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साहित्य का नोबेल पाने वाले अब्दुलरजाक गुरनाह कौन हैं?

साल 2021 के लिए नोबेल पुरस्कारों की घोषणा हो रही है. मेडिसिन, फ़िजिक्स और केमिस्ट्री के क्षेत्र में पुरस्कारों का ऐलान हो चुका है. अब साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई है. उपन्यासकार अब्दुलरजाक गुरनाह को साल 2021 का साहित्य का नोबेल मिला है. स्वीडिश एकेडमी ने पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा कि अब्दुलरजाक गुरनाह ने अपनी लेखनी के जरिए उपनिवेशवाद के प्रभावों और संस्कृतियों को लेकर काफी कुछ लिखा है. उन्होंने शरणार्थियों के भाग्य का निर्धारण करने के लिए अपनी अडिग और करुणामय लेखनी के माध्यम से दुनिया के दिलों में प्रेम पैदा किया है.

नोबेल पुरस्कार जीतने वाले को एक गोल्ड मेडल और 10 मिलियन स्वीडिश क्रोनोर मिलता है. रुपए में बोले तों 8 करोड़ 53 लाख के करीब. लिटरेचर का नोबेल विजेता ढूंढने का ज़िम्मा है ‘दी स्वीडिश एकेडमी’ पर. बहुतई पुरानी रॉयल एकेडमी है. इसकी भी अपनी ‘नोबेल कमिटी फॉर लिटरेचर’ है, जिसमें चार से पांच लोग शामिल हैं.

ये पुरस्कार का पइसा मिलेगा नोबेल की वसीयत से. इन्हीं के नाम पर ये पुरस्कार दिया जाता है. पूरा नाम है अल्फ्रेड नोबेल. स्वीडन के रहने वाले थे. एकदम जीनियस इंसान थे. वो बचपन में एक चैप्टर पढ़ा था ना, कि किसने, किस चीज का आविष्कार किया. उसमें नोबेल साहब का जिक्र भी जरूर होता है. डायनामाइट का आविष्कार इन्हीं अल्फ्रेड नोबेल ने किया था.

अल्फ्रेड ने ज़िदंगी भर खूब पैसा कमाया, नाम कमाया. 1896 में हो गई इनकी मौत. फिर खोली गई इनकी वसीयत, जिसमें लिखा था कि इनकी सारी कमाई फिजिक्स, केमिस्ट्री, लिटरेचर, फिजियोलॉजी या मेडिसिन और शांति के फील्ड में शानदार काम करने वालों को दी जाए. प्राइज़ के तौर पर. बस तब से ये रीत चली आ रही है.

अब्दुलरजाक गुरनाह कौन हैं?

अब्दुलरजाक का जन्म 1948 में हुआ था. जंजीबार में. ये पूर्वी अफ्रीकी देश तंजानिया का एक इलाका है. 1960 के दशक के अंत में अब्दुलरजाक एक शरणार्थी के रूप में इंग्लैंड पहुंचे. दिसंबर 1963 में जंजीबार ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से शांतिपूर्ण तरीके से मुक्त हुआ. हालांकि इसके बाद वहां नरसंहार हुए. गुरनाह पीड़ित जातीय समूह के थे. स्कूल खत्म करने के बाद उन्हें अपने परिवार को छोड़कर देश से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा. 1984 तक वे अपने देश नहीं लौट पाए.

रिटायरमेंट के पहले तक अब्दुलरजाक गुरनाह केंट विश्वविद्यालय, कैंटरबरी में अंग्रेजी और उत्तर औपनिवेशिक साहित्य के प्रोफेसर थे. गुरनाह ने 10 उपन्यास और कई लघु कथाएं लिखी हैं. उनके लेखन में शरणार्थियों का जिक्र अधिक है. स्वाहिली उनकी पहली भाषा थी, लेकिन उन्होंने 21 साल की उम्र में अंग्रेजी में लिखना शुरू किया. इसी को उन्होंने साहित्य लेखनी का माध्यम बनाया. हालांकि उनका कहना है कि उनके शुरुआती लेखन को साहित्य के रूप में नहीं गिना जा सकता है.

गुरनाह के चौथे उपन्यास ‘पैराडाइज’ (1994) ने उन्हें एक लेखक के रूप में पहचान दिलाई. उन्होंने 1990 के आसपास पूर्वी अफ्रीका की एक शोध यात्रा के दौरान ये उपन्यास लिखा था.


दुनियादारी: नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ने जनता को दाने-दाने के लिए क्यों तरसाया?

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