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जिस अफ़सर ने जाने कितने नेताओं का बैंड बजाया, आज खुद नेताओं जैसी बातें क्यों कर रही हैं?

दिवाकर रूपा मुद्गिल. ये नाम आपने पिछले साल खूब सुना होगा. रूपा कर्नाटक काडर की 2000 बैच की IPS हैं, जिन्होंने 2017 में शशिकला को जेल में मिल रहे VIP ट्रीटमेंट का खुलासा किया था. अभी रूपा बेंगलुरु के होमगार्ड डिपार्टमेंट में IGP हैं और बेंगलुरु के ही एक फाउंडेशन की तरफ से दिए जाने वाले अवॉर्ड को लेकर चर्चा में हैं. पर इस बार मामला थोड़ा पेचीदा और बहुत विवादित है.

विवाद शुरू कहां से हुआ

24 मार्च को रूपा का नम्मा बेंगलुरु फाउंडेशन को लिखा एक लेटर सामने आया, जिसमें उन्होंने लिखा कि वो फाउंडेशन की तरफ से दिया जाने वाला ‘नम्मा बेंगलुरु अवॉर्ड’ स्वीकार नहीं कर सकतीं. उन्होंने वजह ये बताई कि इस अवॉर्ड में भारी नकद राशि होती है, जो एक सरकारी अधिकारी के तौर पर लेना उन्हें ठीक नहीं लगता. हालांकि, दी लल्लनटॉप के साथ बातचीत में रूपा ने दावा किया कि उन्होंने फाउंडेशन को ये लेटर 22 मार्च को लिखा था. रूपा के इस लेटर की खास बातें ये हैं:

– इस अवॉर्ड में भारी नकद इनाम मिलता है, इसलिए मेरी अंतरात्मा इसे लेने की गवाही नहीं देती.
– सरकारी कर्मचारी से राजनीतिक तौर पर तटस्थ रहने की उम्मीद की जाती है. इससे ही वो लोगों में अपनी अच्छी छवि बनाए रख सकता है.
– आप कई इलाकों में ढेर सारे काम कर रहे हैं, जिसके लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करती हूं. मैं ये अवॉर्ड नहीं ले सकती.

डी. रूपा का पहला लेटर
डी. रूपा का पहला लेटर

ये अवॉर्ड है क्या

‘नम्मा बेंगलुरु अवॉर्ड’ नम्मा बेंगलुरु फाउंडेशन की तरफ से पिछले 8 साल से दिया जा रहा अवॉर्ड है. ये नवां साल है. फाउंडेशन के मुताबिक वो ऐसे लोगों को सम्मानित करते हैं, जो बेंगलुरु को एक बेहतर जगह बनाने में योगदान देते हैं. इस बार 10 कैटेगरी में लोगों को अवॉर्ड दिया गया. हर साल फाउंडेशन की तरफ से अवॉर्ड के साथ एक लाख रुपए दिए जाते थे. इस साल ये रकम दोगुनी कर दी गई यानी जीतने वालों को दो लाख रुपए का इनाम मिला. फाउंडेशन के कर्ता-धर्ता बड़े कारोबारी और अभी बीजेपी से राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर हैं. इनकी कहानी आगे बताएंगे, क्योंकि ये भी इस विवाद में एक किरदार हैं.

nba

तो रूपा के लेटर के बाद दिक्कत कहां आई

25 मार्च की शाम नम्मा बेंगलुरु अवॉर्ड (NBA) के विजेताओं की घोषणा हुई. रूपा को ‘गवर्नमेंट ऑफीशियल ऑफ दि ईयर’ कैटेगरी में 7 और अधिकारियों के साथ नॉमिनेट किया गया था. फाउंडेशन ने इस अवॉर्ड के लिए IFS दीपिका वाजपेयी को चुना, जो बेंगलुरु शहरी डिवीज़न में डिप्टी कंज़रवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स हैं. अगले दिन 26 मार्च को फाउंडेशन ने रूपा ने लेटर के जवाब में उनका नाम न लेते हुए अपना पक्ष रखा. फाउंडेशन के लेटर की खास बातें हैं:

– हम सरकारी अधिकारी कैटेगरी में नॉमिनेट एक व्यक्ति के बर्ताव से हैरान हैं.
– इस अवॉर्ड के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ, जब किसी ने अवॉर्ड पाने के लिए जूरी से लगातार लॉबिंग की हो और फिर अवॉर्ड न मिलने पर ऐसा दुर्भावनापूर्ण बर्ताव किया हो.
– उनके विचार जूरी के विजेता चुनने के पहले आए. उन्हें तो कभी अवॉर्ड ऑफर किया ही नहीं गया था, तो उसे न लेने का सवाल ही नहीं उठता.

