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प्रणव धनावड़े वर्सेज़ अर्जुन तेंदुलकर : फेसबुक की एकलव्य थ्योरी झूठी है

सोशल मीडिया. एक जगह जहां लोग आकर एक दूसरे से कनेक्ट होते हैं. इसके अपने फायदे हैं और अपने नुकसान. नुकसान ऐसा कि आप जब चाहें, जैसे चाहें, कोई भी अफवाह उड़ा सकते हैं. बहुत से लोग ऐसे बैठे हैं जो बिना समझे-बूझे चीज़ों को शेयर करने लगते हैं. हाल ही में ऐसा हुआ है क्रिकेट की एक खबर को लेके. ये वैसी ही अफवाह है जैसे वर्ल्ड कप 2003 में पोंटिंग ने बल्ले में स्प्रिंग में लगा रखी थी.

हुआ ये कि बहस छिड़ गयी कि सचिन के बेटे को वेस्ट ज़ोन अंडर 16 की टीम में जगह दे दी गयी लेकिन प्रणव धनावड़े को नहीं मिली. प्रणव वही जिसने 2016 की शुरुआत में एक इनिंग्स में 1000 रन बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था. सचिन को लानतें दी जा रही हैं कि वो अपने बेटे को वसीम अकरम से ट्रेनिंग दिलवा रहे हैं लेकिन प्रणव को कोई भी सुविधा नहीं मिल रही है.

इस बाबत फेसबुक पर कई पोस्ट दिखे. कई जगहों पर जब क्रॉस चेक किया तो जो कुछ भी मालूम चला, उसके आधार पर एक पोस्ट जो सबसे संतुलित और सच्चाई से सबसे करीब दिखी वो थी अशोक कुमार पांडे की –

अर्जुन तेंदुलकर ही नहीं उस टीम मे पंद्रह और चुने गए हैं। अर्जुन की जगह एक आल राउंडर के रूप मे होगी। प्रणव की स्पेशलिस्ट बैट्समैन के रूप मे। तो प्रणव पर वरीयता अर्जुन को नहीं किसी स्पेशलिस्ट बैट्समैन को दी गई है। प्रणव की उस इनिंग के बारे मे इंडियन एक्स्प्रेस की यह रिपोर्ट पढ़िएगा। उसके अलावा कोई और उल्लेखनीय प्रदर्शन दिखे तो बताइएगा।

आपने कह दिया अर्जुन की कोई उपलब्धि नहीं सचिन का बेटा होने के अलावा। यह भूल गए कि प्रणव ने ये रन दस साल के बच्चों की गेंद पर अंडर ट्वेल्व की पिच पर बनाए, अर्जुन ने बारह की उम्र मे अपने देब्यू मैच मे अंडर फोर्टीन के खिलाफ खेलते सेंचुरी बनाई थी। जिस टूर्नामेंट से सचिन-कांबली पहचाने गए उसमें बैटिंग मे फेल होने के बाद अठाइस रन देकर आठ विकेट लिए। जिस वायड़े टूर्नामेंट से विजय मर्चेन्ट ट्रॉफी के लिए चुनाव होता है उसमें पहले मैच मे शतक लगाया। दूसरे मैच मे 73 रन देकर चार विकेट लिए और चालीस रन बनाएा सचिन का बेटा होने से पिच पर रन नहीं बनते भाई साहब। यह योग्यता नहीं है तो अयोग्यता भी नहीं।

मेरी शिकायत होगी कि हर बच्चे को वह ट्रेनिंग सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन मैं याद रखूँगा कि सिर्फ सुनील गावस्कर का बेटा होने से रोहण बंबई की टीम के भी रेगुलर सदस्य न बन सके। लाला अमरनाथ और सुरिंदर/मोहिंदर अमरनाथ के अलावा कोई पिता-पुत्र की भारतीय जोड़ी नहीं दिखती ऐसी जिसका उल्लेख किया जा सके।

