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महाराष्ट्र: शपथ तो ले ली लेकिन क्या बहुमत साबित कर पाएंगे देवेंद्र फडणवीस?

22 नवंबर, 2019. देर शाम तक महाराष्ट्र की सियासी रस्साकशी की तस्वीर साफ होने लगी थी. शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस तीनों पार्टियों की मुंबई में मीटिंग हुई. मीटिंग के बाद उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनों ने कहा कि सरकार बनाने पर सहमति बन गई है. कल साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सारी चीजें साफ हो जाएंगी. इसके बाद लगने लगा था कि महाराष्ट्र की राजनीतिक उठापटक खत्म होने वाली है और तीनों दल मिलकर सरकार बनाने वाले हैं.

23 नवंबर, 2019. सुबह के सारे अखबारों में यही हेडिंग थी कि उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री हो सकते हैं. लेकिन जब तक तीनों दल दोबारा मिलते तब तक महाराष्ट्र में नई सरकार बन चुकी थी. और ये खबर अखबारों में नहीं थी. महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री के रूप में देवेंद्र फडणवीस शपथ ले चुके थे. 23 नवंबर को भोरे-भोरे 5 बजकर 47 मिनट पर राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया. सुबह 7.30 बजे फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनके साथ एनसीपी के विधायक दल के नेता अजित पवार ने भी शपथ ली. उपमुख्यमंत्री पद की. मतलब ये कि शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की सारी तैयारियां धरी रह गईं और प्रदेश में नई सरकार बन गई.

नंबर गेम समझिए

महाराष्ट्र में कुल विधानसभा सीटें हैं 288. सरकार बनाने के लिए चाहिए 145. कम से कम. बीजेपी और शिवसेना दोनों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा. इनका गठबंधन 161 सीट जीतने में कामयाब रहा. लेकिन सरकार नहीं बना पाए. क्योंकि दोनों अपने-अपने मुख्यमंत्री को लेकर अड़ गए. बीजेपी को 105 और शिवसेना को 56 सीट मिली. दूसरी तरफ एनसीपी के पास 54 और कांग्रेस के पास 44 विधायक हैं. बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के टूटने के बाद एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना के बीच सरकार बनाने को लेकर बात चली. तीनों को मिला देने पर 154 विधायक होते हैं. शरद पवार ने कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन की बात भी कही. 22 नवंबर को सरकार बनाने पर सहमति भी बन गई. लेकिन इससे पहले ही अजित पवार भाजपा के साथ चले गए और देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ ले ली.

अजित पवार के पास कितने विधायक?

देवेंद्र फडणवीस का दावा है कि उनके पास 13 निर्दलीय समेत 15 अन्य विधायकों का भी समर्थन है. अजित पवार एनसीपी विधायक दल के नेता हैं. ऐसे में विधायक दलों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र भी उन्हीं के पास था. आधिकारिक तौर पर विधायक दल के नेता का समर्थन पत्र ही मान्य होता है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजित पवार के पास एनसीपी के 35 विधायकों का समर्थन है. कुल मिलाकर होते हैं 155. लेकिन एक पेंच और है. दल-बदल रोधी कानून. ये कानून तब लागू होता है जब किसी पार्टी के दो-तिहाई से कम विधायक बागी हो जाएं. पार्टी लाइन से अलग चले जाएं. ऐसे में उन विधायकों की पार्टी की सदस्यता तो जाती ही है, उनकी विधायकी भी छिन जाती है.

फिलहाल एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने अजित पवार को पार्टी से निकाल दिया है. उनका कहना है कि समर्थन का फैसला अजित का निजी फैसला है. पार्टी उनके साथ नहीं है. अब अजित पवार के सामने दो रास्ते हैं. या तो वे नई पार्टी बनाएं या फिर भाजपा में शामिल हो जाएं. अकेले नहीं, एनसीपी के कम से कम 36 विधायकों के साथ. अगर इससे एक भी कम विधायक हुए तो दल-बदल कानून लागू हो जाएगा. हो ये भी सकता है कि शिवसेना और कांग्रेस से कुछ विधायक टूटें और फडणवीस का समर्थन करें.

एनसीपी चीफ शरद पवार ने क्या कहा?

एनसीपी टूट चुकी है. और पवार फैमिली भी. 23 नवंबर को उद्धव ठाकरे के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरद पवार ने कहा, ‘कांग्रेस, शिवसेना और राकांपा के नेता सरकार बनाने के लिए साथ आए. हमारे पास जरूरी नंबर थे. हमारे विधायक सरकार का समर्थन कर रहे थे. कुछ निर्दलियों के समर्थन से हमारा आंकड़ा 170 तक पहुंच गया था. अजित पवार का फैसला पार्टी लाइन से अलग है. यह अनुशासनहीनता है. राकांपा का कोई भी नेता राकांपा-भाजपा सरकार के समर्थन में नहीं है. राकांपा के जो भी विधायक भाजपा को समर्थन दे रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि वे दल-बदल कानून के प्रावधान में आ रहे हैं. इससे उनका विधायक पद खतरे में आ सकता है.’

अब देखने वाली बात ये है कि फडणवीस और अजित पवार किस तरह से विधानसभा में बहुमत साबित करते हैं? और ये पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायकों पर किसकी पकड़ मजबूत है? चाचा शरद पवार की या फिर भतीजे अजित पवार की.


वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: देवेंद्र फडणवीस के मु्ख्यमंत्री की शपथ लेने से पहले कांग्रेस-NCP में क्या बात चल रही थी?

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