फाउंडेशन की तरफ से जारी किया गया लेटर
फाउंडेशन की तरफ से जारी किया गया लेटर

अवॉर्ड के लिए न चुने जाने पर रूपा का क्या जवाब है

फाउंडेशन ने ये बड़ी बात कही कि रूपा को अवॉर्ड के लिए चुना ही नहीं गया था. ऐसे में उनसे न लेने का तो सवाल ही नहीं उठता. दी लल्लनटॉप के साथ बातचीत में रूपा ने दावा किया कि उन्होंने अवॉर्ड न लेने की बात विजेता बनने की संभावना के चलते कही थी. रूपा के मुताबिक, ‘अगर मैं अवॉर्ड शो में जाती और मुझे चुना जाता, तो स्टेज पर जाकर ये अवॉर्ड वापस करना गलत होता. इसलिए मैंने पहले ही फाउंडेशन से कहा कि वो मुझे ये अवॉर्ड न दें.’

डी. रूपा
डी. रूपा

पर फाउंडेशन के लेटर के बाद रूपा का एक और लेटर आया

इसमें रूपा में सारी नई बातें कहीं और इसी से विवाद को हवा मिली. इसमें रूपा ने लिखा, ‘जब NBF शुरू हुआ था, तो इसके MD राजीव चंद्रशेखर निर्दलीय सांसद थे. लेकिन कुछ ही दिन पहले वो एक राजनीतिक पार्टी से राज्यसभा में चुने गए. NBF की प्रक्रिया कई महीने पहले शुरू हो गई थी, जबकि इसके MD ने हाल ही में एक राजनीतिक पार्टी जॉइन की. इसी वजह से मैंने अवॉर्ड के लिए मना किया था.’ रूपा के इस लेटर की खास बातें हैं:

– NBF ने ‘स्टील फ्लाईओवर’ और ‘कावेरी में गिरने वाले सीवर के पानी’ जैसे कई मुद्दों पर एक्टिविज़्म शुरू कर दिया और सरकार को कोर्ट में घसीटना शुरू कर दिया. सरकारी अधिकारी के तौर पर हम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हैं, ऐसे में किसी सरकारी अधिकारी का ये अवॉर्ड लेना ठीक नहीं है.
– NBF अवॉर्ड का फैसला लेने वाली जूरी के कई सदस्य उसी पार्टी से ताल्लुक रखते हैं, जिससे MD का ताल्लुक है. सूत्रों के मुताबिक ये लोग सरकारी टेंडर न मिलने पर सरकार के प्रति दुर्भावना रखते हैं. बतौर सरकारी अधिकारी, हमें इससे दूर रहना चाहिए.
– पिछले तीन सालों से ये अवॉर्ड फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारी को दिया जा रहा है, जिसका वास्ता नदी में गिरने वाले सीवर के पानी वाले केस से है. इस मुद्दे पर सरकार कोर्ट में NBF और इसके साथियों से लड़ रही है. ऐसे में अवॉर्ड लेना ‘हितों के टकराव’ का मामला बनता है.
– NBF अवॉर्ड की साख कम हुई है, जिसकी वजह से इसकी इनामी राशि एक लाख से बढ़ाकर दो लाख रुपए कर दी गई.

रूपा की तरफ से आया दूसरा लेटर, जिसमें उन्होंने राजीव चंद्रशेखर के बीजेपी से जुड़ने की वजह से अवॉर्ड मना करने की बात लिखी.
रूपा की तरफ से आया दूसरा लेटर, जिसमें उन्होंने राजीव चंद्रशेखर के बीजेपी से जुड़ने की वजह से अवॉर्ड मना करने की बात लिखी.

पर क्या रूपा के पास इन आरोपों का कोई सबूत है?