इस पूरे मामले में अगर तथ्यों को देख लें तो कुछ आराम मिलेगा. ज़रूरी है कि इस पूरे मसले में टाइमलाइन पर ध्यान दिया जाए. सबसे पहले, नवम्बर 2015 में एक टूर्नामेंट खेला गया. मुंबई में. एमसीए अंडर-16 पय्याडे ट्रॉफी. चार टीमें खेली थीं. सचिन तेंदुलकर इलेवेन, सुनील गावस्कर इलेवेन, रोहित शर्मा इलेवेन और दिलीप वेंगसरकर इलेवेन. सुनील गावस्कर इलेवेन में एक ऑल राउंडर खेल रहा था. उसका नाम था अर्जुन तेंदुलकर. 24 नवम्बर को पहला मैच खेला गया. और अर्जुन तेंदुलकर ने वन-डाउन खेलते हुए पहली इनिंग्स में 152 गेंद में 106 रन बनाये. इनिंग्स में 2 छक्के और 16 चौके शामिल थे. सुनील गावस्कर इलेवेन ने 66.3 ओवर में 218 रन बनाये.
रोहित शर्मा इलेवेन ने बैटिंग करते हुए 56.5 ओवर में 165 रन बनाये. इस दौरान सुनील गावस्कर इलेवेन की ओर से बॉलिंग करते हुए उसी अर्जुन तेंदुलकर ने 16.5 ओवर में 73 रन देकर 4 विकेट लिए. इसमें 2 ओवर मेडेन शामिल थे.
सुनील गावस्कर इलेवेन की अगली इनिंग्स में तीसरे विकेट के गिरने पर अर्जुन फिर से बैटिंग करने आये और इस बार 35 गेंदों में 40 रन बनाये. 1 छक्का और 6 चौके के साथ. रोहित शर्मा इलेवेन की बैटिंग के दौरान अर्जुन ने बॉलिंग करते हुए 8 ओवर में 1 विकेट लिया. इस दौरान 1 ओवर ऐसा था जिसमें एक भी रन नहीं आये.

इस बात पर ध्यान देने की ज़रुरत है कि पय्याडे ट्रॉफी वेस्ट ज़ोन के अंडर-16 क्रिकेट के लिए ट्रायल मैचों की तरह से काम करती है. जिस मैच में अर्जुन तेंदुलकर खेल रहे थे, उस मैच का आखिरी दिन था 26 नवम्बर 2015. इसी 26 नवम्बर की शाम एक मीटिंग हुई जिसमें वेस्ट ज़ोन की अंडर-16 टीम का सेलेक्शन हुआ. अर्जुन तेंदुलकर का उसमें नाम शामिल था. ज़ाहिर है उनके अच्छे प्रदर्शन को अनदेखा नहीं किया जा सकता था. उनका ऑल राउंडर होना एक प्लस पॉइंट था.

साल ख़त्म हुआ और शुरू हुआ 2016. यहां याद रहे कि वेस्ट ज़ोन की अंडर-16 टीम का सेलेक्शन पहले ही हो चुका है. नए साल का पहला ही हफ्ता चल रहा था. एक इंटर स्कूल टूर्नामेंट शुरू हुआ. नाम था एच. टी. भंडारी कप. इसी टूर्नामेंट में 5 जनवरी को श्रीमती के.सी. गाँधी स्कूल, कल्याण और आर्य गुरुकुल स्कूल की टीम के बीच मैच चल रहा था. के.सी गांधी टीम की पहले बैटिंग आई और प्रणव धनावड़े ओपेनिंग करने उतरे. उन्होंने कुल 395 मिनट बैटिंग की और 323 गेंदें खेली. इन 323 गेंदों में कुल 1009 रन बनाये. यहां से प्रणव एक हीरो बनके उभरे. दिनों-दिन उनके बारे में बात चली. फिर कुछ दिन बात बातें ठंडी भी हो चलीं.

अभी कुछ ही दिन पहले फिर से प्रणव का नाम आया. कहा जाने लगा कि अर्जुन को तरजीह इसलिए दी गयी क्यूंकि उनके बाप का नाम सचिन तेंदुलकर है. वरना 1000 रन मारने वाले प्रणव का नाम टीम में क्यूं नहीं है?


क्या आपने कभी सुना है कि फॉर्म भरने की डेट निकल जाने के डेढ़ महीने बाद पहुंचने वाले फॉर्म को वैध मान लिया गया हो?


नहीं न? ऐसा ही हुआ इस केस में. टीम सेलेक्शन होना था नवम्बर 2015 में. प्रणव धनावाड़े ने 1000 रन मारे जनवरी 2016 में. जब तक मुंबई क्रिकेट असोसिएशन के पेरोल पर किसी भविष्य देखने वाले जादूगर का नाम नहीं लिखा है, मुझे नहीं लगता प्रणव का नाम अंडर-16 की लिस्ट में किसी भी तरह से आ सकता था.

