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मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि से ईदगाह हटाने की याचिका इन 2 आधार पर कोर्ट ने खारिज कर दी

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर से ईदगाह हटाए जाने की याचिका बुधवार 30 सितंबर को सिविल कोर्ट ने खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि इस मसले पर 1968 में ही समझौता हो चुका है. अब याचिका दायर करने का कोई मतलब नहीं है. दूसरी बात, 1991 का पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम भी इस याचिका को स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता. याचिकाकर्ताओं ने सिविल कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है.

क्या है पूरा मामला?

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ भूमि के स्वामित्व और शाही ईदगाह को हटाने की मांग को लेकर 26 सितंबर को सिविल कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से विष्णु जैन, हरीशंकर जैन और रंजन अग्निहोत्री आदि ने इसे दाखिल किया था. याचिका में 1968 में हुए समझौते को गलत बताया गया था.

क्या कहा गया था याचिका में?

याचिका में आरोप लगाया गया था कि मुसलमानों की मदद से शाही ईदगाह ट्रस्ट ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया है. भगवान की भूमि पर एक ढांचे का निर्माण किया गया है. याचिका में ये भी दावा किया गया कि भगवान विष्णु के आठवें अवतार यानी श्रीकृष्ण का मूल जन्मस्थान उसी ढांचे के नीचे स्थित है.

क्या समझौता हुआ था 1968 में?

मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद कृष्ण जन्मभूमि से सटी हुई है. 1935 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बनारस के हिंदू राजा को इस ज़मीन के कानूनी अधिकार सौंप दिए थे. 1951 में तय हुआ कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा. मगर इससे पहले ही 1945 में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने एक रिट दायर कर दी. इसका फैसला 1953 में आया. इसके बाद श्रीकृष्ण मंदिर निर्माण हुआ. फिर 1964 में संस्था ने पूरी ज़मीन पर नियंत्रण के लिए सिविल केस दायर किया. मगर 1968 में मुस्लिम पक्ष ने ही समझौता कर लिया. समझौते के तहत मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्ज़े की कुछ जगह छोड़ी. इसी समझौते के खिलाफ याचिका दायर की गई थी.

कोर्ट ने किस आधार पर अर्जी ठुकराई?

सिविल जज (सीनियर डिविजन) की अदालत में बुधवार को सुनवाई हुई. दोनों पक्षों की दलीलों के बाद कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया. सिविल जज ने पूर्व में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते का हवाला दिया. LiveLaw के मुताबिक, यह भी कहा कि 1991 का पूजास्थल कानून इस याचिका को स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता. इस कानून में सभी धर्मस्थलों को 15 अगस्त 1947 वाली स्थिति में बरकरार रखने का प्रावधान है. इस कानून में सिर्फ अयोध्या-बाबरी मस्जिद मामले को अपवाद रखा गया था.

वादियों ने क्या-क्या दलीलें दी थीं?

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, वादी पक्ष ने कोर्ट में कहा कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के नाम है. शाही मस्जिद ईदगाह से समझौता श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने किया था। जमीन का मालिक ट्रस्ट है. ऐसे में सेवा संघ को समझौता करने का अधिकार ही नहीं है. समझौता अवैध है.

पूजास्थल कानून के बारे में याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया worship Act 1991 यहां लागू नहीं होता, क्योंकि जन्मस्थान सेवा संघ और ईदगाह के बीच 1968 में समझौता हुआ था, उसकी डिक्री 1973 में हुई। लेकिन अदालत ने ये दलीलें नहीं मानीं.


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