दी लल्लनटॉप ने जब रूपा से इस पूरे मामले पर सवाल पूछे, तो उन्होंने वही बातें दोहराईं, जो उन्होंने अपने दोनों लेटर्स में लिखी थीं. जो अलग बात थी, वो ये थी कि वो काफी घुमा-फिराकर जवाब दे रही थीं. एक सरकारी अधिकारी से आप उम्मीद कर सकते हैं कि वो नेताओं की तरह बात नहीं करेगा. आप उससे सीधा सवाल पूछेंगे, तो वो सीधा जवाब देगा. पर रूपा काफी देर तक सवालों पर गोलमोल करती हैं. लगभग हर सवाल के जवाब में वो वही आदर्शवाद की बात करती हैं कि फाउंडेशन ने उनके लेटर का जवाब दो दिन बाद क्यों दिया और सरकारी अधिकारियों को ऐसे मामलों में नहीं पड़ना चाहिए.

रूपा इस बात से परेशान लगीं कि इस मामले को मीडिया में तूल दिया गया. उनके मुताबिक उनका अवॉर्ड लेने से इनकार करना कोई बड़ी बात नहीं है. वो कोई बहुत बड़ी अधिकारी नहीं हैं, जिनके बारे में मीडिया में खबर चले. उनके हिसाब से ये अवॉर्ड सिर्फ आम नागरिकों को दिया जाना चाहिए, सरकारी अधिकारियों को नहीं. रूपा ने फाउंडेशन और पहले अवॉर्ड पा चुके सरकारी अधिकारियों पर जो भी आरोप लगाए, वो सूत्रों के आधार पर हैं. जब हमने पूछा कि क्या वो इन खामियों के खिलाफ कोई कानूनी कदम उठाएंगे, तो उन्होंने कोई ठोस जवाब नहीं दिया.

रूपा का एक दावा ये भी है कि फाउंडेशन को उनके किए कामों की भी सही जानकारी भी नहीं है. फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट पर सभी नॉमिनीज़ के बारे में थोड़ी-थोड़ी जानकारी दी है. रूपा कहती हैं कि फाउंडेशन उनके जो काम गिना रहा है, उसमें उनका कोई खास योगदान नहीं है और असल में उन्होंने जो काम किए हैं, फाउंडेशन ने उनका ज़िक्र नहीं किया. रूपा अपनी बात के पक्ष में ऑल इंडिया सर्विस रूल्स 1968 गिनाती हैं कि नियमों के आधार पर तो सरकारी अधिकारियों को ऐसा कोई अवॉर्ड लेना ही नहीं चाहिए, जिससे हितों का टकराव पैदा हो और जिसमें नकद इनाम मिलता हो.

जिन्हें अवॉर्ड मिला है, अब उनके बारे में जानिए

NBF ने सरकारी अधिकारी की कैटेगरी में इस साल दीपिका वाजपेयी को अवॉर्ड दिया है. ये IFS हैं और अभी बेंगलुरु शहरी डिवीज़न में डिप्टी कंज़रवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स हैं. दीपिका ने लोगों के बीच जंगलों को लेकर जागरूकता लाने में काफी योगदान दिया है. बेंगलुर के पर्यावरण की हालत किसी से छिपी नहीं है. बीच-बीच में वहां ऐसी हालत हो जाती है कि झील पर झाग जम जाता है और पानी दिखता ही नहीं है. उसमें से खतरनाक गैसें निकलती हैं. झील का गंदा पानी और पेड़ों की कटाई बेंगलुरु की बड़ी परेशानी है.

दीपिका वाजपेयी
दीपिका वाजपेयी

दीपिका ने आम लोगों को पौधे लगाने की मुहिम से जोड़ा और लोगों में ये भावना पैदा करने की कोशिश की कि वो पेड़ों का महत्व समझते हुए उन्हें न काटें. दीपिका ने जेबी कावल, बुट्टनाहल्ली, कग्गालीपुरा और थुराहल्ली जैसे कई इलाकों में जिस 149 एकड़ ज़मीन पर अतिक्रमण कर लिया गया था, उसे भी छुड़वाया.

साउथ इंडिया में लाल चंदन की तस्करी बड़ा मुद्दा है. इसमें काफी पैसा है, ऐसे में इसकी सोच-समझकर बड़े पैमाने पर कालाबाज़ारी की जाती है. दीपिका ने लाल चंदन की ढेर सारी लकड़ी की बिक्री को लेकर सही ट्रीटमेंट लागू कराने की कोशिश की, जिससे राज्य सरकार को करोड़ों रुपए का फायदा हुआ. जुलाई 2016 में एक ऐसा मामला भी आया था, जब बेंगलुरु के एक इलाके में जलभराव हो गया था और दौरा करने आए विधायक सतीश रेड्डी को दीपिका के सुझाव इतना चुभ गए थे कि वो उन्हें मारने-पीटने की धमकी देने लगे थे. इसके बाद रेड्डी पर केस दर्ज कराया गया था.

