018 में उनकी सीएम की कुर्सी के लिए खतरा है. ऐसे में सरोज को उम्मीद है कि पार्टी उन्हें सूबे की पहली महिला सीएम के पद से नवाजेगी. ऐसी खबरें भी हैं कि सरोज ने कुछ बीजेपी विधायकों को टिकट दिलाने का वादा किया है, जबकि उन विधायकों के जीतने की उम्मीद कम है. तर्क दिया जा रहा है कि सरोज खुद को बतौर सीएम स्वीकार्य बनाने के लिए ऐसा कर रही हैं.

एक स्थानीय कार्यक्रम में सरोज पांडेय
एक स्थानीय कार्यक्रम में सरोज पांडेय

क्या सरोज रमन सिंह के रास्ते में आएंगी

राजनीतिक पंडित कुछ भी कहें, कम से कम सरोज के बयान तो ऐसा ही कहते हैं. अक्टूबर 2017 के अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मैंने अपने कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा संघर्ष किया है. अगर मेरी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय होता है, तो मैं किसी से भी लड़ जाऊंगी. फिर वो पार्टी के मुख्यमंत्री ही क्यों न हों.’ सरोज साथ में ये भी जोड़ देती हैं कि पार्टी उन्हें जो भी ज़िम्मेदारी देगी, वो उसे निभाएंगी. इशारों में ही सही, पर वो अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा जता रही हैं.

रायपुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं के कन्वेंशन में अमित शाह और रमन सिंह के साथ मंच पर सरोज पांडेय
रायपुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं के कन्वेंशन में अमित शाह और रमन सिंह के साथ मंच पर सरोज पांडेय

कांग्रेस के कैंडिडेट लेखराज साहू कौन हैं

50 साल के साहू खुद को पेशे से किसान बताते हैं. इन्होंने 1984-85 में एमपी बोर्ड से मैट्रिक किया था. कांग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ता बताए जाते हैं. 2008 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने कुरूद सीट से बीजेपी के अजय चंद्राकर को 6,233 वोटों से हराया था. हालांकि, 2013 के विधानसभा चुनाव में वो इसी सीट पर अजय चंद्राकर से ही 27,094 वोटों से हार गए थे. अभी ये धमतरी में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष हैं.

कांग्रेस ने साहू को ही क्यों चुना है

साहू के ज़रिए कांग्रेस ने वही OBC कार्ड खेला है, जो बीजेपी नहीं खेल पाई. शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने आखिरी वक्त में बीजेपी को वॉकओवर न देने का मूड बनाया. साहू के OBC समाज से आने की वजह से ही छत्तीसगढ़ के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग की संभावना बढ़ गई है. हालांकि, कांग्रेस खुलेतौर पर ये कह रही है कि साहू का OBC होना महज़ संयोग है, लेकिन साथ में पार्टी ये भी कह रही है कि बीजेपी के कई OBC नेता उनके समर्थन में हैं.

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कैसे फाइनल हुआ साहू का नाम

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक रविवार की रात करीब 12 बजे छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने साहू को फोन करके सुबह नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के घर पहुंचने के लिए कहा. साहू जब सुबह पहुंचे, तो वहां पहले से कांग्रेस के कई विधायक मौजूद थे. वहीं उन्हें बताया गया कि उन्हें राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन करना है. इसके बाद साहू ने आनन-फानन में दस्तावेज इकट्ठे किए और फिर नामांकन कर दिया.

हालांकि, साहू नामांकन के बाद जो हुआ, वो और मज़ेदार है. विधानसभा का नज़ारा ये था कि बीजेपी नेता और संसदीय कार्यमंत्री अजय चंद्राकर ने नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के कमरे में जाकर साहू को प्रत्याशी बनाए जाने की बधाई दी. उधर साहू वैशाली नगर विधानसभा से बीजेपी विधायक सांवलाराम डाहरे के गले मिले और उनसे अपने लिए वोट करने को कहा.

भूपेश बघेल (बाएं) और टीएस सिंहदेव
भूपेश बघेल (बाएं) और टीएस सिंहदेव

राज्यसभा सांसद के चुनाव में क्रॉस-वोटिंग की कितनी संभावना है

कांग्रेस के कैंडिडेट उतारने से पहले तक सरोज के लिए सब कुछ आसान दिख रहा था, लेकिन अब मामला पेचीदा हो गया है. क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं के चलते ही कांग्रेस ने अपना कैंडिडेट उतारा है. उधर बीजेपी भी क्रॉस-वोटिंग की संभावना को स्वीकार नहीं कर रही है, लेकिन खुलकर नकार भी नहीं पा रही है. आलम ये है कि केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से बीजेपी विधायकों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए कहा गया है. वैसे भी खेल सिर्फ पांच से सात विधायकों का है. अगर बीजेपी के इतने विधायक क्रॉस-वोटिंग कर देते हैं, तो मामला कांग्रेस के पक्ष मेंं भी जा सकता है.

सौदान सिंह
सौदान सिंह

किसके बूते यहां तक पहुंची हैं सरोज पांडेय

सरोज का कोई पॉलिटिकल बैकग्राउंड नहीं था. इस हिसाब से उन्होंने लंबा सफर तय किया है. छत्तीसगढ़ की सियासत समझने वाले बताते हैं कि केंद्रीय राजनीति में दखल से पहले सरोज के छत्तीसगढ़ के सीनियर बीजेपी नेता सौदान सिंह से अच्छे लिंक थे. महापौर के तौर पर अच्छा काम करने की वजह से जनता ने उन्हें विधायकी और फिर सांसदी जिताई. जब केंद्रीय नेतृत्व में उन्हें तवज्जो मिली, तब उन्होंने वहां भी खुद को साबित किया. अब वो अमित शाह और जेपी नड्डा जैसे नेताओं की गुडबुक में हैं. दिसंबर 2017 में गुजरात में मुख्यमंत्री तय करने के लिए सरोज पांडेय को अरुण जेटली के साथ पार्टी का पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था.

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ सरोज पांडेय

ज़ाहिर है, 23 मार्च को नतीजा देखना रोचक होगा.


2018 के राज्यसभा चुनाव के बारे में और जानने के लिए यहां पढ़ें:

राज्यसभा का गणित : जब जनता वोट नहीं देती तो कैसे बनते हैं ये सांसद

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर 11 प्रत्याशियों ने चुनाव मजेदार बना दिया है

बिहार से कांग्रेस का एक सदस्य कैसे पहुंचेगा राज्यसभा?

मध्यप्रदेश की पांच राज्यसभा सीटों पर चुनाव का खेला ऐसे समझें

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