इसी मसले में सचिन वर्सेज़ काम्बली की बहस को भी दोबारा शुरू कर दिया गया है. सचिन कांबली के टेस्ट आंकड़े सामने रख यह कहा गया कि कांबली सचिन से ज़्यादा बेहतर बैट्समैन थे. लेकिन सचिन टीम में इसलिए बने रहे क्यूंकि वो ब्राह्मण परिवार से थे और कांबली ‘दलित’. सच है कि कांबली की टेस्ट करियर की शुरुआत सचिन के मुकाबले ज़्यादा चमकदार थी. हालांकि बहस में कांबली का पक्ष खड़ा करते हुए यह सामान्य तथ्य छिपा लिए गए कि टीम से बाहर होने से पहले उनके अंतिम टेस्ट स्कोर 28, 27, 0, 18, 6, 0, 0, 40, 19 और 9 थे. इसके अलावा यह तथ्य भी कि कांबली 1995 में टेस्ट टीम से बाहर होने के बाद भी 2000 तक एकदिवसीय क्रिकेट खेलते रहे हैं और उनका प्रदर्शन ऐसा नहीं रहा जो उन्हें टेस्ट टीम में खोई जगह वापस दिला पाए. यह भी याद रखना चाहिए कि क्रिकेट में यह एकदिवसीय फॉर्मेट की सर्वोच्चता का दौर था और वहां चमके बिना खिलाड़ियों के लिए उज्ज्वल भविष्य मुश्किल ही रहा.

इसके अलावा सचिन पर तो इस मामले में उल्टे आरोप तक लगे हैं. 1996-1997 में जब सचिन टीम के कप्तान थे, तब उन पर सौरव गांगुली के मुकाबले अपने बचपन के दोस्त विनोद कांबली को टीम में खिलाकर पक्षपात करने के आरोप लगे. गांगुली उसी साल इंग्लैंड में टेस्ट में लगातार 2 शतक मारकर सुर्खियों में आए थे. क्रिकेटीय सच्चाई ये है कि गांगुली और द्रविड़ के उभार ने टीम के मध्यक्रम में खाली सीमित जगहों को भर दिया था और कई मौकों के बाद भी विनोद कांबली का अस्थिर प्रदर्शन उन्हें टीम में लम्बे समय तक बरकरार नहीं रख पाया. जैसे संजय मांजरेकर का अस्थिर करियर खत्म हुआ, कांबली भी इसी की अगली कड़ी थे.

वापस लौटते हैं प्रणव और अर्जुन पर. अर्जुन के अगर वसीम अकरम से ट्रेनिंग लेने की बात की जा रही है तो इतना जान लिया जाए कि ये बात एकदम सच है. और इसमें बुरा क्या है?


यदि एक बाप इस बात में सक्षम है कि वो अपने बेटे को दुनिया की सबसे अच्छी ट्रेनिंग दिला सकता है, और वो दिला भी रहा है तो किस बात का रोना?


साथ ही वसीम अकरम की सुनें तो वो कहते हैं कि अर्जुन से उनकी मुलाकात 2015 में हुई थी जहां वो इंग्लैंड की टीम को नेट्स में बॉलिंग कर रहे थे. वहां अर्जुन ने एक एग्ज़ीबिशन मैच भी खेला था जिसमें उन्होंने ब्रायन लारा को आउट किया था. वहां उन्होंने अर्जुन के ऐक्शन, स्विंग और फिटनेस के बारे में बात की. अर्जुन सब कुछ सीखने को तैयार था और ये अच्छी बात है.

arjun tendulkar

अब अगर बात करें प्रणव के 1000 रन की इनिंग्स की तो एक बात है जो उसके खेल के बारे में साफ़ तस्वीर नहीं पैदा करती है. प्रणव की टीम का मैच जिस टीम के साथ होना था, उसके आधे प्लेयर्स का एक्ज़ाम चल रहा था. जिसकी वजह से उन्होंने खेला ही नहीं. उनकी जगह पर 12-13 साल के बच्चों ने क्रिकेट खेला. उनमें से कई ने उससे पहले कभी सीज़न बॉल से क्रिकेट नहीं खेला था. कई ऐसे थे जिन्होंने सिर्फ उन ही मैचों में खेला था जिसमें उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा 9 ओवर फेंकने को मिलते थे. यहां उन्होंने 23 ओवर फेंके. देखने वाले बताते हैं कि प्रणव की मारी हुई गेंदों से उन्हें डर लगता था जिससे ज़बरदस्त फील्डिंग मिस्टेक्स हुई थीं. मैच में कुल 25 बार प्रणव आउट होने से बच थे. 21 कैच छूटे थे. इसके बाद बने 1000 रन. अगर सभी मौके किसी स्ट्रांग टीम को मिले होते तो 1000 रनों पर 25 विकेट गिरते. यानी हर विकेट पर 40 रन. ये 40 ही अर्जुन तेंदुलकर की दूसरी इनिंग्स का स्कोर था. इसके पहले वो एक सेंचुरी मार चुके थे. अंतर साफ़ है – एक खिलाड़ी अपने से कई गुना बड़े कद के खिलाडियों के साथ खेल रहा है, उनसे सीख रहा है. दूसरा, अपने से सालों छोटे खिलाडियों के खिलाफ़ खेल रहा है. रनों पर रन मार रहा है. आप अगर किसी के चयन पर सवाल उठा रहे हैं तो आखिर उसका बेस क्या है? कुछ क्लियर करें. प्लीज़.

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