एक इवेंट में दीपिका
एक इवेंट में दीपिका

क्या ये अवॉर्ड दीपिका के लिए हितों का टकराव है

NBF अवॉर्ड के विवाद पर दी लल्लनटॉप ने दीपिका वाजपेयी से भी बात की. उन्होंने बताया कि अवॉर्ड की अनाउंसमेंट स्टेज पर ही की जाती है, ऐसे में किसी को पहले से विजेता के बारे में पता होना नामुमकिन है. रूपा के हितों के टकराव वाले आरोप पर दीपिका बताती हैं कि वो राजीव चंद्रशेखर के किसी भी प्रॉजेक्ट से नहीं जुड़ी हैं. उनके विभाग ने स्टील फ्लाईओवर को लेकर कुछ फैसले ज़रूर लिए हैं, लेकिन खुद उनकी कलम से ऐसा कुछ नहीं किया गया है. ऐसे में हितों के टकराव का मामला नहीं बनता है.

दीपिका अवॉर्ड का प्रॉसेस भी बताती हैं कि इसमें कोई भी आम नागरिक किसी को भी नॉमिनेट कर सकता है. साथ ही, इसका प्रॉसेस कई महीनों तक चलता है, जिसमें आखिरी फैसला जूरी लेती है. फाउंडेशन के मुताबिक इस साल जूरी में 22 लोग थे, जो सारे अलग-अलग इंडस्ट्री से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में इस अवॉर्ड में किसी का फेवर करना बेहद मुश्किल है.

इस साल की जूरी की लिस्ट
इस साल की जूरी की लिस्ट

ये राजीव चंद्रशेखर की क्या कहानी है

ये जनाब एंटरप्रेन्योर हैं, जिन्होंने 2005 में फाइनेंशियल सर्विस और इन्वेस्टमेंट कंपनी ‘जुपिटर कैपिटल प्राइवेट लिमिटेड’ की स्थापना की थी. जुपिटर के पोर्टफोलियो में एक कंपनी ‘एशियानेट न्यूज़’ भी है, जिसने रिपब्लिक टीवी में सबसे बड़ा 30% इन्वेस्टमेंट किया है. इससे पहले 1994 में राजीव ने BPL मोबाइल नाम की कंपनी बनाई थी, जिसकी 64% हिस्सेदारी उन्होंने 2005 में एस्सार ग्रुप को बेच दी थी.

जुपिटर एंटरटेन्मेंट वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड कई मीडिया कंपनियों की या तो मालिक है या उन्हें ऑपरेट करती है. इनमें एशियानेट न्यूज़, कन्नड़ प्रभा, सुवर्णा न्यूज़ 24×7 और रिपब्लिक टीवी शामिल है. राजीव का दावा है कि उन्होंने जिन कंपनियों में भी निवेश किया है, पारदर्शिता के मकसद से उनके बोर्ड, चेयरमैन और मैनेजमेंट वगैरह उनके अपने हैं. ऐसे में किसी भी कंपनी के संचालन या फैसले लेने में उनकी या जुपिटर कैपिटल की कोई भूमिका नहीं रहती है.

राज्यसभा में राजीव चंद्रशेखर

2006 से 2018 तक राजीव कर्नाटक से दो बार निर्दलीय राज्यसभा पहुंच चुके हैं. हालांकि, इन दोनों कार्यकाल में उन्हें बीजेपी और जेडीएस का समर्थन मिला था. इस साल जो राज्यसभा चुनाव हुए हैं, उनमें बीजेपी ने राजीव को राज्यसभा भेजा है. कर्नाटक बीजेपी के सूत्रों के मुताबिक उन्हें पार्टी ने इसलिए राज्यसभा भेजा, क्योंकि उनसे बीजेपी को बेंगलुरु के शहरी और ग्रामीण इलाकों के वोट पाने में मदद मिली थी. इसके अलावा राजीव कई संसदीय समितियों के सदस्य हैं और केरल में बीजेपी की अगुवाई वाले NDA यूनिट के उपाध्यक्ष हैं.


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